Monday, July 23, 2018

तुम्बागड़ा का कलाकंद

मिठाई का राजा अगर कोई है तो उ है कलाकंद. और वो भी तुम्बागड़ा का कलाकंद.

अगर आप आज तक नहीं खाए हैं और हमारी तरह खाने के शौकीन हैं तो जल्दी से खाइए. मंगवा के या खुद जा कर खरीद के खाइए. स्वाद ऐसा कि जीभ पर रखते कलाकंद घुल जाता है और उसकी मिठास आत्मा तक उतर के मन मिज़ाज को तर कर देती है.

आज घूमने गए थे सतबरवा तरफ तो किन लिए. खाते-खाते सोचे कि आप लोग को भी याद करा दें.

इहाँ के हलवाई के सामने देश-विदेश के कोई कारीगर नहीं टिकेगा कलाकंद बनाबे के मामला में. भले मास्टर शेफ के हजार एपिसोड देख के कोशिश कर ले.

ढेर लोग हित-पहूनइ करे जाता है तो वहां भी शान से लेकर जाता है. जाइए आप भी. आषाढ़ का महीना खत्म हो गया है, अगुआई करने का प्रयास करना है तो क्यों न कलाकंद से किया जाए...

©️ Sunny Shukla

Sunday, July 22, 2018

घूघूआ माना उ पटी दाना

आज बिहाने-बिहाने फ़ेसबुक खोलबे कइली कि देखइत ही एगो चाचा अपन घरे के लइकन के फ़ोटो डलले हथ। ओकर में एगो बा से घोड़ा बनल बा आउ दुसरका ओकर ऊपर बइठल बा। देखते बचपन इयाद पड़ गेल।

हमनियो के तो अइसने गाड़ी रह हलक। दू गो रहती तो घोड़ा बन के पारी-पारी से एक-दूसर के पीठ पर बईठ के आउ झूठो में मुँह से तरह-तरह के आवाज़ निकाल के गाड़ी चलावइत रहती। कुर्सी चाहे बेंच पर भी उल्टा बैठ के स्टेयरिंग हैंडल घुमावे के तो अलग ही मजा रहे। रस्सी के एक छोर के दूसरे छोर से बांध के ओकेरे में चार पांच गो घुस जा हली तो हो गेलक रेलगाड़ी तैयार। आउ जादे लइकन रहती तो बड़का बस बना के दौडाइते चलती। बगल से माई-चाची आ जइतन तो दुरे से होर्न भी बजा देते कि एक्सीडेंट न होवे। न कौनो लाइसेंस के जरूरत न कौनो परमिट के टेंसन, जहाँ मन करे अपन गाड़ी चला देती। आउ जब पेट्रोल ख़तम अपने गाड़ी बन के दुसरका के पीठ पर बैठा लेती। अब तो केतनो सचो के घोड़ा पर बईठल जाओ, चाहे बुलेट पर उ मजा कहा मिलेला।

आउ एगो खेल रहे। बड़कन सब सूत के आपन ठेहूना  पर लटका के हमीन के झूला झूलाव हलन, साथे साथ इ गीत भी गाव हलन...
"घूघूआ मना उ पटी दाना"

अब ई गीत के मतलब केकरो पता होखो तो जरूर बतावल जाव! इंतजार बा...

©️Anand Keshaw

Friday, July 20, 2018

रांची में पलामू

अगर आप पलामु से हैं और रांची में रहते हैं, तो मेरी आपबीती जरुर सुनिए। अगर आपके साथ भी कुछ ऐसा हुआ है, तो जरुर बताइये।

होशियार- का भाई! तुम पलामु से हो का?
मैं- हां भैया! पलामुवे से हैं। आप कइसे पहचाने?
होशियार- अरे यार! गढ़वा पलामु के लोग पहचना जाता है। सिधा होता है न! बुड़बक जैसा बात करेगा। सपना बड़ा-बड़ा देखता है। रांची आयेगा न तो IIT से नीचे तो सोचबे नहीं करता है। लड़की लोग से ऐसे दूर रहेगा कि मत बोलिए। बस यही सब लक्षण से पता चल जाता है कि पलामू का है। और भी बहुत सा बात है, कितना बतायें ?
मैं- हम्म...अच्छा मजाक उड़ा दिये भैया।
होशियार- अरे तुम तो अब रांची के न हो यार।
मैं- इसलिए अभी आप पलामु का बोले!
होशियार- हटा न यार, हो गया।
मै- नहीं। नहीं हुआ। और कुछ बोलना है तो बोल लीजिए। नहीं तो अब हम एक बात बोले भैया? सुनिए...

आप पलामू के जॉन-जॉन लइकन को बुड़बक समझते हैं ना, उ बुड़बक नहीं होता है। घर में
उसको समझाया जाता है सबसे इज्जत से बात करना। और सपना जानते हैं बड़ा क्युं देखता है? काहे कि बाप-माई का हाल जानता है। और उ जब मैट्रिक के बाद रांची आता है न, तो रात रात भर इंटरसिटी में जग कर आता है। जानते हैं भैया! ट्रेन एके गो है, उ भी खाली रतिये में, आउ ओकर में जगहो नहीं मिलता है।

माई कोठी से चाउर निकाल के बेच देती है, उ पैसा से पलामु के लइकन रांची में पढता है। हमलोग के यहां सुविधा नहीं है एतना, एही चलते रोज दुध-दही खाये वाला लइकन सब रांची के मेस वाला खनवा खाता है, लेकिन अधिकतर तो अपने बनाता है खाना डेरा में। आउ आपको पता है कि मेस वाला खनवा चमचम में डालल रहता है, ओकरा से भतवा भी ओही रंग के हो जाता है।

कोचिंग में सब पढ़ाई समझ में आता है पर अंग्रेजी के चलते खड़ा हो कर बोल नहीं पाता है। भैया बड़ी मेहनत से जीता है, इसलिए IIT सोचता है। और बात रहा लइकी से दूर रहे के, तो अइसन बात नहीं है कि पलामू के लइकन मरद नहीं है। पर उ जानता है कि इहां लइकी घुमायेंगे, तो माई-बाप के मेहनत का पैसा बर्बाद हो जायेगा। रिजल्ट एक बार भी खराब हो जायेगा तो पढ़े के मौका नहीं मिलेगा। आउ फिर पैसा भी तो चाहिए न इहां लइकी खातिर। सच बात एक और बोले? जेतना खूबसूरत खूबसूरत लइकी पलामू के खाली डाल्टनगंज में मिल जायेगी न ओतना... छोड़िए हम काहेला किसी को खराब बोले।

और एक बात! भले पलामू के लोग सीधा होता है, सबके भैया-भैया कहता है, काहे कि उसको लगता है कि अगला से प्यार से बात करेगा तो उहो इज्जत देगा, पर उ बुड़बक नहीं होता है और न ही कमजोर। अगर विश्वास नहीं है तो ध्यान से देख लीजिए।

आप जहां बैठ के पलामू वालन के मजाक उड़ा रहे हैं न, इ जमीन और एतना बढ़का बिल्डिंग पलामू के आदमी का है। आप अपना फेसबुक पर जो नेता के साथ फोटो लगायें हैं न, उ भी पलामू के हैं। पूरा रांची में पलामू के एतना आदमी है न सब अच्छे-अच्छे पद पर कि आप सोच भी नहीं सकते हैं।

जानते हैं? आपका बात पर हमको गुस्सा नहीं आया।क्योंकि हम जानते हैं कि पलामू के लोग मेहनती होते हैं । ऐसे तो मौका नहीं मिलता, पर जब मौका मिलता है तो सरकार हिला देते हैं। आउ आप अगर अपने आप को ज्यादा होशियार बुझ रहे हैं, तो सुन लीजिए। जेतना एरिया में आपका फ्लैट है न ओकरा से दोबरी में पलामू के लोग अपना गाय-भैंस के सारी रखते हैं। 

आप जिनलोग को बुड़बक समझ रहे हैं ना उ सब अपना जिन्दगी बनाने के लिए चुपचाप आपका मजाक बर्दाश्त कर लेता है। नहीं तो पलामू का आदमी का दिमाग जब सनक जाता है न उस समय  हाथ लगा के पटके में देऱो नहीं करता है। आपको  समझा रहे हैं काहे कि आपको समझाना चाहे। आगे से कोई पलामू  वाला को अइसे मत बोलिएगा। काहे कि सब सीधे नहीं होता है। कभी कहीं बहाली हो चाहे सरकारी परीक्षा आपको सबसे ज्यादा लइका पलामू का ही मिलेगा। आउर खाली जइबे नही करता है निकालने वाला भी सबसे ज्यादा पलामू का ही होता है। का समझे? हमारे रग रग में है ठेठ पलामू...

©  K Vishwa

पंजाब के नौकरी


हम जब 10वी मै पढत रहली तो रोडवा पर वाला गुमटी पर बइठल रही। तबे देखली एगो लइका गाड़ी से उतरलक, एकदम हीरो जईसन पूरा सलमान खान वाला तेरे नाम स्टाइल में बाल , ओइसने जीन्स जेकर मोहरी उपरे सटल आउ नीचे लमहर, पीठ पर स्कूल जाये वाला बैगवा से तनी सा बड़हन भरल बैग, पान चबईते, कान में हेडफोन लगइले, हाथ मे बड़का मोबाइल से गाना सुनत। उतरते के साथ देखली गुमटी तरफ आवे लगल। तनी भीरु अइते के साथ लगलक कि एकरा कहूँ देखले ही। गुमटी पर पहुँच के कहलक 'भाई जरा 6 तिरंगा देना'। अब उ घरी ई कमला पसन्द ना न हलक, उ घरी खाली दुइये गो गुटखा चलअ हलक #तिरंगा आऊ #पराग। हाँ एगो आउ #रॉकेट मिल हलक लेकिन बड़ी कम लोग खा हलन, काहे कि बड़ी नशा चढ़ हलक। हमरा देखला से लगल कि कहीं ई सुरेन्द्रा तो नईखे? हमरा से कंट्रोल न होलक तो पूछ देली ओकरा से सुरेन्द्र बड़े का हो? उहो घुम के कहलक, "अरे तुम हो भाई सुनील! एकदम पहचान में ही नही आ रहे!" दुनो फिर साथे-साथे ओकर घर तक गइली। साँझ के फिर गुमटी पर मिले के बात होइल।

दु-चार दिन तो उ 'मैं-तू' कर के बोले के खूब कोशिश करलक लेकिन पलामू के भाषा आखिर केतना दिन कंट्रोल होइतक, बाद में उहो शुरू हो गईल अइसन हऊ ओइसन हऊ। रोज-रोज खूब दारु मुर्गा चले। आउ तो आउ, गाँव के लईकीयन सब भी ओकरा पूरा धेयान से देखतन। अब हमरा से रहल ना गेल तो पूछ देली कि भाई का काम कर हे पंजाब में?  तो कहलक मैनेजर ही कंपनी में। हम पुछली कि भाई हमरो काम ना लगा देबे? कहलक कि चल साथे अबकी लगा देब उहे कंपनी में। हम कहली अबकी तो परीक्षा बा मैट्रीक के ओकर बाद चलबउ। तो उ कहे लगल अभी भकेंसी हऊ चलबे तो हो जतऊ न तो बाद में फिर काम ना मिलतऊ। हमहुँ आव देखली न ताव ओकरे साथे चल गेली पंजाब। फिर वहां देखली सब होटल में #हड़िया माँजईत हथ। फिर हमरो काम लग गईल उहे करे लगली होटल में।

लेकिन पढ़ाई में डिग्री कुछु ना हलक से उहे काम करइत रहली बड़ी दिन तक। लेकिन हमर साथे एगो आउ दोस्त हलक रमेशवा उ परीक्षा दे के आउ सर्टिफिकेट लेके भागल हलक पंजाब। ओकरा फ़ैक्टरी में काम मिल गेल हलक। काम करते-करते उ कौनो-कौनो पढ़ाई के सर्टिफिकेट भी जामा कर लेलक। का तो फिटर होखेला ऊहे। अब तो सुनले ही कि फोरमेन बन गेल बा उहे कम्पनी में। अपन बाल-बच्चा मेहरारू के साथहीं रखेला। लेकिन ओकर जईसन नसीब सब के थोड़े होखेला। हमर गाँव के आधा से जादे लइकन तो अइसही पंजाब भाग जा ले हमरे तरी, आउ जिनगी भर इहे कुली-लेबर के काम करइत रह जाले।

ई रहे हमर गांव कुंदरी के कहानी,
सुनील कुमार कुशवाहा के जुबानी।

© Sunil sk kushwaha

Wednesday, July 11, 2018

फूलोरही

रक्षा-बंधन और भैया दूज (गोधन) के अलावा भी हमारी पलामू की संस्कृति में भाई-बहनों का एक प्यारा सा त्यौहार है, जिसे अब हम भूल चुके हैं और यह विलुप्त होने के कगार पर है! फूलोहरी। या फूलोरही। जी हां यही नाम है।

यह पर्व नवरात्री के वक़्त मनाया जाता है। चाची से पूछे कि कब शुरू होता है तो बोली कि, "कलश स्थापना के ठीक एक दिन पहिले यानि अमावस्या के दिन डाली न्यौताला, आउ ई सात दिन तक चलेला।"

गाँव भर की सभी लड़कियाँ या उनका समूह एक ही जगह जमा हो के शिव ज़ी के संपूर्ण परिवार की छोटी छोटी मूर्ति (वेदी) बनाती हैं, और रोज उनकी पूजा करती हैं।

बहिन सब एके साथे भोरे-भोरे उठ के डलिया ले के फूल-लोहरने मने फूल चुनने जाती है। एक ग्रुप आउर दोसर झुंड में कंपीटिशन भी रहता है कि के जादे फूल जामा करे पारता है। जे जादे फूल जामा किया उ अपन भाई के जादे मानती है। फिर वही चुन कर लाया हुआ फूल से शिव जी की पूजा होती है।

रोज साँझ के साँझ सब सहेलियां मिल के शिव जी के खास गीतों को गाती हैं और झूमर भी खेलती है, जो कि हमारे पलामू समाज की परम्परा है। सभी सहेलियां उपवास रखती हैं या कुछ सात्विक भोजन जैसे दूध-फलाहार इत्यादि पर रहती हैं। पुरे गाँव में खुशी का एक अलग सा माहौल रहता है।

प्रतिदिन सबकोइ अहरा या नदी में नहाने जाते हैं। वहीं अहरा-पोखरा जैसी सांकेतिक आकृतियों का निर्माण होता है, यह दरअसल एक किला जैसा होता है। किला निर्माण कर पहले उसकी पूजा की जाती है, फिर बहनें अपने भाइयों की पूजा करती है और उनके दीर्घायु और सफलता की कामना शिव जी से करती हैं। फिर उस निर्माण को भाई अपने पैरों से कुचल देते हैं। इस कुचलने का अर्थ यह है कि भाई के जितने भी दुःख- कष्ट थे, सब की किलेबन्दी बहन ने कर दिया था, और अब उसे भाई ने कुचल दिया। ये दिखाने के लिए भी कि बहन तुम्हारी जिंदगी में भी जो कुछ दुःख हैं उनके बारे में हम भाइयों को बताते रहना और हम इसी तरह उन दुखों को कुचलते जाएंगे।  ख़ास कर अंतिम दिन तो पूरा गांव बैंड-बाजा लिए एक साथ विसजर्न के लिए जाता है। पुआ-पकवान में खास तौर पर दुधौरा-केरा-दुधौरी भी बनता है। नदी में पूजा के बाद लोग सपरिवार वहीं पर पकवान खाते हैं, आजकल के किसी पिकनिक आयोजन की तरह। यह आयोजन एक खेल जैसा लगता है, लोग खूब मजा करते हैं। परन्तु यह खेल और रिवाज के साथ साथ एक संस्कार भी है जो दिखाता है कि हमें एकजुटता से रहना चाहिए और सभी बड़े से बड़े दुखों-कष्टों का सामना मिलजुल कर करना चाहिए।

वैसे तो यह त्योहार पलामू के कुछ ही गांवों में मनाया जाता था मगर दुःख इस बात का है कि अब यह विलुप्त होने के कगार पर है। मेरी आजी बांसदोहर की है. वह इस परम्परा को मेरे गांव में अपने मायके से लायी थी और मेरे गाँव में यह तकरीबन 85 साल से ये मनाया जा रहा था, परन्तु पिछले 3 वर्षों से यह बंद है। पुरुबडीहा के मेरे मित्र दया भाई ने भी बताया कि अब उनके गांव में भी नहीं मन रहा है। सिंगरा-बनपुरवा में भी इस त्यौहार को मनाया जाता था लेकिन अब वहां भी बंद होने के कगार पर है।

एक ओर जहाँ सब टीवी-सिरियल देख के गोड़ में करिया डोरा बांधने लगे हैं, चलनी से देखे वाला करवा चौथ मनाने लगे है, दुनियाभर के लंद- फंद डे सेलिब्रेट करने लगे हैं वहीं दूसरी ओर हम अपनी परम्पराओं को क्यों भूल रहे हैं? हमारा सामाजिक विघटन हो रहा है क्या? आखिर क्यों यह सामाजिक एकता वाला त्यौहार विलुप्त होने के कगार पर है?

© Sunny Shukla

Sunday, July 8, 2018

अपनी बोली

मुंबई के एक मॉल में बइठे हुए थे। कुछ किताब पढ़ रहे थे। मन नही लग रहा था तो कितबवा बंद करके एने ओने देखने लगे। तबे देखे कि एगो बहुत हैंडसम आदमी एगो सुंदर सा बाबू के गोदी में लेके खेला रहा है। हाथ मे 2-3 ठो प्लास्टिक भी पकड़े हुए है। शॉपिंग कर लिया था शायद। बच्चा थोड़ा तंग कर रहा था फिर भी बेचारा किसी तरह से मैनेज किये हुए था। उहे घरी उधर से एगो एकदम खूबसूरत लेडिस आयी आउ बच्चा को दुलार के ओकरा से बोली-
"I couldn't find anything new there despite inspecting the entire shop, they are having old collections only". अब लड़का भी उसको बच्चा पकड़ाते हुए बोल- "ok dear! don't worry. we will come again next weekend. I think then u will get something of your choice"

एकदम फर्राटे दार अंग्रेजी चल रहा था। हम मने-मन बस यही सोच रहे थे कि अइसन लईकी से बियाह हो गया तब तो हो गइल हमर कल्यान। तब तक उ लडकिया बोली- "please! Take care of baby for 5 minutes. I m going to that shop, probably i will get something there." अब लइका सम्हल नही रहा था उससे, बहुत देर से झेल रहा था सो बोल दिया-"No dear! I can't handle  it anymore. See! baby is so restlessly looking for mumma". तब उधर से उ लेडिस बोलती है- "बक जी! कइसे करते है? पकड़ीये न बाबू को. 2 मिनट में आ न रहे हैं।" अच्छा ठीक है, कह के लड़का बच्चा के खेलाने लगा।

हम पास जा के बच्चा के खिलाते हुए पूछे भैया घर कहां हुआ आपका तो बोले पलामू झारखण्ड।

तो मने कहने का मतलब ई था कि इहाँ की बेटी लोग भी पढ़ लिख के अंग्रेजी ऐसा बोलेगी की पकड़ ही नही पाइयेगा कि इहंई के है। लेकिन जब अपना  भाषा बोलेंगे तो फिर अपनापन आ ही जाता है।

लेकिन सबसे मजा आता है कि जिन्हे अंग्रेज़ी या खड़ी बोली बोलने नहीं आता है उ भी विदेशी भाषा बोलने की कोशिश करते हैं ये दिखाने के लिए कि अब शहरी हो गए है। उसका हाल का होता है उ देखिये...

मेरा एक मित्र आया था दिल्ली से सबेरे भेंटाया तो -
"भाई उधर मत जइयो आगे गाढ़ा है गिर जाएगा।"

हम सब टूर पर पर थे तो मेरा एक मित्र 'रूस' गया और बोला-"यार मुझे इस बार विंडो सीट चाहिए मैं नहीं बैठूंगा साइड में तबरी तरी"

लड़कियां भी जिनका ससुराल दिल्ली हो जाता है, उनमें भी गजब का परिवर्तन आता है. देखिए-
अपने पति से- "मैंने बर्तन मांज लिया है अब कपड़ा फिंचे जा रही हूँ"
सासु माँ से - "सीरियल में जो ननद है न माँ जी! वो एक दम डाइन भोजकरउनी है!"
ससुर से- "पापाजी! मैंने चपाती बना दी है, लेकिन तेज आँच के वजह से ज्यादा करिया हो गया है"

ये थे कुछ नमूने मिक्स बिरयानी की जगह खिचड़ी बनाते पलामू के लोगों के. एक ही आग्रह है, हमारी भाषा में कोई खराबी नहीं है, हमें अपनी माटी अपनी बोली पर गर्व होना चाहिए. जरूरी नहीं कि हर आदमी हर भाषा का ज्ञानी हो. हम क्यो जबरन किसी की नकल करने के चक्कर में बेवकूफ़ बनें. अगर सामने वाले को मेरी भाषा नहीं समझ आती तो फिर हिंदी या अंग्रेजी में बात करने की मजबूरी अलग है. लेकिन सिर्फ बेइज्जती के डर से, अपनी पहचान छुपा कर शहरी छाप की झूठी चादर ओढ़ने की आदत के लिए क्या कहा जाए आपलोग ही बताइए...

© Sunny Shukla

Thursday, July 5, 2018

रेडियो 103.3


दुकान में कुछ इलेक्ट्रॉनिक आइटम ढूंढ़इत हली। तबे एगो  रेडियो देखायल। बहुत सुंदर रहे, एकदम रंगीन लेकिन देखे में तनी बड़ हलक। कंपनी के  नाम पुछली तो कहलक  "सारेगामा का है।" दाम बतइलक तो हम सोचे लगली कि एतना दाम रेडियो के रहेला! आउ अब आज के टाइम में सुनेला के रेडियो? पर रेडियो के भी अपन टाइम रहे। उ टाइम तो हमार बाबूजी भी रेडियो के पुरा शौकीन हलन। हर 2 साल पर छठ के पूजा के दक्षिणा से एगो नया रेडियो ले लेव हलन। अभी कुछ साल पहिले तक रेडियो बजा के अपन दिनचर्या करत रह हलन। केतना बजे तक दाढ़ी बनाना, केतना बजे तक शंख बजाना, केतना बजे तक खाना खा के घर से कचहरी ला निकल जाना - सब रेडियो के कार्यक्रम से फिक्स रह हलक। आउ जवन दिन देर होइतक समझ लिहुँ उ दिन कार्यक्रम के प्रसारण बन्द। गोसाये के बहाना मिल गेलक आउ का! बिना खइले नौकरी करे पार।
 
खाली उहे नाही, आउर भी बहुत लोग हलन गांव में रेडियो के शौकीन। गांव-घर मे हीरो बने वाले भी बढ़िया कपड़ा पहिन के, गमछा बांध के कपार में,  साथे हाथ मे रेडियो में गाना बजाते गलिये-गलिये  चक्कर लगावत रह हलन। आउ रेडियो के आदत लगतक काहे नही, सब कार्यक्रम भी तो एक से बढ़कर एक रह हलक।

पर हमीन के तो शाम के टाइम FM103.3 पर डालटेनगंज के प्रसारण सुनेला जरूरी रह हलक।      एगो लोक_गीत के कार्यक्रम रह हलक। अब सिंगर के नाम तो ईयाद नईखे लेकिन दु ठो गीत जरूर इयाद बा।

एगो हलक-
'निमिया पतैईया झरि जाला
अँगनवा कैसे बहारूं जी... '

और दूसर हलक-
'साइकिल के टूटल बा चयनवा
गिरल बा सजनवा ए सखी...'

तब उसके बाद शुरू होव हलक 'चल_हो_गांव_में' फुलवा बहन आउ राजू भैया वाला कार्यक्रम। सुने में ओतने ही मजेदार और सीखे वाला बात भी, एकदम जानकारी से भरल। ओकरे में जे नाटक रह हलक   ओकर चलते तो 15 मिनिट तक कहीं उठ के जइबे ना कर हली। नाटक के माध्यम से ही गांव वलन के सिखावल जा हलक। रासन-पानी से जुड़ल जानकारी सब बतावल जा हलक।

आउ ओकर बाद समाचार के टाइम गारजीयन लोग एकदम शांत, जैसे कि मोदी जी के मन के बात चल रहल होखो। कौनो लइकन बोलत पहुंच जाए उधर से तो सब इशारा में ही ओकरा चुप करवा देव हलन। हमरो घर BBC के न्यूज़ सुनल जा हलक। 15 मिनट हिंदी में आउ ओकर बाद 15 मिनिट अंग्रेज़ी में। अब हिंदी घरी सब चुप-चाप होके सुन लेती। पर जब अंग्रेजी शुरू होइतक तबो कोई बन्द ना करतक, काहे कि अब कोई शक ना करे कि अंग्रेजी न आवे।(खैर पहिलका जमाना के पढल आदमी के अंग्रेजी बहुत बढ़िया होव हलक एकर में कउनो दु मत नईखे।) फिर भी एके बतिया के दुबारा सुने में केतना मन लगी समझ सक ही।

हम तो 2003 के पूरा वर्ल्ड_कप रेडियो में कमेंट्री सुन के पार कइले हली। ओकरे नतीजा हलक कि घरे सब क्रिकेट के बात भी जाने लगलन, न तो अइसे क्रिकेट खेले के नाम पर तो बाबा से केतने बार 'लोफर' सुन चुकल  हली। आउ जवन दिन इंडिया पाकिस्तान से मैच होइतक उ दिन तो सब लोग रेडियो के चारो तरफ घेर के एक- एक बाल के खाली सुन के मैच में खो जा हली। पूरा फिल्ड फिल्डिंग सब आँख के सामने दिखाये लग हलक। उ कॉमेंट्री के बीच मे 'ये लगा डाबर च्यवनप्राश चौका' सुन के जे खुशी मिल हलक, ओतना मजा तो कोल्ड ड्रिंक्स का गिलास लेके लाइव मैच देखे में भी नहिये आइल।

बाद में 10 बैंड वाला रेडियो भी आ गेल हलक। शॉर्ट, मिडियम, एफ एम आउ एगो TV। अभी लइकन तो जानतो न होइहें कि ई चारो केकर नाम बा। हाँ तो ओकर में TV हमीन ला सबसे मेन हो गेल रहे। जवन दिन सिनेमा देखते- देखते लाइन कट जईतक, उ दिन बाकि सिनेमा रेडियो पर ही सुन के समझ जा हली। पलामू के लोग समझ हथ कि सिनेमा भी सुने के चीज़ बा! हमर माई तो एगो सीरियल देव हलक 'एहसास-कहानी एक घर की'। ई सिरियल के मुश्किल से 2 से 4 एपिसोड उ TV पर देखले होई। न तो लगभग 2 साल तक रेडियो पर सुनिए के पार कर देले हलक।

आउ  दोपहर मे विविध भारती में 90 के रोमांटिक गाना सुन के तो बचपने मे ही लग हलक कि केतना बड़का मजनू बन गइल  ही। भले प्यार के प भी न पता हो। सबसे मजा तब आइल हलक जब गांव के सब बुढवन के नाम पर पोस्टकार्ड से डालटेनगंज FM में गाना फरमाइश कर के बजवा देले हली। आउ उहो गाना ऐसा कि बूढ़े मारे शरम के पितपीता जाथ, ऊ गाना कवन हलक बताऊ -
'जो बीच बजरिया तूने मेरी पकड़ी बैयाँ
मै सबको बोल दूँगी
रात मा कोई न जागे आइयो सइयां
मै खिड़की खोल दूँगी'

आपलोग भी बचपन के रेडियो से जुड़ल कहानी बताइये और हाँ माई चाची से पूछ के गितवा पूरा पता चले तो जरूर कमेंट करियेगा...

© Anand Keshaw

डाल्टनगंज के लइकन

"बाउजी स्कूटरवा ले जाए का? तनी सुन काम है." प्रभाकर देव जी उर्फ़ हमारे कहानी के हीरो ने आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपने देवता तुल्य पिता से पूछा.

"कहाँ उड़े के विचार है युवराज?" बाउजी हथेली पर खैनी मलने के बाद होठों के बीच चुटकी दबाते हुए बोले.

"उ कुछु नहीं शमसाद आलम सर के क्लसवा में कल नहीं न जा पाए थे, त बउवा के घरे जा के तुरते आ जाते".

"ठीक से जइहा. आउ तनी धीरे चलल कर. अइसन चलावअ ला जइसे तोहार नाना किन के धर देले बड़े रोडवा के तोहार माई ला!"

* * * *

"बउवा एगो बात कहें हो? इ साला रोज-रोज बहुत किचकिच लगता है हो अपन बाप से स्कूटर माँगना." सिगरेट के तम्बाकू को बड़े जतन से झाड़ते हुए प्रभाकर जी ने अपने विचार प्रकट किए! बउवा ने हरे रंग की सुखी घास में से बीज चुनते हुए सहमति में सर हिला दिया!

"साला इ स्टेडियमवा को कौन ठेकेदार बनाया था बे? मैदान एतना रुखड़ है कि मैदान करे के ज़ी करे लगा." बउवा ने चेला धर्म निभाते हुए सिगरेट के फोफी में घास मिश्रित तम्बाकू भरते हुए अति उल्लास से जवाब दिया.

"लेकिन इहो तो सोच गुरु केतना ठंडक मिलता है इहाँ सुते में सीढ़ी के नीचे."

दोनों बहादुरों ने अपने-अपने, मुड़े-तूड़े सिगरेट उँगलियों में कलम की तरह थामते हुए दांते निपोर दी. बस अब बारी थी एक दूसरे के मुँह में आग लगाने की. जल्दी ही स्टेडियम के छत्त के नीचे एक कोहरे का बादल छा गया.

प्रभाकर देव जी ने पूछा,"केतना के पेट्रोल डलवईले रह स्कूटरवा में?"

"20 रूपया के गुरु", कुटिल मुस्कान के साथ बउवा ने जवाब दिया.

"साला! अब जईहे इहाँ से स्कूटर धकोल के ज़ीएलए कॉलेज गेट तक. के कहले रहउ एतना चपड़वा किने ला?"

कोई जवाब ना मिलने पर प्रभाकर देव जी समझ चुके थे कि उनके शागिर्द सपनों की दुनिया में पहुंच चुके हैं. अब बारी हमारे कहानी के नायक की थी कि सपनो के दुनिया में बचे हुए चपड़वा को ठिकाने लगाया जाए.

© Rdx