हम जब 10वी मै पढत रहली तो रोडवा पर वाला गुमटी पर बइठल रही। तबे देखली एगो लइका गाड़ी से उतरलक, एकदम हीरो जईसन पूरा सलमान खान वाला तेरे नाम स्टाइल में बाल , ओइसने जीन्स जेकर मोहरी उपरे सटल आउ नीचे लमहर, पीठ पर स्कूल जाये वाला बैगवा से तनी सा बड़हन भरल बैग, पान चबईते, कान में हेडफोन लगइले, हाथ मे बड़का मोबाइल से गाना सुनत। उतरते के साथ देखली गुमटी तरफ आवे लगल। तनी भीरु अइते के साथ लगलक कि एकरा कहूँ देखले ही। गुमटी पर पहुँच के कहलक 'भाई जरा 6 तिरंगा देना'। अब उ घरी ई कमला पसन्द ना न हलक, उ घरी खाली दुइये गो गुटखा चलअ हलक #तिरंगा आऊ #पराग। हाँ एगो आउ #रॉकेट मिल हलक लेकिन बड़ी कम लोग खा हलन, काहे कि बड़ी नशा चढ़ हलक। हमरा देखला से लगल कि कहीं ई सुरेन्द्रा तो नईखे? हमरा से कंट्रोल न होलक तो पूछ देली ओकरा से सुरेन्द्र बड़े का हो? उहो घुम के कहलक, "अरे तुम हो भाई सुनील! एकदम पहचान में ही नही आ रहे!" दुनो फिर साथे-साथे ओकर घर तक गइली। साँझ के फिर गुमटी पर मिले के बात होइल।
दु-चार दिन तो उ 'मैं-तू' कर के बोले के खूब कोशिश करलक लेकिन पलामू के भाषा आखिर केतना दिन कंट्रोल होइतक, बाद में उहो शुरू हो गईल अइसन हऊ ओइसन हऊ। रोज-रोज खूब दारु मुर्गा चले। आउ तो आउ, गाँव के लईकीयन सब भी ओकरा पूरा धेयान से देखतन। अब हमरा से रहल ना गेल तो पूछ देली कि भाई का काम कर हे पंजाब में? तो कहलक मैनेजर ही कंपनी में। हम पुछली कि भाई हमरो काम ना लगा देबे? कहलक कि चल साथे अबकी लगा देब उहे कंपनी में। हम कहली अबकी तो परीक्षा बा मैट्रीक के ओकर बाद चलबउ। तो उ कहे लगल अभी भकेंसी हऊ चलबे तो हो जतऊ न तो बाद में फिर काम ना मिलतऊ। हमहुँ आव देखली न ताव ओकरे साथे चल गेली पंजाब। फिर वहां देखली सब होटल में #हड़िया माँजईत हथ। फिर हमरो काम लग गईल उहे करे लगली होटल में।
लेकिन पढ़ाई में डिग्री कुछु ना हलक से उहे काम करइत रहली बड़ी दिन तक। लेकिन हमर साथे एगो आउ दोस्त हलक रमेशवा उ परीक्षा दे के आउ सर्टिफिकेट लेके भागल हलक पंजाब। ओकरा फ़ैक्टरी में काम मिल गेल हलक। काम करते-करते उ कौनो-कौनो पढ़ाई के सर्टिफिकेट भी जामा कर लेलक। का तो फिटर होखेला ऊहे। अब तो सुनले ही कि फोरमेन बन गेल बा उहे कम्पनी में। अपन बाल-बच्चा मेहरारू के साथहीं रखेला। लेकिन ओकर जईसन नसीब सब के थोड़े होखेला। हमर गाँव के आधा से जादे लइकन तो अइसही पंजाब भाग जा ले हमरे तरी, आउ जिनगी भर इहे कुली-लेबर के काम करइत रह जाले।
ई रहे हमर गांव कुंदरी के कहानी,
सुनील कुमार कुशवाहा के जुबानी।
© Sunil sk kushwaha
No comments:
Post a Comment