मुंबई के एक मॉल में बइठे हुए थे। कुछ किताब पढ़ रहे थे। मन नही लग रहा था तो कितबवा बंद करके एने ओने देखने लगे। तबे देखे कि एगो बहुत हैंडसम आदमी एगो सुंदर सा बाबू के गोदी में लेके खेला रहा है। हाथ मे 2-3 ठो प्लास्टिक भी पकड़े हुए है। शॉपिंग कर लिया था शायद। बच्चा थोड़ा तंग कर रहा था फिर भी बेचारा किसी तरह से मैनेज किये हुए था। उहे घरी उधर से एगो एकदम खूबसूरत लेडिस आयी आउ बच्चा को दुलार के ओकरा से बोली-
"I couldn't find anything new there despite inspecting the entire shop, they are having old collections only". अब लड़का भी उसको बच्चा पकड़ाते हुए बोल- "ok dear! don't worry. we will come again next weekend. I think then u will get something of your choice"
एकदम फर्राटे दार अंग्रेजी चल रहा था। हम मने-मन बस यही सोच रहे थे कि अइसन लईकी से बियाह हो गया तब तो हो गइल हमर कल्यान। तब तक उ लडकिया बोली- "please! Take care of baby for 5 minutes. I m going to that shop, probably i will get something there." अब लइका सम्हल नही रहा था उससे, बहुत देर से झेल रहा था सो बोल दिया-"No dear! I can't handle it anymore. See! baby is so restlessly looking for mumma". तब उधर से उ लेडिस बोलती है- "बक जी! कइसे करते है? पकड़ीये न बाबू को. 2 मिनट में आ न रहे हैं।" अच्छा ठीक है, कह के लड़का बच्चा के खेलाने लगा।
हम पास जा के बच्चा के खिलाते हुए पूछे भैया घर कहां हुआ आपका तो बोले पलामू झारखण्ड।
तो मने कहने का मतलब ई था कि इहाँ की बेटी लोग भी पढ़ लिख के अंग्रेजी ऐसा बोलेगी की पकड़ ही नही पाइयेगा कि इहंई के है। लेकिन जब अपना भाषा बोलेंगे तो फिर अपनापन आ ही जाता है।
लेकिन सबसे मजा आता है कि जिन्हे अंग्रेज़ी या खड़ी बोली बोलने नहीं आता है उ भी विदेशी भाषा बोलने की कोशिश करते हैं ये दिखाने के लिए कि अब शहरी हो गए है। उसका हाल का होता है उ देखिये...
मेरा एक मित्र आया था दिल्ली से सबेरे भेंटाया तो -
"भाई उधर मत जइयो आगे गाढ़ा है गिर जाएगा।"
हम सब टूर पर पर थे तो मेरा एक मित्र 'रूस' गया और बोला-"यार मुझे इस बार विंडो सीट चाहिए मैं नहीं बैठूंगा साइड में तबरी तरी"
लड़कियां भी जिनका ससुराल दिल्ली हो जाता है, उनमें भी गजब का परिवर्तन आता है. देखिए-
अपने पति से- "मैंने बर्तन मांज लिया है अब कपड़ा फिंचे जा रही हूँ"
सासु माँ से - "सीरियल में जो ननद है न माँ जी! वो एक दम डाइन भोजकरउनी है!"
ससुर से- "पापाजी! मैंने चपाती बना दी है, लेकिन तेज आँच के वजह से ज्यादा करिया हो गया है"
ये थे कुछ नमूने मिक्स बिरयानी की जगह खिचड़ी बनाते पलामू के लोगों के. एक ही आग्रह है, हमारी भाषा में कोई खराबी नहीं है, हमें अपनी माटी अपनी बोली पर गर्व होना चाहिए. जरूरी नहीं कि हर आदमी हर भाषा का ज्ञानी हो. हम क्यो जबरन किसी की नकल करने के चक्कर में बेवकूफ़ बनें. अगर सामने वाले को मेरी भाषा नहीं समझ आती तो फिर हिंदी या अंग्रेजी में बात करने की मजबूरी अलग है. लेकिन सिर्फ बेइज्जती के डर से, अपनी पहचान छुपा कर शहरी छाप की झूठी चादर ओढ़ने की आदत के लिए क्या कहा जाए आपलोग ही बताइए...
© Sunny Shukla
No comments:
Post a Comment