Thursday, July 5, 2018

डाल्टनगंज के लइकन

"बाउजी स्कूटरवा ले जाए का? तनी सुन काम है." प्रभाकर देव जी उर्फ़ हमारे कहानी के हीरो ने आज्ञाकारी पुत्र की तरह अपने देवता तुल्य पिता से पूछा.

"कहाँ उड़े के विचार है युवराज?" बाउजी हथेली पर खैनी मलने के बाद होठों के बीच चुटकी दबाते हुए बोले.

"उ कुछु नहीं शमसाद आलम सर के क्लसवा में कल नहीं न जा पाए थे, त बउवा के घरे जा के तुरते आ जाते".

"ठीक से जइहा. आउ तनी धीरे चलल कर. अइसन चलावअ ला जइसे तोहार नाना किन के धर देले बड़े रोडवा के तोहार माई ला!"

* * * *

"बउवा एगो बात कहें हो? इ साला रोज-रोज बहुत किचकिच लगता है हो अपन बाप से स्कूटर माँगना." सिगरेट के तम्बाकू को बड़े जतन से झाड़ते हुए प्रभाकर जी ने अपने विचार प्रकट किए! बउवा ने हरे रंग की सुखी घास में से बीज चुनते हुए सहमति में सर हिला दिया!

"साला इ स्टेडियमवा को कौन ठेकेदार बनाया था बे? मैदान एतना रुखड़ है कि मैदान करे के ज़ी करे लगा." बउवा ने चेला धर्म निभाते हुए सिगरेट के फोफी में घास मिश्रित तम्बाकू भरते हुए अति उल्लास से जवाब दिया.

"लेकिन इहो तो सोच गुरु केतना ठंडक मिलता है इहाँ सुते में सीढ़ी के नीचे."

दोनों बहादुरों ने अपने-अपने, मुड़े-तूड़े सिगरेट उँगलियों में कलम की तरह थामते हुए दांते निपोर दी. बस अब बारी थी एक दूसरे के मुँह में आग लगाने की. जल्दी ही स्टेडियम के छत्त के नीचे एक कोहरे का बादल छा गया.

प्रभाकर देव जी ने पूछा,"केतना के पेट्रोल डलवईले रह स्कूटरवा में?"

"20 रूपया के गुरु", कुटिल मुस्कान के साथ बउवा ने जवाब दिया.

"साला! अब जईहे इहाँ से स्कूटर धकोल के ज़ीएलए कॉलेज गेट तक. के कहले रहउ एतना चपड़वा किने ला?"

कोई जवाब ना मिलने पर प्रभाकर देव जी समझ चुके थे कि उनके शागिर्द सपनों की दुनिया में पहुंच चुके हैं. अब बारी हमारे कहानी के नायक की थी कि सपनो के दुनिया में बचे हुए चपड़वा को ठिकाने लगाया जाए.

© Rdx

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