क्यों बागीचे में आम तोड़ता बचपन बुलाता है मुझे?
पुआल इक्कठा करना पैरों से
ठंड की सुबह और शाम ढलते जलाना उसे
वो भाई-बहनों से भरा परिवार क्यों याद आता है मुझे
वो मलाइबर्फ बेचते हुए चाचा जब गुज़रते थे साइकिल पर
उनकी दो घंटी में घर के बाहर लगने वाला बच्चों का वो हुज़ूम क्यों याद आता है मुझे
पचास पैसे हुए तो बर्फ का रंगीन टुकड़ा
और एक रुपये में बर्फीले पानी से भरी वो प्लास्टिक की पाइप
जिन्हें हम पैसे से नहीं बल्कि महुवा या चावल के बदले ख़रीदा करते थे
सुबह-सुबह वो महुवा चुनना क्यों याद आता है मुझे
लकड़तोड़ खाता वो बचपन
दोपहरी में भाइयों के घर जा कर अंटल खेलना
और वहीं चप्पल भूल जाने वाला बचपन
बारह बजे का वो शक्तिमान
और शाम में कित-कित, सीकड़-चोर खेलता वो बचपन क्यों याद आता है मुझे
दस-फूट्टा, बिस्फुट्टा - ये सब कुवें के नाम थे
बाबा आम, मिठका आम - ये सब आम पेड़ के नाम थे
वो पेड़ों से बेर तोड़ता
और चिपरी के लिए गोबर खोजता बचपन क्यों याद आता है मुझे
हमारे यहाँ मास्टर जी नहीं, दीदीजी हुआ करती थी
टेबल-बेंच की कमी 'बोरा' पूरा करते थे
होली में सगे-संबंधी के मोबाइल पर मैसेज नहीं
सबके घर के दूरा पर बारी-बारी से कीर्तन होता था
होलिका दहन में कोई पुतला नहीं समत जलाते थे
और होली खेलने के लिए पिचकारी हुई तो ठीक है
वर्ना हम तो बाल्टी- लोटा से भी होली मनाते थे
वो काली मंदिर, पीपल का पेड़,
ऊ_टोला से क्रिकेट पर लगी बाज़ी
और रात दस बजे तक आसमाँ के लाखों तारों को निहारते खटिया पर बेपरवाह निश्चिन्त सो जाने वाला बचपन याद आता है मुझे
(ये बातें लेस्लीगंज थाने के एक गाँव, कमलकेडिया के बारे में नहीं, बल्कि हर उस उमंग और आकांक्षा के लिए है, जिनमें बचपन को याद करने, फिर से जीने और उसमें खो जाने की चाहत आज भी है।)
© सौरभ शुक्ला
No comments:
Post a Comment