Sunday, January 30, 2022

#के_हमरा_गांधीजी_के_गोली_मारल_हो


30 जनवरी 1948। दिन था शुक्रवार।शाम के 5.17 बज रहे थे। जब सफेद धोती पहने गांधीजी शाम की प्रार्थना के लिए जा रहे थे।उसी वक्त उनपर तीन बार गोलियां दागी गईं थी।
किसने मारा, क्यों मारा? उस बुढ़े,कमजोर आदमी की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी? हमारे बापू,जिसके एक हुंकार पर लाखों लोग एकत्रित हो जाते थे। जिसने अहिंसा और सच्चाई की ताकत से दुनिया को परिचित कराया था। जो सबकी खुशी और देश की आजादी के लिए अनगिनत कष्ट सहने के लिए तैयार रहता था। पूरे देश में यह खबर आग की तरह फैल गयी थी। सैकड़ों साल पुरानी गुलामी का अंधेरा खत्म हुए, अभी कुछ ही महीने तो गुजरे थे।
माँ बताती है कि शनिवार को 'हरिनामांड(तिवारीडीह)' के स्कूल में जल्दी छुट्टी हो गयी थी।गुरुजी ने बताया था कि गांधी बाबा मर गये। वह रोते-रोते घर पहुंची थी।नाना को बताया कि -" गांधी बाबा मर गइलन,अब देश कइसे चली।' पिताजी बता रहे हैं कि डाल्टनगंज से सब्जी खरीदने आने वाले व्यापारियों से उन्हें पता चला कि गांधी बाबा नहीं रहे।खबर मिलने के बाद पूरे गांव में लोग गमगीन हो गये थें। बहुत घरों में खाना नहीं बना था।
गांधी जी के समकालीन 'रसूल मियां' के इस भोजपुरी गीत से लोकव्यथा को समझा जा सकता है कि गांधी शिष्ट समाज ही नहीं बल्कि लोक में निवास करते थे।उस दुखद खबर से सभी आहत थे। दुखी थे। आज, अब उनका शरीर तो नहीं रहा लेकिन उनके विचार अमर हैं।
"के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो
कल्हीये आजादी मिलल, आज चललऽ गोली,
गांधी बाबा मारल गइले देहली के गली हो, धमाधम तीन गो…
पूजा में जात रहले बिरला भवन में,
दुशमनवा बैइठल रहल पाप लिये मन में,
गोलिया चला के बनल बली हो, धमाधम तीन गो…
कहत रसूल, सूल सबका दे के,
कहां गइले मोर अनार के कली हो, धमाधम तीन गो…
के हमरा गांधीजी के गोली मारल हो, धमाधम तीन गो…।"
गीत-रसूल मियां
गायन- Chandan Tiwari
प्रस्तुति: अजय शुक्ला

Saturday, January 22, 2022

Thursday, January 20, 2022

रंगबाज़/कपरफुट्टा


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हे पलामूवासियों! कभी किसी प्रवासी पलामू वासी (यानी सालों से बाहर रहने वाले लोग जो बहुत दिन के बाद हफ्ते भर की छुट्टी लेकर वापस इस धरती पर आए हैं) के साथ बस 15 मिनट बिताइए। आपको पलामू को देखने का एकदम नया नज़रिया मिल जाएगा।
अब बिना एन्ने-ओन्ने किये सीधे काम के बात करते हैं। हमारे प्रवासी भाई जी का पिछले हफ्ते आगमन हुआ। और तब से मेरा अधिकतर समय उनके #nostalgia वाले पागलपन की संतुष्टि में ही पार हो रहा है। किसी भी झाड़-झंखाड़ को अद्भुत प्रकृति का उपहार बनाने और यहाँ की मिट्टी को चवनप्राश समझने के बाद, हमारे भ्राताश्री की नज़र रास्ते में 'रंगबाज़/कपरफुट्टा का इलाज' वाले बोर्ड पर पड़ी। अब लग गए इस अजीबो-गरीब सी बीमारी औेर उसका इलाज करने वाले तथाकथित डागडर साहेब की खुफिया तफ्तीश में। छोटा भाई होने के कारण मुझे ही नकली मरीज़ बनने का सम्मान मिला। और प्रवासी भाई साहब तन्मयता से पूरे वार्तालाप को खुफिया कैमरा से रिकॉर्ड किए जा रहे थे और खुद को शेरलॉक होम्स से जरको कम नहीं बुझ रहे थे।
अब आपलोग डागडर साहेब और हमारी वार्तालाप पे एक नज़र डालिये-
हम: "डॉक्टर साहब दिमाग सनसना रहा है, एकबैगे उड़े लगता है, बहुत बथ रहा है।"
डागडर साहेब: "रंगबाजे हईये है" हम: "चश्मा बनवाये तबो बेस नहीं बुझा रहा है।"
डॉ: रंगबाज़ है, दवाई बनाना होगा...
फिर माथा छू के बोला कि-
"गाढ़ा(गढ्ढा) हो गइल है माथा में.. पहिले रेंगण के होता था, अब बड़ा लोग में भी होए लगा है.. दवाई बना दे रहे हैं, एक हज़ार लगेगा।"
हम: "पैसा नहीं है ओतना जी।"
डॉ:" पांचो सौ के बना देंगे।"
हम:" ओतनो नई है।"
डॉ: "अच्छा बाद में बनवा लीजियेगा, 20 के तेल ले लीजिए ना, तब तक बढ़े नहीं देवेगा.. दिमाग मे कीड़ा होता है.. खात-खात गाढ़ा कर देता है।"
इस खूबसूरत मोल मोलाई के बीच मेरी नज़र मेरे भ्राता श्री पर गई जो खुफिया वीडियो को अपने न्यूरो फिजीशियन मित्र के साथ शेयर करके अपनी ज्ञान की भूख मिटा रहे थे और हम इधर लुटा रहे थे।
लौटते समय भ्राता श्री के चेहरे को देख कर मुझे अंदाज़ा लग रहा था कि नोस्टाल्जिया का भूत कुछ हद्द तक उतर चुका है।
खैर! ये रंगबाज/कपरफूटा नाम की हैरतअंगेज करने वाली नयी बीमारी जो कि सिर्फ पलामू में पायी जाती है, उसके बारे में गूगल भी कुछ नहीं बोल पाया।
मगर अपनी सामाजिक सरोकार और जिम्मेदारी को समझते हुए ठेठ पलामू की टीम जल्दी ही इस रोग के बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट आपके समक्ष प्रस्तुत करने वाली है जिसमें विशेषज्ञ चिकित्सकों की राय भी रहेगी। तब तक आपलोग इस बीमारी के बारे में जो भी सवाल जवाब रखना चाहते हैं कृपया कर के कमेन्ट में डालें ताकि हम विशेषज्ञों से इस बारे में बात कर सकें। अभी जाते हैं भ्राता श्री को खजूर का रस पिलाने Nostalgia शान्त करने के लिए...
©सन्नी शुक्ला
Disclaimer: हमारा उद्देश्य किसी भी व्यक्ति की आस्था या विश्वास को ठेस पहुंचाना नहीं है। यह आलेख विशुद्ध मनोरंजन के उद्देश्य से लिखा गया है। चित्र घटना और पात्र:काल्पनिक।
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Saturday, January 15, 2022

#मकर_संक्रांति

 

लोकपर्व की श्रृंखला में मकर संक्रांति का त्यौहार मुझे बहुत पसंद है। यह हमारी भारतीय कृषि संस्कृति के बड़े लोकपर्वों में एक है, जब नए फसल आने के उल्लास में भारत के अलग-अलग क्षेत्र में इसी दिन के आसपास लोहड़ी, पोंगल, छेरता, बीहू आदि विभिन्न नाम से यह खुशियों का पर्व मनाया जाता है।

आज मकर संक्रांति लोकपर्व से जुड़ी मान्यताएं, खान-पान आदि भी कई वैज्ञानिक आधार पर खरी उतरती है। आज से #खरवास खत्म हो जाएगा और अब शुभ मांगलिक कार्य होने शुरू हो जायेंगे। सूरज आज दक्षिण से #उत्तरायन हो जाएगा। आज के बाद ठंड की उल्टी गिनती शुरु हो जाएगी। कल से सूर्य की उष्मा बढ़ती चली जाएगी। बसंत की सीढ़ियों पर सवार होकर धीरे-धीरे, फिर बेचैन करने वाली गर्मी आएगी।
छोड़िए! ठंड-गर्मी की चिंता फिर कभी करेंगे। फिलहाल आज के त्यौहार का आनंद लें। सुबह-सुबह कड़कड़ाती ठंड में जल्दी उठकर नहाने का कष्टमय आनंद, चावल-दाल और तिल का दान करने का आनंद, #दही_चूड़ा और फिर घर में बने हुए तिल, मुरहा, चावल और चूड़ा के विभिन्न प्रकार के लड्डू और #तिलकुट से मुँह मीठा करने का असीम आनंद...और आज की पतंगबाजी की बात ही निराली है।
और हाँ, आज बनने वाली #खिचड़ी के स्वाद की तो बात ही अलग है। पापड़,अचार और अदरक-धनियापत्ती की चटनी के साथ नए आलू, मटर, फूलगोभी, चावल, दाल आदि से बनने वाली लज्जतदार खिचड़ी से भला किसका जी न ललचाएं ।फिलहाल,आप सभी भी तिलकुट और लड्डू खाए,स्वादिष्ट खिचड़ी खाएं और इस कृषक संस्कृति के महापर्व का जी भरकर लुत्फ उठाएं।
आप सभी को मकर संक्राति की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ।
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