Sunday, June 3, 2018

कोहबर

"जल्दी चल मईंयां कोहबर परा जाइ तब जइबे का?"
आजी बड़ी जोर से आवाज लगाई. हम आपन दुपट्टा ठीक करते हुए निकले. अब सयान हो गए थे. तो पेहनन-ओढ़न पर ध्यान देना लाजमी था न. भाभी के भाई लोग भी आये थे तो थोड़ा उनको भी इम्प्रेस करना था. पैदल कियारी पार कर के हम आजी के साथ चल पड़े.

बियाह चचेरा भाई के था जो अहरा के उ पार रहते थे. गर्मी में अहरा सुख जाता था इसलिए इस शॉटकट का इस्तेमाल हमलोग उ टोला में आने जाने में करते थे. रास्ते में हम आजी से पूछे कि कोहबर के का महात्तम बा? आजी मुस्कराई फिर बोली- "आजकल तो सब फ़िल्मी हो गइल बा! अब तो लोग सुहागरात मनाव लन गुलाब के सेज पर! पर पहिले इ सब ताम झाम नहीं रहे. पहिले तो बर कन्या के कोहबर में ढुकावल जात रहे."

हम बड़ी मासूमियत से पूछे कि तुम भी बाबा के साथ कोहबर में ढुकावल गयी थी? आजी के चेहरा के भावे बदल गया. थोड़ी शर्म थोड़ी ख़ुशी और थोड़ा दर्द, सब एक साथ उनके के चेहरे पे आ गये. दर्द इहेला कि अब बाबा नहीं रहे. ख़ुशी और लाज के भाव उस खूबसूरत रात को याद कर के आए होंगे.

आजी ने आँचल ठीक किया और कहना जारी रखा- "पहिले के ज़माना में एतना पैसा और साधन नहीं न रहे कि लाखो रूपया खाली सजावटे पे खर्च करल जाव. हमीन गांव के लोग हर मौका के सादगी भाव से मानवत रहीथ. इहेला तो बियाह शादी में कोहबर पारे के परंपरा आइल. चावल पीस के घोल तैयार करल जात रहे आउ उहे से दिवार पर सूंदर सूंदर चित्र गढ़ल जात रहे."

दोनों हाथ जोड़कर आजी ने रास्ते में पड़ने वाले पीपल पेड़ के चबूतरा को प्रणाम किया और आगे बताने लगी- "कहा जाता है कि ई परंपरा की शुरुआत सीता विवाह से हुई थी. जब अयोध्या के राजा के आगमन की बात जनक जी तक पहुंची तो उ बेचैन हो उठे. उतने बड़े राजा का स्वागत छोटे गो मिथिला प्रदेश कैसे करे? तब उहां के निवासियों ने अपने अपने घरों को सूंदर बनाने का जिम्मा अपने सर लिया. और वहां की प्रजा ने अपने अपने घरो के दिवार पर चित्राकारी की. किसी ने शिव पार्वती के  स्वयंवर का दृश्य उकेरा, तो किसी ने मोर बनाया, किसी ने ओखली पीटती हुई महिलाएं तो किसी ने फूल और जंगल के तस्वीर गढ़े. आज उस कलाकारी के एक रुप को हम मधुबनी चित्रकारी के नाम से भी जानते हैं."

बाप रे! हम तो आजी को नीरा मुर्ख और अनपढ़ बुझते थे! हमको बुझा गया कि अंग्रेजी मीडियम में रट्टा मार पढ़ाई करने वाला सिर्फ साक्षर होते हैं, शिक्षित नहीं. असली शिक्षा है अपने जड़ों से जुड़ना अपना इतिहास समझना और संस्कारों परंपराओं का तार्किक विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करना. हम आपन आजी से और इम्प्रेस होते जा रहे थे, उनकर बात अब पूरा ध्यान से सुन रहे थे.

खैर! अब बस्ती नजदीक आ गया था तो आजी खड़ी बोली छोड़ कर फिर से ठेठ बोलते हुए आगे बतावे लगी- "पूरा घर के गोबर से लीप के दिवार पर चाउर के लोर से बढ़िया बढ़िया चित्र गढल जात रहे मईंयां! फिर जवन कोठरी में कन्या ढुकावल जईतक ओकरा में बहुत ही सूंदर चित्र बनावल जईतक. ओकरा बनावेला पूरा टोला के मेहरारू जुटतन. तब से 'कोहबर पारन' भी शादी के एक खास परंपरा में शामिल हो गईल. कहंँउ खाली सफ़ेद चावल के घोर से, तो कहंँउं खूब रंग-बिरंगा ढंग से कोहबर पारल जाला."

हम लोग अब चाचा घर पहुंच गए थे. वहां हम कोहबर पराते हुए ध्यान से देखने लगे. आजी के उमर के बाकि लोग से बात करते हुए हमको ढेर सारी बातें पता चली कोहबर के बारे में. जैसे कि सबसे पहले कोहबर में सुहाग की चीजों को उकेरा जाता है. बांस पुरैन, सिंधोरा, कंघी, शीशा, पालकी इत्यादि. फिर उसमे बर कन्या का नाम लिखाता है. और कै रकम के नटखट शायरी भी. फिर आकार प्रकार के डिज़ाइन और फूलों से उसको सजाया जाता है. उस कोहबर की पूजा भी होती है. सुहाग रात वाले दिन बर कन्या का सेज वहीं सजाया जाता था. उस रात जब दो जिस्म एक जान हो जाते हैं, जरा कल्पना कीजिये हमारे पूर्वज उस रस्म को भी श्रद्धा पूर्वक पूजते थे. वहीं से तो सृष्टि की उत्पति होती है तो आखिर उसको क्यों न पूजा जाये.

आज इस दिखावे और चकाचौंध की दुनिया में हम अपने रस्म और सरलता को भूलते जा रहे हैं.

"फलनवा के बेटा के बियाह में सजावट में पांच लाख खर्चा हुआ तो हम अपन बेटा के बियाह में दस लाख खर्चा करेंगे" - आखिर ऐसी मानसिकता क्यों आ गयी. चलिए न हम सब थोड़ा पीछे चलते हैं. उन रस्मो रिवाजों को फिर से अपनाते हैं जिनमे भाव थे, सरलता थी, अपनापन था, प्रेम था, संस्कार और संस्कृति की धारा थी, उन्नत विचारधारा थी.

हमें प्रगतिशीलता विचारो में लाना चाहिए लेकिन परंपराओं से दूर भी नहीं जाना चाहिए, क्योंकि आखिर यही परंपराएं तो हमारी सांस्कृतिक पहचान हैं, हमारी धरोहर हैं.

अभी मेरे भाइयों की शादी होने वाली है मैं तो इस बार खूब सूंदर कोहबर पारूंगी. उसमे खूब शरारत भरी शायरी लिखूंगी. और आँगन को खूब रंगोली से सजाऊंगी. कोई डिज़ाइन है क्या आपके पास, कमेंट में डालिए न, हमको हेल्प मिल जाएगा!

©Swetaanand Mishra

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