Wednesday, June 13, 2018

एगो प्रेम कहानी


हम ही पूटेसर, पंड़वा पलामू के रहे वाला. इहाँ कुछ दिन से इतिहास के बात होईत हलक तो हम सोचली कि पलामू के प्रेमी सब के इतिहास के बिना ई चर्चा पूर्ण कैसे हो सकेला? इहे बात पर पेश बा हमार लभ स्टोरी. कइसन लगलक से जरुर बताइब आउ अगर मन होखे तो आपन कहानी भी जरुर सूनाइब हमीन से...

बात लगभग आज से 15-16 बरस पुरान बा। तब ई मोबाइल, फेसबुक आउ व्हाट्सएप एकदम ना रहे अपन पलामू में। अब इसब ना रहे तबो तो सब काम होइते होइ, जइसे कि पढ़ाई- लिखाई, टर- टीसन, बर- बाज़ार, प्यार -मोहब्बत। अरे ई का कह देली प्यार -मोहब्बत!  एकर तो ढेर किस्सा कहानी बा। केकर-केकर दिल टूटल, केतना के मधुवन लज़ीज में बिल टूटल? तो पेश बा ओहि खजाना से ई पहिला कहानी, पुटेसर #पंड़वा वाला के जुबानी।

उ घरी हम तूरंते मैट्रिक के परीक्षा देले हली, रिजल्ट के इंतज़ार होइत हलक। कुछु काम हइये ना। उपर से ई गर्मी तो आउ। चोरी ना करले हली से अंग्रेजी में फेल होये के अलगे टेंसन। उहे सब के बीच गाँव के बुटन के बियाह ठिक हो गइल। 25 जून के बारात जायला रहे #सिंगरा।

वैसे तो बुटन उमर में ढेरे बड़ हलन हमरा से लेकिन अब बात गांव के किरकेट टीम के कप्तान के न बियाह के हलक। हमार दावेदारी पूरा हलक जाए के काहे से कि हम ओपनर बॉलर जे हली आपन टीम के।

दु दिन पहिलहीं चेक शर्ट आउ करिअक्का पैंट के निरमा सरफ से धो के आउ मोड़ के बाबा के चौंकी में बिछौना नीचे रख देले हली कि किरिच बन जाये। खैर बारात के दिन आ गेलक। फर्स्ट क्लास पैंट-शर्ट अंडर सेटिंग कर के, स्टार स्पोर्ट के धोवल जूता आउ बाल में हिमगंगे तेल लगा लेले हली। हम जीप पर सबसे पहिले उपरे चढ़ के बइठ गेली ताकि जब बाराती पहुँचों तो सबसे पहिले नजर हमरे पर जाओ।

नाच गान होके दुरा लग गेलक। अब बर परिछाय घरी एकदम दूल्हा के बगल में खड़ा होकर एने ओने फिलडींग करे लगली कि कुछ जुगाड़ भिंड़े। तखनिए एगो गोबर के गोला आके हमर शर्ट के पाकिट पर लागल। नजर ओने कइली तो देखली कि एगो लईकी अपन सहेली साथे हंसइत रहे। हंसी अइसन कि का कहूँ! मन तो करलक कि कह देंउं कि भले पूरा गोबर घोर के डाल दे हमरा पर लेकिन ई हँसी ना रुके के चाही। दिल पे जे गोबर लागल रहे समझ जाऊं ओहि घरी से हम ओकर हो गेली।

बियाह के कार्यक्रम चलत रहे। सब बराती खाये पिए चल गेलन, लेकिन हम तो बुटने साथे रहली। बहुत देर बाद उ फिर से अइलन और बुटन से पुछलन कि जीजाजी पानी पिजियेेगा का? बुटन कुछ कहअथ ओकर से पहिलही हम कह देली- "पिलाइयेगा तो काहे नही पियेंगे।" पियो-फेंको वाला चिमचिमीया गिलास और जग में पानी ले कर आइल आउ पानी देलक। पानी पीते ही हमरा लागल कि आत्मा तृप्त हो गइल। 5-7 गिलास तो अइसही पी गेली। जब खतम हो गेल तब कहलक हंस के- "आउ लायें?" हम कहली कि- "आज पूरा कूंइया सूखा दिजियेगा का हमरे पर?" हाय रे ओकर शरमाना! ओह! नजर फेर के उ जे मूसकूरइलक न कि हमार करेजा नब्बे सौ के स्पीड धर लेलक।

फिर तो नयन मटक्का भर बियाह चलल। सुबेरे जूता चोरावे घरी सब आ गइलन। हमहूं खेलाड़ी हली, जूता आपन कब्जा मे रख लेली। केतनो मांगे अइलन हम नहिंये देली केकरो। अकेले एक तरफ कुर्सी पर जूता पकड़ के बइठल हली। तब ओने से उ अइलक आउ कहलक- "हमको भी नही दीजियेगा?"
हम ई मौका कैसे चूकती? कह देली- "जब दिल ही दे दिए तो ई जूता कौन बड़ा चीज है, उहो दोस्त का?"
उ फिर से शरमा गइल। हाथ बढ़उलक तो हम हूँ जूता देते-देते पुछली- "नाम नही बताइयेगा?"
उ मूसकूरा के कहलक- "काहे नही बताएंगे? हमारा नाम है सुषमा।"
झट से हमहूं कह देली-" हम आपको प्यार से सूसूम बुला सकते हैं?"
हंस के उ जाइत-जाइत कहलक- "आपके ही हैं, अब जो कहिये।"

फिर तो ई सिलसिला भर बियाह चलइत रहलक। देख-देख के चवनिया मुस्कान, रह रह के सहेली सब के देखा के बतियाना, नजर नजर में इशारा से पूछना कि ओकर कनबाली कइसन लगइत बा? कखनियो कौनो गार्जियन के नजर पड़तक तो एने ओने देखे लगतक। कौनो काम से ओकरा कोइ कहंउ भेजतन तो हमार बेचैनी बढ़ जइतक। जइसहीं सोंचती कि कने खोजे जांउ कि उ दोसर कोना में बइठल देखा जइतक। ई कार्यक्रम रात भर चललक। मन कहे कि पंडित जी के मःतर खतमे मत होखो। हमार बस चलतक तो हम उनकर मंतर के रिपीट मोड में डाल के सप्ताह भर चालू रखती...

लेकिन समय तो बीतहीं ला न बनल बा। बियाह के रसम खत्म हो गेल। बाराती के बिदाई के तैयारी हो गइल। सब रोहा-रोहट शुरू। पर उनकर रुलाई देख के हमर करेजा बिफर गेल। बुटन के मेहरारू से जादे तो हम रोअइत हली। ओह! कइसे दिन कटी अब?काश कि कुछ अइसन होइतक कि उहो चलतक हमीन साथे। तखनिए दूर लाउडस्पीकर में गाना बाजइत हलक -

"आइल हितअइल में उ,
चार दिन खातिर बाकि
हलफा मचा के गइल।
दर्दे दिल के बढ़ा के गइल,
रोग अइसन लगा के गइल!
आइल हितअइ में उ...."

जैसे-तैसे भारी मन से हम वापस आ गइली। हमर शरीर तो इहाँ आ गेलक लेकिन जान उहंइ छूट गेल हलक। ओकर बाद बुटन के ससुराल बूटन के कम हमार जादे हो गेल हलक। केतना खानी कुछु काम नहींयो रहला पर साइकिल से ओकर ससुरारी गेली।

कभी देखा-देखी हो जइतक, कभी-कहीं अकेले मिलला पर हाल चाल भी। इ सिलसिला चलत रहलक कुछ साल। दु बार तो मेला में भी मिल के गटोरी-लकठो खरीद के देले हली। आउ उहो तो रुमाल में दिल बना के गिफ़्ट देले हलन जेकर में लिखल रहे - 'पुटेसर संग सुसुम'। और साथ मे ओकर ब्लैक एंड व्हाइट फ़ोटो मैट्रिक घरी वाला।

एक दिन मिले घरी ओकर भईया देख लेलन। हमर से बहस हो गइल, सब मिल के मरबो करलन हमरा दु चार झाप! मारे ला तो अकेले हमहूं दु-तीन गो के समहार लेती लेकिन रिश्ता में बढ़ साला न लगते हलन से ला हाथ ना उठइली।

पार्ट टू के परीक्षा हलक तो 6 -7 महीना ना जाय परली उहां। फिर भौजी से पता चलल कि ओकर बियाह कर देलन सब। सुन के तो करेजा बजर-बजर के रोये लगली हम। एक पाकिट बीड़ी पी गेली उ दिन। ई सिलसिला चलइत रहलक। लेकिन समय हर जख्म के मरहम होखे ला। कब समय गुजर गइल पते न चलल।

5 साल पहिले फिर गेल हली बुटन साथे भौजी के लाने। तो तिवारी जी के गुमटी पर बीड़ी लेवे गेली। तबे बगल से एगो लेडिज गोदी में लइका लेले अइलक। साथे एगो आउ बच्चा रहे 5 6 साल के। तिवारी जी से कहलक कि- "3 रुपया के मिक्चर आउ एमको बिस्कुट हाली हाली दीजियेगा तो, पहूना के नाश्ता कराना है।"
आवाज सुनके हम नजर फेरली आउ बड़ी ध्यान से देखली, अरे ई तो हमर सुसुम रहे! हम हूलस के कहली- "पहचाने? हम पुटेसर पड़वा वाला।"
उहो पूरा खुश हो गेलक। अब तो ढेरे बदल गेल हलक उ। तुरंत हमहू चार गो लेमनचूस लेके लइका के पकडइली। तिवारी जी के सब के पैसा देवइत घरी तनी मानी हाल चाल होइल।खाली उ पुछलक कि- "बियाह कर लिए?"
हम कहली- "ना अभी नही किये हैं। घरे वाला कह रहा है लेकिन हमहीं मना कर दे रहे है।" अब के बतावे ओकरा कि ओकर अलावे केकरो फ़ोटो पसन्द पड़े तब न। तब तक ओकर माई ओने से आवाज़ देलन-  "का करे लागले गे मईंवा?" उ जाए लगल तो कहलक कि कर लीजियेगा अब! फिर आपन बेटा के कहलक कि- "बाबू मामा न हैं! टाटा कर दो!"

© Anand Keshaw

1 comment:

  1. Jabardast. Aisi kahaniyan aur likhte rhiye... Very nice..����������������

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