ये 1978 की बात है। जी.एल.ए.कॉलेज होस्टल के सुपरिन्टेन्डेन्ट क्वार्टर में हम दोनों बहनों की जिन्दगी मजेदार गुज़र रही थी। मेरे पापा श्री Suryakant Chaudhary तब वहाँ सुपरिन्टेन्डेन्ट के पद पर थे।
1978 की वो शाम, मैं पापा की गोद में ट्रक में आगे बैठी हुई निहार रही थी कॉलेज एवं हॉस्टल की सरस्वती पूजा के पश्चात प्रतिमा विसर्जन हेतु कोयल नदी की ओर प्रस्थान का विहंगम दृश्य को। पापा ट्रक चालक को सामने से आती ट्रक के विषय में सावधान कर रहे थे। पास आते ही एक दूसरे पर टमाटर फेंकने का खेल आरंभ कर दिया दोनों ओर के युवाओं ने।आज के सुप्रसिद्ध स्पेन के 'टोमैटिना फेस्टिवल' का विशुद्ध देसी स्वरूप था ये।
मैं तब बमुश्किल पांच वर्ष की रही होऊंगी, हो सकता है कि कुछ डिटेल्स विस्मृत हो गए हों। बहरहाल, पूजा समाप्ति के बाद सारा लेखा जोखा पूर्ण होने पर पापा ने पाया कि पूजा के लिए एकत्रित कुछ राशि शेष रह गई थी। क्या किया जाए इस चंदे के पैसों का? अंततः होस्टल कैम्पस के पूर्वी कोने पर एक शिव मन्दिर बनाने की योजना मूर्त रूप लेने लगी। जाने क्या सोच उभरी होगी पापा के मन में। पर आज समझ पा रही हूँ कि कितनी दूरदर्शिता थी उनमें! युवाओं के बीच एक आध्यात्मिक वातावरण पैदा करना, मानसिक सुद्ढता प्रदान कर कुत्सित विचारों से से दूर रखने का प्रयास, शायद अपनी सांस्कृतिक धरोहर और संस्कार की रक्षा करने का इससे बेहतर प्रयास शायद कुछ और हो ही नहीं सकता था।
फिर मैं साक्षी बन गयी उस अभियान की। हाथ में कुदाल और फावड़ा लिए पापा के साथ छात्रावास के सारे छात्र उमंग से सराबोर थे। खुद अपने हाथों से निर्माण की प्रक्रिया का भागी बनना, सच में सृजन से बड़ा सुख शायद कुछ और नहीं। यह भी उनके जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ रहा होगा जो कि पापा ने अपने उदाहरण से उन्हें सिखा दिया। हम दोनों बहनों ने भी अपने छोटे छोटे हाथों के सहारे उस अभियान में शामिल होकर खुद को सौभाग्यशाली समझा था।
आगे बस इतना याद है - एक तिकोने गुम्बद से सुसज्जित एक छोटा किन्तु विशाल संभावनाओं को समेटे सफेद संगमरमर का शिव मंदिर तैयार हो गया। सामने भक्तों के बैठने के लिए काफी बड़ी परिधि का एक सफेद चबूतरा भी था। फिर गुम्बद पर एक सुन्दर त्रिशूल भी लगाया गया। शिव की नगरी वाराणसी से मूर्तियाँ मंगाई गई जिनमे भोलेनाथ के साथ-साथ उनका सारा परिवार था। शायद वो सावन की पूर्णिमा थी, झमाझम बारिश और प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन, मंत्रोच्चारण करती श्रद्धालुओं की भीड़ और एक मेला जैसा माहौल - बचपन की धुंधली यादें इतना ही बता पाती हैं।
फिर तो वहां रोज सुबह शाम पूजा-अर्चना होने लगी। मन में अपने भविष्य के सपने लिए छात्र तो आने ही लगे, पीछे के गाँवों से आते-जाते ग्रामीण भी वहां रूक कर जरूर प्रणाम करते। हमारे लिए तो वह मंदिर क्रीड़ास्थल, विश्रामागार, सब कुछ हो गया था।
वहीं मैंने जाना कि जेठ के महीने में शिव की उग्रता को शांत करने के लिए घड़े में जल रखा जाता है शिवलिंग के ऊपर जिससे लटके सूत से बूंद टपकते हैं लगातार।
रिटायरमेंट के बाद पापा हम सबको लेकर अपने घर, चरखी भट्टा के सामने वाली गली में ले आए। फिर तो हम वहां गाहे बगाहे ही जाते थे। पर शिवरात्रि के दिन हर वर्ष झंडा लगाना और पूजा करना मेरे परिवार के नियमों में शामिल हो गया है। पापा कहते हैं -" गणेश लाल अग्रवाल कॉलेज में बिताया समय मेरे जीवन का स्वर्णिम काल था।"
बीच में मन्दिर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में आ चुका था। वहां जाने पर अत्यंत दुःख का अनुभव होता था। पर ईश्वर शायद भक्तों की मनोभाव समझ लेते हैं। कॉलेज कैम्पस में अवस्थित CRPF की छावनी ने मंदिर का जीर्णोद्धार करके पुनः उसकी गरिमा लौटा दी है। अब देखरेख भी CRPF के जवान खुद करते हैं। चारों ओर फूल पत्तियों के लग जाने से उसकी हरियाली और निखर गयी है।
तो यह थी जी.एल.ए.कालेज के शिव मंदिर की कहानी, एक पांच वर्षीय बालिका के दिल की जुबानी। यह बात और है कि आज वह बालिका उम्र के कई पड़ाव पार कर चुकी, पर है तो अब भी ठेठ पलामू।
© Priyanki Mishra
Photographs : Sunny Shukla
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