हम मैट्रिक पास हो चुके थे. एक दिन भिनसारे कुंदरी बस स्टैंड में बस के इंतजार में थे. बस आया तो लपक के चढ़ गए स्टाइल मारते हुए. J.P.S के न्यू मॉडल बस था.
अगल बगल वाला को देख रहे थे कि कौन कौन हमारा स्टाइल नोटिस किया कि अचानक से आवाज़ आया - "स्टूडेंट के डिस्काउंट न मिलता है! हमको आधा पैसा ही लगेगा."
हम देखे कि अरे! इ त हमरे गांव की सोनमवा है. अरे ई तो ढेर बड़ी हो गई है आउ एतना बोले लगी है रे ई लईकी! खूबसूरत एतना कि शहर के लईकी शरमा जाए! प्यार हो गया ससुरा ओहि घरी से. पहिले नजर का जबरदस्त वाला प्यार. ड्राइवर बस में गाना भी बजा दिया कुमार शानू के-
"काश कोई लड़की मुझे प्यार करती
मुझ से मोहब्बत का इजहार करती"
अब क्या रोज उसी के टाइम पे आने-जाने लगे. एक ही गाँव के थे तो बात करने में कोनो परेशानी था नहीं. कई बार उसका भाड़ा हम दे देते. भर रास्ता खूब गप होता, दुनिया भर के बात करते हम. जब हमारे किसी बात पर उ हंस देती न तो हमको लगता कि आज का दिन सार्थक हो गया. खलासी से बोल बोल के उसका फेवरेट वाला गाना सब बजवाते. उ गुनगुनाती तो हम खिड़की दने देख के मने मन फ़िल्म के हीरो बुझने लगते ख़ुद को. कभी कभी सीट भी मिल जाता साथ में तो फिर ऐसा लगता जैसे कि इ बस मेरा पर्सनल गाड़ी है और हम उसके साथ दुनिया घूमने निकले हैं. पहाड़-घर-गाँव देखते दिखाते जिन्दगी का सफर बहुत अच्छा कट रहा था. बस एके टेंशन था कि उ हमको सिर्फ दोस्त तो नहीं न समझती है? काहे कि कोनो दिन अगर उ किसी लड़का का नाम लेती न तो हमार करेजा पर करैत लोटने लगता. उ दिन बोल रही थी कि उसके जीजाजी का भाई आनेवाले हैं, उनके साथ सिनेमा देखने जाएगी तो हम से बर्दाश्त नहीं हुआ. खूब रोए घर आके फिर ठान लिए कि अब इधर चाहे उधर लेकिन बोल देंगे सीधे सीधे.
और फिर अगला दिन डरते डरते हम उसका हाथ धर लिए आउ बोले- "देख गे सोनम! हम तुमसे बहुत प्यार करने लगे हैं. मरिये जाएंगे तुम्हारे बिना रे!"
उ बोली- "हम को भी आपसे ऐसा ही कुछ कहना था, लेकिन हम लोग तो दोसर- दोसर जात से हैं न! हमको तो छोड़ दीजियेगा आप एक दिन."
लेकिन प्यार जात-पात नहीं देखता, ऐसा उसको खुब प्यार से समझाए हम. कुछ दिन में उसको भी यकीन हो गया कि उसके सपनो का राजकुमार हम ही हैं, हमारे अलावे कोई उसको एतना नहीं चाह सकता. फिर हम लोग एक दूसरे के सपने देखने लगे . अब गाँव से शहर का सफर और साथ में हमसफर भी. हम से ज्यादा खुश नसीब तो पूरे दुनिया में कोई नहीं था. एकदम अगरा के सीट पकड़ लेते रोज. खलासी से सेटिंग कर लिए थे, सीट रख देता था हमारे लिए खिड़की साइड का. पूरा रास्ता खूब खयाल रखते थे हम उसका. मन तो करता था कि बस कहीं रुकबे न करे. इहे रास्ता न था जेकरा गचकी-ठोकर के लिए रोज गरियाते थे हम, और अब इसी के सहारे ख्वाबों की दुनिया में उड़ रहे थे हम रोज रोज.
प्यार था, कितना दिन छुपता. उ बस में ढेर गोतिया लोग भी न जाते थे, सब जान गए. उसका चचेरा भाई के एगो दोस्त नक्सलाइट में रहता था. उ लोग हम पर केस कर दिया वहाँ. एक रात पूरा पार्टी वाला सब आया, जन-अदालत लगा के हमको बहुत मारा. हमको सामंतवादी, शोषण करने वाला, समाज विरोधी और न जाने क्या क्या बोला. उ जमाना में हमको का पता था ई सामंतवाद पूंजीवाद. हम त बस प्रेमवाद के पुजारी थे. सब हमर मुड़ी काटे वाला था लेकिन उनलोगों के मोर्चा में एगो हमर पुरान यार था, जान तो बचा लिया किसी तरह से लेकिन पेड़ में बांध के बहुत मारा सब हमको. लगा कि अब तो प्यार के नाम से भी बुखार लग जाता है. जब-जब पुरवइया चलता है देहिया बहुत दुखाता है अभी तक.
ख़ैर आज बहुत साल के बाद फिर से उ सोनमवा नहर पर वाला गुमटी पर भेंटा गई. हम कमला-पसंद ले रहे थे. उ आई थी मोबाइल रीचार्ज कराने. हम अकचका गये, लूकाने लगे गुटखा के पुड़िया. लेकिन उ देख ली हमको और हंसते हुए बोली कि - "सुने हैं कि आप ऊहे बस में कंडक्टर बन गए हैं?" हम कुछ नहीं बोल पाए. गोदी में ओकर एगो नन्हे गो के लइका था. उ बोली- "बाबू इधर देखो, ई भी तुम्हारे मामा हैं"
© Sunny Shukla
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