Thursday, June 14, 2018

ठेठ पलामू : ईद की यादें


रमज़ान का पाक महीना चल रहा है। हम दुआ करते हैं कि खुदा की नेमत से पूरे पलामू में खुशियों की बारिश हो, अमन चैन का माहौल हो, जमीं पर ही जन्नत की खुशबु बिखरे। सभी पलामू वासियों को ईद की मुबारकबाद! पेश है इस खुशी के मौके पर भाई #आमिर_मुर्तजा की स्याही से निकला बचपन की मासूमियत से लबरेज उनकी यादों का पिटारा.
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ईद का त्यौहार और मेले की मस्ती भला कोई कैसे भूल सकता है। एक-दूसरे के घर का लच्छा-सेवई खाना और आज़ाद पंछी की तरह घूमना-फिरना किसे याद नहीं।

अब्बा-अम्मी, चाचा-चाची, भैया-भाभी से मिलने वाली #इदी (ईद के त्योहार में परिजनों से मिलने वाले पैसे) से खरीददारी और मौज-मस्ती करना तो ताउम्र याद रहेगा।

बचपन में ईद तो हक़ीक़त में जश्न मनाने वाला त्योहार लगता था। पूरे एक माह रोजा-नमाज़-इबादत के बाद दोस्तों संग ईद को यादगार बनाने की तैयारी वाली बचपन की मीठी यादें आज भी सचमुच एक अनोखा अहसास कराती है। हर वर्ष का कमोबेश एक ही दस्तूर था। ईद के दिन अहले सुबह उठना और नहा-धोकर नए कपड़े पहनना- इस हसीन मौके का इंतजार पूरे साल तक करना पड़ता था। और फिर ईदगाह जाकर सबसे गले मिलना। बड़ों से दुआ कबूल करना और छोटे बच्चों पे दुलार मुहब्बत की बारिश करना। हम बच्चे एक दूसरे की टोपी गौर से देखते थे और जिसकी अच्छी लग जाए ठीक वैसी ही टोपी खरीदने की जिद भी करते थे। यह सिर्फ मेरी ही नहीं शायद आपके बचपन की खट्टी-मीठी यादों को ताजा करने के लिए भी काफी हो।

करीब 15 वर्ष पूर्व तक ईद जैसे खुशी के त्योहार को यादगार पल बनाने और यादों को एक तस्वीर में समेटकर रखने की शायद एक परंपरा चलती थी। बच्चों का समूह अलग, युवाओं का समूह अलग और पारिवारिक समूह अलग-अलग अंदाज में फ़ोटो स्टूडियो पहुंचते। मनचाहे अंदाज़ में तस्वीर के जरिए अपनी मीठी यादों को कैद करने की कोशिश करते। शायद वह सच्चा प्यार था। उस तस्वीर के जरिये रिश्ते कितने मजबूत होते जाते थे इस बात का अंदाजा अब लगता है। अब तो मोबाइल फोन पर लाखों तस्वीरें होती हैं सबकी, लेकिन उन तस्वीरों में शायद रिश्तों की गर्माहट नहीं, मासूम ख्वाहिशों की सजावट नहीं।

मेदिनीनगर के पहाड़ी मुहल्ला (#नूरी_मस्जिद के समीप) में ईद के दिन मेला लगता था। चाट, चना, पकौड़ा, आइसक्रीम जैसे लुभावन सामानों के ठेले लगते थे। एक अनिल चाचा नाम के बुजुर्ग झूला लेकर आते और 2 रुपए प्रत्येक बच्चा के रेट पर हम सब को झूले का लुत्फ दिलाते। अनिल चाचा के साथ साथ और भी कई हिंदू दुकानदारों की दुकान सजती थी। पलामू के इस रिवाज पर मुझे आज भी फक्र महसूस होता है कि यहां सभी कौम के लोग एक दूसरे के त्योहारों में कितने उत्साह से शरीक होते आए हैं। हम भी जिस तरह से होली में अपने पड़ोसियों को रंग अबीर लगाते हैं वे भी तो उसी गर्मजोशी और अदब से हमारे घर सेवई खाने आते हैं। और ईद मुबारक कह कर गले लगते हैं।

आज भी पलामू में कई जगह ईद के दिन मेला का रूप दिखता है, लेकिन अब हमलोगों के लिए उसमें से मिठास और उल्लास गायब सा हो गया है। कारण कि अब हमलोग बड़े हो गए हैं शायद, बचपन की मासूमियत खो गई है कहीं रोजी-रोटी की तलाश में। तेजी से बढ़ते उम्र के साथ परिवार और समाज की जिम्मेवारी बढ़ती गई हैं।

खैर! बचपन तो बचपन, नादां से दानां होके भी उन यादों की कैद से कोई कैसे आजाद हो।

#ठेठ_पलामू के जरिए सभी पलामू वासियों को ईद की ढेर सारी शुभकामनाएं! #ईद_मुबारक!

© आमिर मुर्तजा
पत्रकार - दैनिक जागरण

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