आज कुछ मेहमान अचानक से बिना सूचना दिए घर आ गए. मैं हैरान परेशान सी सोचने लगी कि चाय के साथ क्या नाश्ता परोसा जाए? फिर अचानक से खयाल आया कि अपने पलामू में तो हलवा अर्थात मोहनभोग परोसा जाता था. एक नंबर का नाश्ता था ये. फिर क्या था! खूब सारे घी में आटा डाल के लाल होने तक भूंजते रहे जब तक कि लोहिया सौंध सौंध धमकने नहीं लगा. वाह! उ सुगंध से पूरा बचपन आँख के सामने से गुजर गया. खुशबु यादों को किस तरह से जकड़ लेती है इसका एहसास अब जाकर हुआ. पहले सिर्फ किताबों में पढ़ती थी कि लोग अपनी माटी की खुशबु से अपने देश की यादों में खो जाते हैं, अब लगता है कि सच ही तो कहा लिखा गया था वो सब. फिर से मेरी आँखों के सामने तैरने लगा ठेठ पलामू का टैग लाइन 'अपनी बोली अपनी माटी' .
मेरी रसोई इस कदर महक उठी थी मोहनभोग के संग संग मेरी यादों की खुशबु से कि बगल वाली पड़ोसन भी झाँकने आ गयी थी और पूछ ही बैठी - "आखिर पक क्या रहा है श्वेता के रसोई में?"
मेरा ननिहाल है सिंगरा खुर्द. जी हां वही गाँव जिसका जिक्र कुछ दिन पहले ही ठेठ पलामू पर किया गया था. डालटनगंज से दूर ही कितना था ये, हम जीप में बैठ के सोच भी नहीं पाते थे और पहुंच जाते थे अपनी नानी के पास. पर बार-बार वहां जाने के बावजूद हमारे आवभगत में नानी कभी कोई कमी नहीं करती थी. पहुंचते ही मामी पीतल के थाली में हमारा पैर धोकर अपने आँचल से पोछती थी. भगिनी पूजनीय होती है न पलामू के परंपरा के अनुसार! इसी बीच नानी बड़का डूभा में आधा किलो चीनी डाल के चम्मच की जगह अपना हाथ डूबा के ही शर्बत घोलती. उस शर्बत में नींबू कम और चीनी बहुत ज्यादा हुआ करता था. बिलकुल मेरी नानी की तरह. फिर स्टील के गिलास में २-३ गिलास शर्बत हम पी लेते. कसम से मुँह तो बंधा जाता पर मन नहीं भरता था. अब सोचती हूँ कि नानी अगर शर्बत चम्मच से घोलती तो शायद इतना स्वाद नहीं आता. क्या फाइव स्टार होटल में बिना हाथ डाले चम्मच से गोल गप्पे खिलाने वाले इसीलिए वो स्वाद नहीं दे पाते जो ठेले पर मिलता है?
अब तक मेरी माँ नानी को आजी द्वारा किए गए अत्याचारों से अवगत कराती पूरी भाव भंगिमा के साथ, कभी फुसफुसाहट से तो कभी ऊंचे स्वर में. नानी भी लगे हाथ मामी का बही खाता खोल देती. कभी कभी किसी की बुराई करने में भी कितना आनंद आता है हम औरतों को ये पुरुष जात क्या जाने?
मगर हम बच्चे सब भूल-भाल के ढोला-पाती, विष- अमृत, कित_कित, हूरा, सेरेडीची, और न जाने क्या क्या खेलने में बिजी हो जाते थे. पता नहीं अब के बच्चे वो सब खेल जानते भी हैं कि नहीं?
हम दूरा पर के सामने खोरी में खेलते रहते कि इतने में बहुत ही स्वदिष्ट खुशबु आने लगती अंदर से. समझ आ जाता कि मोहनभोग भूंजा रहल है. मामा के दोकान से दालमोट किना के आता और तब स्टील के प्लेट में मोहनभोग परोसा जाता साथ में. आउ आरारोट वाला बिस्कुट भी. खा पी के हम फिर से बिजी हो जाते अपने काम में. अब मामा जी का कॉमिक्स और नंदन का कलेक्शन पर मेरा छापा पड़ता.
धुसका, केरा_दुधौरा और गुड़ का पुवा माँ को बड़ी पसंद था. दूसरे दिन से रोज पकवान बनता. हमें क्या, हम तो खाने ही जाते थे नानी घर में. सबसे मस्त होता था सुबह का नाश्ता. सरसो तेल का परोठा और आलू का पतला भुजिया, जो शायद भूंजने की बजाय तला ही जाता था. साथ में ताज़ा मल्हान से मह के निकाला गया माठा, गुड़ और आम का स्पेशल अचार. सिंगरा वैसे भी 'घाटा और माठा' के लिए प्रसिद्ध है. वहां आज भी हर घर में मवेशी मिल जायेंगे और मकई की खेती तो जम के होती है.
जब वापस जाने लगते तो नानी दौरी भर के खाजा, कसार, पियाओ, अरिसा और बंगला निमकी बना के देती. जाते समय नानी और मामी ११ रुपये भी पकडाते विदाई के रूप में. थोड़ा देर हम लोग न नुकुर वाला नौटंकी करते और फिर चुपचाप पकड़ लेते थे अपना अपना हिस्सा और मन में चलने लगता था बजट कि इस पैसे से करना क्या है? कभी कभी अगर किसी खास मौके पर नानी दक्षिणा- विदाई में बड़का वाला नोट धरा देती तो टेंशन भी होने लगता था. काहे कि हमीन तो बच्चा न थे, एतना पैसा का क्या करेंगे, इसीलिए अक्सर हमारा पैसा मम्मी पापा के द्वारा छीन लिया जाता था. इसीलिए हम मने मन सोचते रहते कि काश इस बार बड़का नोट ना मिले! माँ हर दो महीने पे जाती थी पर आते वक़्त खोंइछा लेते हुए ऐसे रोती थी मानो अब तो सालों बाद ही दुबारा मायके आना हो पाएगा.
वो गजब का समय था. बेटी-बहन हो या कोई दूसरा पहुना, मान-सम्मान में कोई कमी नहीं होती थी. कम ही साधन में लोग इतनी खातिरदारी करते थे कि सच्चाई वाला अपनापन महसूस होता था.
आज तो सब कुछ बदल सा गया है.
संबंधों से मिठास निकल सा गया है.
रिश्तों के मायने खोते जा रहे हैं.
हम तन्हा और तन्हा होते जा रहे हैं.
विकसित शहरी दौड़ में
समय से आगे जाने की होड़ में
छोड़ रहे हैं अपनो को,
तोड़ रहे हैं उन सपनो को
मोड़ रहे हैं रिश्तों से मुँह
अकेली होती जा रही है हमारी रूह!
हमारा पलामू भी इससे अछूता नहीं रहा है.
चलिए न थोड़ा पीछे चलते हैं.
अपनी चाल थोड़ी धीमी करते हैं.
अपने व्यवहार और संस्कृति को समझते हैं
मोहनभोग की खुशबु फिर से बिखेरते हैं.
यादों के समन्दर से मोती तलाशते हैं.
उलझे रिश्तों की डोरी सुलझाते हैं.
आने वाले पीढ़ी के लिए एक सुनहरी दुनिया बनाते हैं...
© Swetaanand Mishra
Bahut hi badhiya likha h apne
ReplyDeleteकहावत है_नानी घर का जो पानी नहीं पिया उसका अगला जनम कौआ में होता है।लेखक ने तो मोहनभोग के साथ पानी पिया है इसीलिए उनके कथ्य में खूब ओज है ।बधाई
ReplyDeleteपढ़ के आनंदित हो गए हम, हम भी नानी के घर टहल लिए बैठें बैठे, बहुत बहुत धन्यवाद आपको🙏🙏
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