Sunday, February 21, 2021

मनोहर पोथी



दिवाली की सुगबुगाहट ने दीवारों की नींद उड़ानी शुरू कर दी है. घरों में सफाई अभियान शुरू होते ही यादों ने एक करवट ले ली. छ्त की सफाई करते हुए एक टोकरी धम्म से गिरी और आँखों के सामने आ गिरा एक पन्ना जिसपे मेरी बचपन की कहानी फ्रेम दर फ्रेम छपी थी.

कोई ६-७ साल का रहा होऊंगा जब साप्ताहिक बाज़ार से खरीदारी कर के मेरे दोस्त को, जो खाली टाइम में चरवाहे का भी काम करता था, उसके दादाजी ने मनोहर पोथी दे दिया था. मारे ख़ुशी के भागता भागता वो मेरे पास आया था. और फिर भागते भागते हम खलिहान में पुआल की ढेर के ऊपर पहुँच गए. वहां बैठ हम पन्ने दर पन्ने, चौखुट बक्सों में कैद तस्वीरों में डूबने लगे और कल्पना का समंदर अपनी लहरों के संग हमें बहा कर ले जाने लगा.

चल घर चल...
नटखट मत बन...
झटपट मत कर ...
मोहन जा...
उधर मत जा...
राधा खाना खा ...

इन शब्द समूहों को पढ़ लेने पर जो आनंद और अभिमान की अनुभूति होती थी वो जावा और विसुअल सी की कोडिंग समझ के भी नहीं होती है अब.

जेहन में कैद ये शब्द बार बार वहीँ खींच ले जाते हैं जब २ रुपये की मनोहर पोथी और उसके चित्र ही हमारे लिए शिक्षा के एकमात्र शौक थे. खास बात ये कि आस पास के सभी हाट-बाज़ार और किराना दुकानों में भी पढाई लिखी की सामग्री के नाम पर डिप्लोमा कलम और जिस्ते वाले कागज के साथ यही एकमात्र किताब मिलती थी. और तक़रीबन हर मजदूर तबके का बाप अपने बच्चे को यह किताब जरुर देता था इस उम्मीद से कि उसके बच्चे को आगे चल के मजदूरी न करनी पड़े. मनोहर पोथी से उनकी इतनी उम्मीद थी!

आज की तरह भारी भरकम बस्ते की जगह काश कि हम फिर से उस हलके नाजुक मनोहर पोथी के दुसरे पन्ने में खो जाते जहाँ 'क' से 'कबूतर' शुरू होता था या फिर आखिरी से ठीक पहले वाले पन्ने में जहाँ वो प्रार्थना लिखी होती थी - " ............"
1 Nov 2018, 23:44

तिमिर में दीपोत्सव





ये एक अजीब सा संयोग है कि आज 31 अक्तूबर, अनुराग का जन्मदिन है। ये नाम 1 अक्तूबर,साल 2000 के बाद आज पहली बार ले रही,वो भी पन्ने पर। जुबान पर लाने का साहस कभी नहीं जुटा,ह्रदय में तो हर पल,हर घड़ी,हर धड़कन में जीवित है।
मात्र एक दिन पहले तो मेरे पति से मेरे लिए किताबें भेजी थी उसने। उन्हे स्टेशन पर कुछ छूटी चीजें पहुँचा कर गया था। बड़ा हो गया था अनुराग। वो बच्चा जो हमारी शादी के वक्त मात्र छः वर्ष का था, अब तेरह का हो चला था।
दुर्गा पूजा की चतुर्थी थी, दिन रविवार का था। मैं कोलकाता में अपने पति के साथ पूजा की खरीदारी कर घर लौटी थी। दोपहर का भोजन कर हाथ धो रही थी कि फोन की घंटी घनघनाने लगी। फोन की दूसरी ओर शायद मेरी बहन थी। फोन रखने के पश्चात मेरे पति व्याकुल हो गये –
“अनुराग बहुत बीमार है, हमें शीघ्र प्रस्थान करना होगा “,ऐसा कह कर मुझे सामान समेटने का निर्देश दिया उन्होंने। मेरा मन अनिष्ट की आशंका से काँप रहा था। लग रहा था, जैसे मुझसे कुछ छिपाया जा रहा हो।
जैसे तैसे कुछ जरूरी सामान पकड़, एक हाथ मे अपने दो साल के बच्चे को गोद में ले,पति के पीछे चल पड़ी थी ट्रेन पकड़ने। दुर्गा पूजा की भीड़, ठसाठस भरा जनरल बोगी। रास्ते भर के पंडाल, सब कुछ उस वक्त बेमानी थे मेरे लिये। अगले दिन दस बजे मायके की देहरी पर कदम रखते ही सब समझ गई थी मैं। सीढ़ी पर बहन खड़ी थी, कलप उठी मुझे देखकर।
“बौआ चला गया ” हथौड़े की तरह मेरे कलेजे पर लगा था यह वाक्य। ये काँटा आज भी उतनी ही जोर से गँथा हुआ मालूम पड़ता है।
बौआ अनुराग का ही घरेलू नाम था। हमारे घर का सबसे छोटा और दुलारा सदस्य,जिसे हम खो चुके थे।मेधावी,होनहार और प्रिय बालक जो उस दिन अपने दो मित्रों के साथ छुट्टी मनाने डैम की ओर गया और फिर कभी लौट कर नहीं आया। वो डैम तीनों को एक साथ लील गया।
घर के सदस्यों की हालत तो अवर्नणीय थी,उसका पालतू कुत्ता “लाइका” भी सदमे में था। आखिर अपने हिस्से का दूध उसे देने वाला,अपने हाथों से उसे रोटी पका कर देने वाला उसका प्रिय मालिक जो चला गया था। उस सुबह भी उसे प्यार से नहा कर उसके गले का पट्टा बदला था उसने।
दुर्गा पूजा तो हमारे लिए आज भी उसी दुःखद घटना की यादों का सैलाब लेकर आता है। उस बार भी , पचीस दिनो बाद फिर दीवाली आई थी,दीपों का उत्सव लेकर। पर हमारे मनों में तो अंधकार ही अंधकार था। पापा ने कहा था,”ये हमारी सबसे काली रात है “। हम सब बहुत कष्ट में थे।
रात आई तो हम छत पर चढ़े। शायद देखना चाह रहे थे कि बौआ के बिना भी दीपावली संभव थी क्या?
“ये क्या ?”,चारो ओर जहां तक नजर जा सकती थी, किसी भी छत, किसी भी दीवाल पर एक दीप नहीं नजर आया था। सारे मुहल्ले में दूर दूर तक पसरा अंधेरा देख कर हम रो उठे थे। बाहर का तिमिर इस बात का प्रतीक था कि हम अकेले नहीं थे। सारा शहर हमारे दुःख में हमारे साथ था। हमारे उर का तम धीरे-धीरे धुंधला हो रहा था और दीपों की अनेक पंक्तियाँ हमारे अंतरतम में अनायास जगमगा उठीं थीं।

© Priyanki Mishra
31 Oct 2018, 20:21

कजरौटा




उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता,
जिस मुल्क के सरहद की निगेहबान हैं आँखें .....

ये तो गाने की पंक्तियांँ हैं। जिसमें सरहद की रक्षा के लिए जवानों के सतर्क निगाहों की बात है। अच्छी निगाह के लिए स्वस्थ आँखें भी चाहिए, इसलिए बचपन में हम सभी की माताएँ हमारी स्वस्थ आँखों के लिए आँखों में और हमें बुरी नजर से बचाने के लिए हमारे माथे पर 'काला टीका' लगाकर बेफिक्र हो जाया करती थीं कि उनके बच्चों को बुरी नजर नहीं लगे। उस जमाने में माताएँ और घर के बड़े बुजुर्गों को इस काले टीके पर इतना भरोसा रहता था कि आज के समय में रोग प्रतिरोधी टीकों पर भी लोग इतना भरोसा नहीं कर पाते। सिर्फ छोटे बच्चे के माथे पर ही नहीं बल्कि #कजरौटे में बनी काजल का पुरुष और महिलाओं की आँखों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए भी प्रयोग किया जाता था।

इस नजर के टीके को यानी काले टीके को बनाया जाता एक विशेष प्रकार की चीज में........ जिसे हम ठेठ बोली में #कजरौटा कहा करते थे। इस #कजरौटे को साफ मुलायम कपड़े में बड़े ही जतन से रखा जाता था। इसमें काजल बनाने के लिए तरह-तरह की सामग्री इस्तेमाल की जाती थी। कभी अजवाइन, लौंग तो कभी कच्ची लहसुन की कलियांँ। इन चीजों को मरकीन या किसी भी साफ सूती कपड़े में लपेटकर दीए की तरह बनाया जाता था और उसे जलाने के लिए शुद्ध सरसों तेल या गाय के शुद्ध घी का इस्तेमाल किया जाता था। तब तैयार होता था काजल...जिसे #कजरौटा में सुरक्षित कर लिया जाता था। सिर्फ बुरी नजर से बचाने के लिए ही नहीं बल्कि इस काजल को सुबह-सुबह हमारी आँखों में भी #चपोड़ दिया जाता था ताकि हमारी आँखें सुरक्षित रहे। उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि मानो ये माताएंँ बड़े से बड़े नेत्र रोग विशेषज्ञ की भी छुट्टी कर देंगी। आँखों की किसी भी समस्या के लिए इनका भरोसा इस होममेड '#काजल' या '#सुरमें' पर था।

दरअसल #काजल_उतारना या हमारी भाषा में जिसे #काजल_पारना' भी कहते हैं एक जिम्मेदारी का काम था, जो हर किसी के बस की बात नहीं थी। बचपन में मैं इस काम में पारंगत थी। यह काम काफी धैर्य और समय का था। जिसमें काफी धैर्य के साथ बिना हाथ हिलाए-डुलाए #कजरौटे को उस बाती की लौ पर लगातार नजर रखना होता था ताकि कजरौटे में काजल जम जाए। मुझमें मेरी मांँ ने गजब का धैर्य देखा और गृह कार्यों में रूचि भी.....इसलिए कई बार यह जिम्मेदारी मुझे ही दी जाती थी। लेकिन मुश्किल तब होती थी जब कभी यात्रा पर जाना होता था। उस समय पूरे कजरौटे को लेकर जाना रिस्की था क्योंकि कपड़ों पर कालिख लगने का डर होता। इसके लिए बहुत सारे लोग '#चुनौटी' का इस्तेमाल करते थे।

पहले के समय में छोटे बच्चे के जन्म के अवसर पर पीतल या लोहे के कजरौटे देने की भी परंपरा थी। आज भी कुछ लोग छठी या सतईसा के अवसर चांँदी के कजरौटे उपहार स्वरूप भेंट करते हैं। अभी भी छठी(जन्म के छठे दिन) के दिन जहाँ बच्चे को पहली बार विधि-विधान से नहाया जाता है, वहीं रात को बच्चे को उसकी फुआ द्वारा काजल करने का नियम है। चूँकि पहली बार काजल उसी रात को लगाए जाने का नियम है, इसलिए इसके बदले उन्हें काजल कराई #नेग (रुपया, कपड़ा, गहना जैसे उपहार)भी मिलता है। शादी में दूल्हा को परीछते समय गीत गा-गा कर किया गया काजल को कैसे भूला जा सकता है। जहाँ एक तरफ लड़की ब्यूटीपार्लर से #ब्राइडल_पैक का स्पेशल श्रृंगार कर के आती हैं, वहीं लड़का अपनी माँ-चाची के हाथों से किया गया लंबा-लंबा काजल लगाए हुए। काजल की धार इतनी गहरी होती है कि दूल्हा तो क्या #सहबाला तक को भी किसी की नज़र न लगे।

वैसे आप सभी को मालूम ही होगा कि 'काजल से भरी आँखें' और 'आँखों में खींची काजल की धार' पर कई फिल्मों के गाने भी बने थें और कई अभिनेत्रियों पर भी इसे सुन्दर तरीके से फिल्माया गया था, लेकिन अब यह सब देखने के लिए नई पीढ़ी को पुरानी फिल्में देखनी होंगी। वैसे आज भी नयी पीढ़ी के लोग 'कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना ' और 'तेरी आँखों का ये काजल' जैसे लोकप्रिय गीतों को उतनी ही मस्ती से आज भी गुनगुनाया करते हैं। मतलब कहा जा सकता है कि आज भी #काजल की महिमा अपरंपार है।

फिर भी इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि लंबे समय से बुरी नजर से बचाने के लिए ये 'काजल का टीका' एकमात्र '#रामबाण' औषधि थी, लेकिन अब न तो उतनी सतर्क माताएँ हैं और न काजल पर लोगों का भरोसा।आज कई नेत्र रोग विशेषज्ञ तो इसे कालिख की संज्ञा भी देते हैं और कई लोग इसे इस्तेमाल नहीं करने की सख्त हिदायत भी देते हैं। जबकि दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा नए नए ब्रांड के काजल के विज्ञापन भी दिखलाई पड़ती है। फिर भी आज कई लोग अपने छोटे बच्चों के माथे पर और आँखों को खूबसूरत बनाने के लिए काजल का बे रोकटोक प्रयोग करते ही हैं।

मैं तो यही कह सकती हूँ कि ईश्वर की मेहरबानी से हम और हमारी आँखें लगातार काजल के इस्तेमाल के बाद भी अभी तक सही सलामत हैं और अब तक चश्मा भी नहीं लगा है तो निश्चित रुप से इसमें काजल का बहुत बड़ा योगदान है। इसीलिए आज हम यह कह सकते हैं कि धन्य थीं हमारी माताएंँ और धन्य है हमारा '#कजरौटा'।

©Sharmila Shumee

लेखिका आकशवाणी के डाल्टनगंज केंद्र में उद्घोषिका के रूप में कार्यरत हैं।
31 Oct 2018, 00:20

बड़े घर की बहू


नाम रजनी,कोई शर्मा, वर्मा, दुबे, सिंह, साहू, तिवारी, शुक्ला नहीं। इनके जुड़ने से विशेष वर्ग नाराज़ हो सकता है। उम्र सत्ताईस वर्ष, गोल्ड मेडलिस्ट, फिजिक्स टीचर ,गौरवर्ण, शालीन, हँसमुख बड़ी मेहनती और बच्चों की चहेती। स्कूल के मिड टर्म एग्जाम शुरू होने वाले हैं। एक शार्ट मीटिंग खास निर्देश के लिये बुलाई गई थी। कल तीज का व्रत है। मैं अपने विशेषाधिकार का प्रयोग कर व्रती महिलाओं को जल्दी भेज देती हूँ। आज नहाय खाय था। धुले रूखे बालों में सिन्दूर सजाए, लाल हरी चूड़ियां पहने, माथे पर दपदपाती बिंदी लगाये महिलायें जंच रही थीं। आवश्यक निर्देश के बाद सभी टीचर्स जाने लगे।मुझे लगा कि रजनी का चेहरा उतरा सा है। मैंने उसे कहा रजनी फ्री पीरियड में आना, कुछ काम है। जी मैडम,थैंक्यू बोल चली गई।

रजनी इसी शहर के सम्मानित परिवार की पुत्रवधू है। पति इंजीनियरिंग की डिग्री रखता है किंतु पिता के खानदानी #ठेकेदारी से ही जुड़ा है। क्योंकि किसी के नीचे रहकर काम करना इनके पारिवारिक शान के खिलाफ था। लगभग डेढ़ घंटे बाद वो मेरे ऑफिस में आई। मैं चेयर छोड़ सोफे पर बैठी और उसे पास बैठाया।उसका हाथ स्नेहवश हथेली में लिया।अरे! तुम तो ज्वर से तप रही हों। दवा ली है या नहीं ? उसने कोई जवाब नहीं दिया। बस आँखे छलक गईं। कुछ तो गड़बड़ है ..मेरे मन ने कहा। रजनी बात क्या है? निःसंकोच कहो। क्या कहूँ मैडम...बताने में भी शर्म आती है। रजनी , तुम्हारे निजी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, किन्तु यदि मानवता के नाते कुछ किया जा सकता है तो बोलो। तभी उसने झुका सिर उठाया--"काँपती आवाज़ में बोली, ...मेरी कोई निजी जिंदगी नहीं है मैडम....पूरा घर जानता है कि मेरे साथ क्या होता है....मैं तो अपने बीमार पिता को भी नहीं बता सकती....जिस क्षण वो मेरी सच्चाई जान जायेगे उसी पल उनकी सांसे थम जाएंगी।
थरथराती हुई रजनी ने साड़ी का पल्लू हटाया, कमर, पीठ गले पर नील पड़े हुए थे। ये क्या? रजनी किसने? क्यों किया? उसने कहा---सच मेरे जीवन का, जो मैं किसी को बता नहीं सकती, दिखा नहीं सकती। बेल्ट से पीटा है उसने मुझे। फूट पड़ी...मैं पिछले चार दिनों से बीमार हूँ। गई रात वो लौटते है। वैसे तो #दारू-मुर्गा और #नाच के चलते अक़्सर रात-रात भर बाहर ही रहते हैं। पर किस रात आ जायें पता नहीं रहता। सारा घर सोता है ,मैं इंतजार में जागती हूँ क्योंकि घर के लाडले ठंढे फुल्के खाना नापसंद करते हैं। मेरी जिठानी ने सासु माँ को कई बार उलाहना दिया है,देवर जी की आदत ठीक नहीं। माँ कहती हैं---"इहे त् खेले खाय के उमर बा ,तू चुप रह, आपन जिनगी देख "

मैडम ,कल रात अचानक #औरंगाबाद से कोई #नाच देख कर नशे में धुत घर आया, वही फ़ूहड़ गाने गुनगुनाते हुए, शायद उसके दिमाग़ में वही नाचने वाली सवार थी। उसके पेट की भूख तो शांत कर दी मैंने, शरीर की न कर पाई.... बौखला गया,..बेल्ट से रुई की तरह धुन डाला। मेरी पिटायी देखकर अभी भी 3 साल की बेटी डरी हुई है। आज तो तन से ज्यादा गहरे घाव मन पे हुए हैं। बड़े घर की बहुएं मुँह नहीं खोल सकती। सासु माँ कभी-कभी अपने हाथों में ज़ख्म के निशान दिखाते हुए कहती हैं -" ई तो पूरा अपन बाप पर गइल हव , लेकिन का करब अब बढ़ घर के पूतोह बने में एतना तो सहहीं पड़ेला।" इतना कहते अपने एक दिन के अवकाश की अर्जी सामने रख दी।

तीज के अगले दिन भी वो नहीं आई।करीब दस बजे मैंने फोन किया। उधर से शिथिल स्वर में बोली "सॉरी मैडम, नहीं आ सकी। कल उपवास किया था, बहुत कमज़ोरी हो गई है। #स्लाइन चढ़ रहा है। घबरा के मैंने पूछा ---तुम्हारा पति कहाँ है? फीकी हंसी के साथ बोली, धीरे से -""वो तो तीज वाले दिन ही #शक्तिपुंज से कलकत्ता चले गए,अपने प्रिय स्थल "#सोनागाछी"। मेरा शरीर सुन्न सा हो गया उधर फ़ोन भी डिसकनेक्ट हो चुका था ।

©Renu Sharma
29 Oct 2018, 08:17

मारवाड़ी पुस्तकालय (since 1915)




डाल्टनगंज के ऐतिहासिक धरोहरों की बात की जाए तो एक महत्वपूर्ण नाम है-मारवाड़ी पुस्तकालय। सन 1915 में स्थापित इस पुस्तकालय के महत्व का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उस वक़्त के कई बड़े नेता महान विचारक और बुद्धिजीवी लोगों का स्नेह इस पुस्तकालय को सदैव मिलता रहा है। जी हाँ,कन्नीराम चौक स्थित इस ऐतिहासिक पुस्तकालय में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े-बड़े दिग्गजों का आगमन हो चुका है। इन महापुरुषों ने यहाँ पर रखी आगंतुक पुस्तिका में पुस्तकालय के लिए शुभकामना संदेश भी लिखें है जो आज भी पढ़ी जा सकती है।

अपने स्वर्णिम समय में यह एक समृद्ध लायब्रेरी थी।लंबे समय तक यह ज्ञानपिपासु लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रुप में लोकप्रिय रही है। आज भी यहाँ पर ढ़ेर सारी दुर्लभ पुस्तकें,पत्र-पत्रिकाएं और ऐतिहासिक अख़बारों की प्रतियां उपलब्ध हैं। जैसे भगत सिंह को फांसी लगने के दूसरे दिन का अख़बार, आज़ादी मिलने के बाद सुबह का अख़बार.... जैसे धरोहर, जो आज अमूल्य हैं।इसके अलावा यहाँ हिन्दी अंग्रेज़ी और उर्दू भाषा के ढ़ेर सारे दुर्लभ ग्रंथ हैं और उस समय की अनेक महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएं, जो आज हमारी बहुमूल्य धरोहर बन चुकी है।

इस लायब्रेरी के ऐतिहासिक महत्व और उसकी स्थापना से संबंधित बातों की जिज्ञासा के कारण कुछ दिन पहले पुस्तकालय गया था।उस समय वहाँ की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत बुरा लगा।आज भी यह लाइब्रेरी नियमित रुप से खुलती जरूर है परन्तु जिज्ञासु लोगों को पुस्तकें पढ़ने को नहीं मिल पाती है। वहाँ जाने पर हमें भी सिर्फ निराशा ही हाथ लगी क्योंकि पुस्तकों की सभी अलमारियां बंद थी।यह देखकर हमें बहुत दुःख हुआ।

आज 100 साल से अधिक पुरानी और हमारी अमूल्य धरोहर इस पुस्तकालय की बहुत बुरी स्थिति है। पलामू के नागरिक,लाइब्रेरी के संस्थापक सदस्यों के उत्तराधिकारियों और पलामू के जनप्रतिनिधियों को यह सोचना चाहिए कि उनकी अनदेखी और नाकामी के वजह से आज एक ऐतिहासिक धरोहर सीमित संसाधन और अव्यवस्था के कारण दुर्दशा की शिकार हो चुकी है।आज यहाँ पढ़ने के लिए पुस्तकें भी उपलब्ध नहीं हो पाती है। इसीलिए गिने चुने ही लोग वहाँ जाते हैं। वर्तमान में पुस्तकालय परिसर में शिक्षा के नाम पर तीन कमरों का तीन स्कूल चल रहा है। जिसमें विद्यार्थी तो कम हैं किन्तु 20 से ज्यादा शिक्षक पदस्थ है।

अपने शुरूआती दिनों में एक महान उद्देश्य को लेकर इस पुस्तकालय का निर्माण किया गया होगा।उस समय तत्कालीन समस्याओं के लिए समाधान के लिए,गुलाम भारत की आज़ादी के लिए और एक क्रांतिकारी प्रयास के रुप में समाज को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तकालय की स्थापना की गयी होगी। पर आज इस गौरवशाली पुस्तकालय के इतिहास और महत्व को देखते हुए पर्याप्त संसाधनों का विस्तार नहीं हो पाया।जिसके कारण यह जर्जर और उपेक्षित पड़ा हुआ है।जिम्मेदार लोगों के अनदेखी की वजह से आज यह महत्वपूर्ण स्थल अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

ठेठ पलामू के माध्यम से मैं सभी विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों,इतिहासकार और साहित्य प्रेमियों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि आप सभी आगे आएं और हम-सब मिलकर इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी को पुनः समृद्धि और यश के शिखर तक पहुंचाए और इसमें उपलब्ध ज्ञान के भंडार को वर्तमान और भावी पीढ़ी को उपलब्ध कराएं और इसको विलुप्त होने से बचाने का भरसक प्रयास करें ।

©रोहित पाठक
24 Oct 2018, 15:09

वेकेशन ओवर



छुट्टियों के बाद घर से लौटना।
लगभग हर शख्स आज परमानेंट एड्रेस और कोरेस्पोंडेंस एड्रेस की दूरियों में बंट गया है।

सफ़र के पहले हिस्से में जेहन में तैरते हैं छुटते लम्हे, पड़ोसियों की बतकहियों का विश्लेषण, इस साल त्यौहार के रंग-उमंग में आये फर्क, मोहल्ले में बन गयी नयी सड़क, अचानक से मुछ-दाढ़ीवान हो गए बच्चे, ओढ़नी सम्हालती ट्यूशन को जाती सहेलियों की टोली, पिछली पीढ़ी के टीचर और उनके इंजिनियर होते बेटे, मगर अब भी वैसी की वैसी पड़ोस वाली विधवा बुआ की बुरी लगने वाली बातें और अलग शहरों में बिखर गए स्कूली दोस्तों के कारनामे. चलती गाड़ी की खिडकियों से झांकते हुए विचारक बनने का सुख भी प्राप्त होता है और सब कुछ बदलने के प्रण लेता खुद में छुपा एक क्रांतिवीर भी झांकता है कुछ देर के लिए.

मगर दुसरे हिस्से में!
फिर वही खीच-पीच, कीच कीच!
असाइनमेंट्स, क्लास.
अटेंडेंस, मार्क्स.
ड्यूटी, नौकरी.
बॉस, सैलरी.
सिग्नेचर,फाइल.
फेक स्माइल.
टैक्स, किराया.
ट्रैफिक, पराया...

मगर दोनों वेरिएबल हिस्सों में जो कांस्टेंट होता है हमेशा- इयरफोन और रोमांटिक गाने के साथ गुनगुनाती तेरी याद.
छुट्टियों के बाद घर से लौटना।

मैं भी तो परमानेंट और कोरेस्पोंडेंस एड्रेस के बीच झूलता हूँ. मगर चाहता हूँ कि दोनों एड्रेस पे पहुँचने वाली मेरी चिट्ठियां तुमसे होकर गुजरे.

(बेटों की विदाई वाली पोस्ट की अगली कड़ी, थोड़ा philosophical way में)

© Govind Madhaw
22 Oct 2018, 07:57

कुलदेवता पूजाइ

 


पूरे पलामू में अगर देखा जाये तो कुलदेवी कुलदेवता का पूजन जिसे यहाँ की भाषा मे #पूजाई भी कहते हैं 3 ही समय होता है। सावन में , दसहरा में और होली के समय । और तो और पिछले दिनों एक पोस्ट पढ़ते समय पता चला कि कई लोगों के यहाँ के कुलदेवता का नाम #ब्रह्म बाबा या यहाँ के उच्चारण में #बरहम बाबा ही है। अब हमारे यहाँ प्रसाद के रूप में #दुधौरी_केरा चढ़ता है वैसे ही किसी के यहाँ #पुआ चढ़ता है। आज तमाम पाठकों से अनुरोध है कि आप भी अपने कुलदेवता का नाम ,पूजाई की तिथि और चढ़ने वाला प्रसाद कमेंट करें। जरा हम भी तो जाने की कौन-कौन से देवता हैं हमारे पलामू में ।
पूरे पलामू में अगर देखा जाये तो कुलदेवी कुलदेवता का पूजन जिसे यहाँ की भाषा मे #पूजाई भी कहते हैं 3 ही समय होता है। सावन में , दसहरा में और होली के समय । और तो और पिछले दिनों एक पोस्ट पढ़ते समय पता चला कि कई लोगों के यहाँ के कुलदेवता का नाम #ब्रह्म बाबा या यहाँ के उच्चारण में #बरहम बाबा ही है। अब हमारे यहाँ प्रसाद के रूप में #दुधौरी_केरा चढ़ता है वैसे ही किसी के यहाँ #पुआ चढ़ता है। आज तमाम पाठकों से अनुरोध है कि आप भी अपने कुलदेवता का नाम ,पूजाई की तिथि और चढ़ने वाला प्रसाद कमेंट करें। जरा हम भी तो जाने की कौन-कौन से देवता हैं हमारे पलामू में ।

हथिया




बरसात का अंतिम नक्षत्र #हथिया, इस बार तो #हथिया पलामू से रुष्ट ही रही और किसान टकटकी लगाए आसमान की तरफ देखते रह गए। इस नक्षत्र में के बारे में कहा गया है कि-

"आवत आदर ना दियो, जात दीयो न हस्त,
इतने में दोनों गए पाहून और गृहस्त।"

किसानों की आखिरी उम्मीद हथिया होती है, इस पर बहुत कुछ निर्भर होता है, अगर हथिया में बारिश हुआ तो समझिए धान होगा अन्यथा सारे फ़सल बर्बाद होने से कोई रोक नहीं सकता। क्योंकि इस समय सारे धान का बाल फुट जाता है और उसे पानी की आवश्यकता ज्यादा रहती है। अगर इस समय पानी मिल गया तो धान बहुत अच्छा होता है पर अगर इस समय बारिश नही हुई तो फिर सारा मेहनत बेकार। किसानों के लिये उनके फसल को मरते देखना जैसे पिता के सामने उसके संतान की मृत्यु देखने जैसी होती है। धान की फसल ही नहीं रबी की फसल भी हथिया की बारिश पर टिकी होती है। अब इसका असर चना, तीसी, सरसों पर भी पड़ेगा। पलामू को फिर से #अकाल_क्षेत्र_घोषित करना पड़ेगा।

पहले हथिया आने के पहले ही गाँव घर में लकड़ी जमा कर लिया जाता था क्योंकि हथिया जब #झर लगाता था तब किसी का बाहर निकलना भी मुश्किल हो जाता था। इसीलिए सभी जरूरत की सामग्री घर में जमा कर ली जाती थी.

हथिया के न बरसने का अर्थ है-
धान की लहलहाती फसल की #अकाल_मृत्यु

हथिया के न बरसने का अर्थ है-
कोठार और कुनबे का खाली पेट

हथिया के न बरसने का अर्थ है-

जीवन और जगत का अर्थहीन हो जाना ।

पलामू के अधिक्तर गाँव ऐसे ही है जहाँ सिंचाई की व्यवस्था नहीं है, अर्थात वो पूर्णतः मानसून पर ही निर्भर है। और इसका दुष्परिणाम यह है कि लगभग विगत 10 वर्षों से 1-2 वर्षों को छोड़ दिया जाये तो हर वर्ष ही उपज अपेक्षा के अनुरूप नहीं हुई है। सरकारी हिसाब से देखें तो 10 साल से लगातार ही अकाल ग्रस्त जिला घोसित होता रहा है और उम्मीद है होता भी रहेगा।

© Sunny Shukla
12 Oct 2018, 08:12

अंग्या बिजे



ये शब्द और कार्य किसी भी कार्यक्रम के महत्वपूर्ण अंग है। अगर #अंग्या_बिजे नहीं हुआ तो समझिए आपके घर कोई खाने नहीं आने वाला, और कहीं खाली #अंग्या मांग के भूल गए तो भी नहीं। इसीलिए हमारे यहाँ कहावत भी है "अंग्या मांग के बिजे गोल"।

अपने घर में सबसे छोटा होने के वजह से यह पुण्य का काम मुझे ही सौंपा जाता है। अंग्या मांगना अर्थात आपके घर में कार्यक्रम हो रहा है और आप उसके लिए खाने की आमंत्रण देने की सुचना देना चाहते हैं, तो उसके लिए इस शब्द का इस्तेमाल किया जाता है कि "आज हमर घरे के अंग्या बा" और बिजे करवाया जाता है, जब कार्यक्रम में खाना बन जाए और खिलाने का वक़्त आ जाए तो सभी के घरों में जा कर बिजे करवाया जाता है अर्थात खाना बन चूका है अब आप खाने आ जाएँ। अगर गलती से भी दोनों में से एक छूटा तो गांव घर के लोग और ख़ासकर #गोतिया को भयंकर बुरा लग सकता है और वो फिर नहीं आने वाले हैं। और हाँ #अंग्या_बिजे कराने के लिए हाथ में पानी से भरा #लोटा होना चाहिए जो गमछा या रुमाल से ढका होना चाहिये। वैसे हम सच बताए लोटवा भारी हो जाता है यही ला हम खाली रखते हैं अब ढँकने के बाद अंदर खाली है कि भरल केकरा देखाई पड़ता है। इसी बहाने हर घर घूम भी लेते हैं और भेंट मुलाक़ात भी हो जाती है। एक बात महत्वपूर्ण ये भी है की "सलोंगे अंग्या/बिजे बा" बोलना जरूरी है, #सलोंगे शब्द छूट गया या उन्हें सुनाई नहीं दिया तो परिवार का एक ही सदस्य आएगा। सलोंगे मने होता है सभी लोग का मतलब तब ही सपरिवार आपके घर भोजन पर सब आएंगे।

अब इस चलन की शुरुआत पर नजर डाला जाये तो चूंकि हमारी संस्कृति में आसपास गांव-घर के लोगों का हर सुख दुःख में शामिल होना जरूरी होता है। उसी प्रकार से जब आपके यहाँ कुछ भी आयोजन है तो उन्हें खिलाया-पिलाया भी जाता है। अब अंग्या देना मतलब दो बात हो गई, एक तो उन्हें पहले से ही इस बात की जानकारी देना कि आज आपका और आपके पूरे परिवार का भोजन हमारे घर बनेगा ताकि आप उसी के हिसाब से अपने घर भोजन बनायें और अन्न की बर्बादी न हो। साथ ही दूसरे शब्दों में कहे तो उनसे आज्ञा भी ली जाती है कि हमारे यहाँ आपका और आपके परिवार के लिये भोजन की व्यवस्था है। अतः आप हमें आज्ञा दे कि हम सबके लिए भोजन अपने घर बनवाये। इसीलिए तो कई बार जब बिना #अंग्या के अगर बिजे करवाने चले जायें तो झट से लोग कह देते हैं कि "हमनी के तो पते न हलक, अभिये तो घरे सब खाना खईली"। खैर #गोतिया लोग तो कभी-कभी मान भी जाये पर शादी वियाह में अगर गलती से छुट गया तब तो कितना बाराती बिना खाये ही रह जाते हैं। तो यह सिर्फ़ एक चलन या नियम ही नहीं बल्कि इसी बहाने दिया जाने वाला सम्मान है।

एक बार हम बिजे करवा रहे थे बोले "बिजइया बा " अब 2-4 वर्ड छूट गया सामने चाची थीं एक बोली "बिजइया त नहर देन गइल बा" अब बिजय उनके बेटे का नाम था और नाम के आगे या/वा लगाना तो हमारा प्यारा रिवाज है। ख़ैर इस कला पर विशेष बात होगी कभी।

तो आगे से अंग्या मांग के बिजे गोल मत करियेगा।

©Sunny Shukla
10 Oct 2018, 08:13

हूर मधेया की कहानी





#हूर-मधेया एक ऐसा गांव जो पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिले के अंतर्गत गोवावल क्षेत्र में आता है। #दानरो नदी के किनारे बसा ये गांव गढ़वा जिले से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक ऐसा गांव जहाँ सभी जाति धर्म मिल-जुलकर प्यार, मोहब्बत से रहते हैं। कहा जाय की हूर-मधेया गांव पलामू प्रमंडल का सबसे बड़े गांवो में से एक है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नही होगी। लगभग 11 #टोलो का यह गांव यही इसकी विशालता का परिचय देता है। हूर और मधेया दो अलग-अलग गांव है, #मधेया पंचायत के अंतर्गत ही #हूर गांव आता है, अर्थात हूर और मधेया एक-दूसरे के प्रतिरूप हैं। इसलिए हूर मधेया कहा जाता है।

हमारे पलामू के हरेक गांव के पीछे एक कहानी होती है वैसे ही हमारे गांव की भी कहानी है। कई साल पहले हूर मधेया गांव परसबन से घिरा हुआ था। यहाँ एक जाति निवास करती थी जिसका नाम #मार-मारिन। हूर गांव में स्थित बड़े पोखरे की खुदाई इन्ही #मार-मारिन के द्वारा किया गया था।लेकिन कहा जाता है की टीबी की बीमारी फ़ैल जाने के कारण धीरे-धीरे ये लोग यहाँ से चले गए।

उसके बाद फिर यहाँ दूसरे जगह से लोग आकर बस गए। उनमें से मुख्यतः एक हैं चौबे और दूसरे तिवारी। हमारे पूर्वज बताते हैं की चौबे लोग उत्तरप्रदेश के #कन्नौज से आये थे #रंका_राजा के यहाँ पूजा कराते थे। #तिवारी लोग #उत्तरप्रदेश से आये थे। चौबे और तिवारी परिवार में मामा-भगिना का रिश्ता है। जब तिवारी लोगो के घर शादी होती है तो #मड़वा मे माटी कोड़वाने के लिए चौबे के घर से एक महिला जाती है और माटी कोड़ती है। कहा गया है की भगिनी(चौबे की घर की कोई महिला) के हाथों से कोड़ा जाय तो शुभ होता है। इसी परम्परा का निर्वाह हमलोग कई सालो से करते आ रहे हैं। आबादी में चौबे अधिक और तिवारी कम हैं। कहा जाता है की हमलोग के पूर्वज ने ही और सभी जातियो को अपना जमीन देकर बसाया। अब तक दो बार महायज्ञ का आयोजन किया जा चूका है। पहली बार हमलोगो के जन्म से पहले 1990 में आदरणीय गुरु महाराजः #देवनराणाचार्य के नेतृत्व में सम्पूर्ण ग्रामवासी के सहयोग से भव्य यज्ञ सह भण्डारा का आयोजन आयोजन बगीचा स्थित शिव मंदिर ,हनुमान जी, प्रांगण में किया गया। लगभग 22 सालो के बाद सन् 2012 में महायज्ञ हुआ। हमारे गाँव में एक बगीचा नामक पवित्र स्थल है जहाँ शिव मंदिर ,हनुमान मंदिर, दुर्गा मंडप है। बगीचा में प्रत्येक वर्ष भव्य 10 दिनों के लिए दुर्गापूजा का आयोजन होता है, जिसमें कथावाचक महराज को बुलाया जाता हैं।

एक और महत्वपूर्ण तीर्थस्थल #अड़ंगा_बाबा है। इन्हें भूखों का बाबा भी कहा गया है। इसके पीछे ये कहानी है कि कोई भी गरीब भूखा नही सोता था, अगर किसी के पास खाना न हो तो वो बाबा के पास आकर हाथ जोड़ते ही अड़ंगा बाबा के आशीर्वाद से थाली, लोटा, पूरी-सब्जी तैयार हो जाता था। खाने के बाद थाली को धोकर रख देने के बाद एकाएक थाली गायब हो जाता था। लेकिन लोग इसका दुरूपयोग करने लगे थाली और लोटा अड़ंगा बाबा के पास नही रखने लगे। अब ये कहानी तो वो थी जो हमने सुनी थी लेकिन उससे भी अच्छी बात ये है कि यहाँ के मन्नत पुरे होने पर कोई चढ़ावा या प्रसाद नहीं चढ़ाता बल्कि जितने गरीब लोगों को खाना खिलाने को #गछा(वादा किया ) जाता है उतने गरीब लोगों को भोजन करवाता है। अब उपर की कहानी और प्रचलन की बात की जाये तो ऐसा लगता है कि लगभग दिन किसी न किसी का मन्नत पूरा होता होगा और कोई भूखा वहाँ जाये तो उसे खाना मिल जाता होगा।

हमारे दादाजी कहा करते थे की गांव में दानरो नदी स्थित भव्य #पहलवानी अखाडा का आयोजन किया जाता था जिसमे आस-पास के गांव के सभी लोग शमिल होते थे और अपनी पहलवानी का जौहर दिखाते थे।

मुसलमानो का महत्वपूर्ण पर्व मुहर्रम भी हमारे गांव में भव्य तरीके से मनाई जाती है। मुहर्रम से दो दिन पहले #सतई का मेला पुरे झारखण्ड में प्रसिद्ध है। इस दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। सतई के दो दिन बाद मुहर्रम में भव्य #ताजिया मुसलमान भाइयो द्वारा पुरे गांव में निकाला जाता है, जिसमे गांव के सभी हिन्दू धर्म के लोग पेड़ा, शरबत लेकर तैयार रहते हैं,और आपसी भाईचारे का परिचय देते हैं।

#मार_मारिन से एक प्रश्न दिमाग मे आता है कि क्या ये ही एक आदिम जनजाति थी जो गढ़वा के आसपास के गांव मे रहती थी या वहाँ भी हमारे आदिवासी #चेरो समुदाय के लोग रहा करते थे। या फिर ये #मार_मारिन #चेरो ही थे। अगर कुछ जानकारी हो तो जरूर लोगों तक पहुचाये।

©Ankit Kumar Chaubey
8 Oct 2018, 08:43

लातेहार के दोस्त




हिन्दी दिवस तो बीत गइल, लेकिन एगो बात कहेला बाकि रह गइल। हिन्दी में बात करेला तो हम मैट्रिक के बाद ही सीखली। ओकरा से पहले तो मगही ही हमर भाषा रहे। ओइसे पढ़ेला तो हम हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू आऊ फारसी भी पढ़ले हली, लेकिन बोले खाली मगहिये आवे हलक।
गजब तो इहु हलन कि हमार गुरूजी गणित, विज्ञान आऊ अंग्रेजी भी तब मगहीये में पढ़ा देवे हलन। आऊ तो आऊ इंटरमीडिएट फर्स्ट ईयर में #ठाकुर सर से पढ़ले रहली, उ तो #कैलकुलस, #कोआर्डिनेट आऊ #अल्जेबरा तक मगहीये में पढ़ा देवत रहन। उ समय अगर कोई हिंदी/उर्दू में बात कर हलक तो सब ओकरा बड़ी पढ़ल-लिखल समझे हलन। आऊ जो थोड़ा सा भी अंग्रेजी जाने हलक उहे तनी-मनी अंग्रेजिये में बात करे हलक।आऊ ओकर इज्जत तो गाँव-घर में पूछा मत।


जब पहली बार घरे से राँची गईली तो हिंदी सही से बोले न आवे हलक। ट्यूशन में भी कोई से बात करती तो लइकन लोग जवाब देवे से पहिले सवाल ही कर देवत रहे कि , "पलामू से हो क्या ?"
लगभग 3 महीना तक तो कोशिश कईली के अच्छा से हिंदी बोले ला सिख जाऊँ,
लेकिन कोई फायदा न दिखल! फिर दिमाग में एगो बात आइल की खाली पलामू के लइकन से बात करब, काहे की इनलोग तो ना न पुछिहन के "पलामू से हो क्या ?"
आऊ एही करेला शुरू कैली!
अगला कुछ दिन में जो भी दोस्त बनलन सब पलामू के रहन! आऊ राँची में हमरा ला पलामू कोई जिला के नाम नाहीं हमर धरम के नाम रहे!
काहे से की ऊहाँ कोई भी लइका मिले हलक तो हमर पहला सवाल एही होवे हलक के "कहाँ से हो भाई ?"
आऊ जइसहीं अगला के मुँह से पलामू सुनती तो अईसन लागत के बिछड़ल भाई मिल गईल! चाहे उ केहू धर्म/जात के होवे! आऊ ओकर बाद तो ओकरा से जेतना बात करती सब मगही में!

एक बार रूम में राँची जिला के एगो लइका रहे आइल! अगले दिन से ओकर 4 गो यार रोज-रोज आके हल्ला-गुल्ला करे लगलन! दू-चार दिन तो मटियौली! ओकर बाद मना कईली तो उलटी हमरे बोले लगलन के "पलामू से आके यहाँ रँगदारी न करो, न तो बहुत बुरा होगा"। उ समय तो हमर दिमागे काम करे ला बन्द कर देलक, काहे से कि हम कभी कोई से लड़ले झगडले न हली! फिर बगल के रूम में गइली, उ में सब लातेहार के लइकन रहे हलन, उहनी से बतैली के भाई अइसन बात है! उलोग तुरन्त बोल्लन "चल तो रूम में कौन रँगदार आइल बा हमहुँ देखीं!" जइसहीं रूम में अइली तो उहनीन से लातेहार वाला जो लइका रहे उ पुछलक के "कौन मारे ला बोल रहा है रे, कौन रँगदार बन रहा है"। एतना सुनते चारों चुप-चाप उठलन आऊ चल गइलन! ओह दिन अइसन लागल के एगो आउ भाई मिल गइल! #लातेहार_वाला_भाई!
ओह दिन के बाद उहनीन आवे भी तो जब तक हम रूम में रहीं सब एकदम शांत बैठल रहे, हमरा रूम से निकलला के बाद ही हल्ला गुल्ला करतन।
आऊ रूम में भी सब लातेहार के रहन, हमहीं अकेले रहनीं ऊहाँ पलामू के! लेकिन उलोग हमरा साथे कभी कोई भेदभाव न करलन! साथे खाना-पीना, सबलोग रूम में मगहिये बोलत रहलीं, तो अइसन लागे लागल के अपना गाँव में ही, अपना घर में ही! आउ ओह दिन से आज तक मगही बोले में कभी शरम न महसूस होईल! आऊ आज भी हमरा मगहीये बोले में अच्छा लागेला!

भले आज पुरनका पलामू जिला तीन भाग में गढ़वा, पलामू, लातेहार में बँट गइल बा, लेकिन हमीन के भाषा ही बा जे सबके आज तक सब के जोड़ के रखले बा। आउर सबके जरूरी बा कि अइसही जुड़ल रहथ।
#थैंक्स_पलामू
#थैंक्स_मगही
#थैंक्स_लातेहार
❤❤❤

©️ Sawud Alam
6 Oct 2018, 05:19

जितिया कथा




कहा जाता हैं एक बार एक जंगल में चील और लोमड़ी (सियार) घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी। उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वही लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था। चील ने कथा में बताये नियमानुसार निर्जला उपवास किया जबकि सियार ने मांस खा लिया। चील के संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बच पाये। इसलिए पर्व में चील और सियार का बार-बार ज़िक्र आता है और पहले और तीसरे दिन खाना पहले इन्हें ही खिलाया जाता है। हमारे यहाँ इन्ही चील और सियार को चिल्हो-सियारो कहा जाता है।

यह पर्व महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं और इसके सम्बंध में दो कहानियाँ है जो इस प्रकार है।

महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी। जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी। उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया। जिसे निष्फल करना नामुमकिन था। उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम #जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना। तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं।

दूसरी कथा कुछ ऐसी है कि गन्धर्व राजकुमार #जीमूतवाहन को पिता द्वारा राजगद्दी पर बैठाकर वन की ओर चले गए। राजकुमार का मन राजकाज में न लगा तो वो राजपाठ भाईयों के हवाले कर पिता की सेवा में वन चले गए। उसी वन में उनका विवाह #मलयवती नामक कन्या से हुआ। एक दिन वन में घूमते हुए राजकुमार काफी आगे निकल गए जहां उन्होंने बूढी़ औरत का रोना सुनाई दिया उस औरत से पूछने पर उसने बताया कि वह #नागवंश की स्त्री है उसका एक ही पुत्र है #शंखचूड़। नागराज ने गरूड के समक्ष प्रतिज्ञा की है प्रत्येक दिन एक नाग सौंपा जाएगा और आज उसके पुत्र की बारी है। इस बात को सुन #जीमूतवाहन ने उस स्त्री को कहा कि वह चिंतामुक्त रहे उसके पुत्र की जगह वह जाएगा। इतना कह वह लाल कपड़ा #शंखचूड़ से लेकर गरूड की चुनी हुई जगह पर लेट गए। गरूड़ अपने नियत समय पर आकर अपने भोजन को पंजे में दबाकर चोटी पर बैठ गए अपने चुंगल में आए प्राणी की आह व आंसू न देख गरुड़ ने उससे उसका परिचय पूछा तो राजकुमार ने सारी बात बता दी। गरुड राजकुमार की बहादुरी से प्रसन्न होकर उसे जीवनदान दिया और नाग जाति की बलि न लेने का वचन दिया। जीमूतवाहन की बहादुरी से संपूर्ण नाग जाति की रक्षा हुई। तभी से जीमूतवाहन की पूजा का विधान शुरु हुई।

इस प्रकार से #जितिया से सम्बंधित दोनों कथाएँ समाप्त हुई।

ठेठ पलामू की तरफ से सभी माताओं को प्रणाम और उनके सभी संतानों से निवेदन है कि जो माँ आपके लिये इतना कठिन व्रत करती हैं आप भी उनके लिए जिम्मेवार बने, पूरे जीवन भर उनका सहारा बने ।

©️Sony Pandey
3 Oct 2018, 07:36

नहाय खाय




हमारी गौरवशाली लोक संस्कृति में ढ़ेर सारे ऐसे पर्व/त्यौहार हैं जिस पर अभी तक पश्चिमी सभ्यता और बाजार का असर नहीं पड़ा है। उसी में एक है - खर जिउतिया जिसे जीवित्पुत्रिका के नाम से भी जाना जाता है। यह कठोर व्रत अपनी संता न के सुखद,मंगलमय और दीर्घ जीवन के लिए किया जाता है।

आज भी जब कोई घोर दुर्घटना होने के बावजूद कुशल-मंगल लौटकर वापस अपने घर आता है तो गांव-घर-परिवार के लोग बोलते हैं कि - बाबू! इ तोहार माई के खर जिउतिया के फल बा।

अगर हम अपने यहाँ के संस्कृति और पर्व की बात करें तो लगभग सभी पर्व तीन भाग में मनाये जाते हैं। नहाय-खाय, उपवास और पारण। अब चाहे छठ , तीज, जितिया, करमाइत्यादि कोई भी पर्व हो उसमे ये तीन विधान होते ही हैं।

मुझे तीज और जिउतिया दोनों बहुत कठिन व्रत लगते हैं।24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला उपवास...यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इस परम्परागत पर्व को सिर्फ पलामू के गांव/कस्बों में ही नहीं बल्कि उतने ही आस्था,समर्पण और विश्वास के साथ अब देश-विदेश के महानगरों में पढ़ी-लिखी/अच्छी बड़ी नौकरी करने वाली आधुनिक महिलाओं के द्वारा भी उतने ही समर्पण के साथ मनाया जाता है।

वास्तव में "खर जिउतिया" का पर्व अपने संतान के प्रति असीम प्रेम और त्याग का प्रतीक है जिसमें उनकी निष्ठा और विश्वास के आगे सभी तर्क नतमस्तक हो जाते हैं।

आज ही से शहर में खीरा और नेनुआ की पत्ती और दातुन( दतवन) की खोज होनी शुरु हो गयी है क्योंकि कल बाजार में इसका मूल्य दसगुना बढ़ जाएगा। नहाय खाय के दिन इन चीजों के अलावा झिंगी( कोमल खींचा झिंगी जिसे सत्पुतिया भी कहते हैं ), बराई का दाल, अरवा चावल का बहुत मान्य होता है। पौराणिक कथा का अनुसरण करते हुए प्रतीकात्मक चील्हो-सियारों के लिए कल स्वादिष्ट भोजन इसी में परोसा जाएगा। ये बात अलग है कि अब चील और सियार तो मिलते नहीं लेकिन चिड़िया-कौओं की मौज रहती है कि वह बिना डरे, बेफिक्र स्वादिष्ट भोजन को ग्रहण करेंगे।

फिर उसके अगले दिन पारण होगा।उस दिन दही-गुड़ परोसा जाएगा। बेजुबान पक्षी भी आशीर्वाद देंगे कि त्याग की मूर्ति माँ, खुद भूखी-प्यासी रहकर जो हमें भोजन समर्पित कर रही है उनकी औलाद पर कोई मुसीबत नहीं आए और वह हमेशा खुश रहें।

ठेठ पलामू परिवार की तरफ से खर जिउतिया व्रत करने वाली सभी माताओं को सादर प्रणाम और शुभकामनाएं।

©️Ajay Shukla
1 Oct 2018, 08:38

जितिया




बचपन में कई त्योहारों का बेसब्री से इंतजार होता था।उसमें एक #जीवत्पुतिका व्रत जिसे ठेठ भाषा में '#जितिया' भी कहते हैं। वजह बस इतनी सी कि एक से एक पकवान खाने को मिलेंगे और ये खुलासा भी होगा मां कहीं हमसे ज्यादा भईया को तो प्यार नहीं करती।

इसका अनुष्ठान एक दिन पहले 'नहाय खाय ' से शुरू होता। बहुत मशक्कत के बाद बाबूजी नोनी का साग, मड़ुवा का आटा और बराई के दाल का जुगाड़ कर पाते। सबसे दुर्लभ और जरूरी होता खींचा (मुलायम और छोटा) 'झींगी' मिलना, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि शाकाहारी महिलाएं नहाय खाय के दिन झींगी निगलेंगी और इसकी सब्जी खाएंगी। मांसाहारी महिलाओ के लिए छोटी से छोटी मछली (शायद झींगा) निगलने की बातें बचपन से हम सुनते आए हैं। नहाय खाय के दिन शुद्ध घी में मड़ुवा के आटे का हलवा, पूरी, नोनी का साग, सेवई और ठेकुआ बनता, जिसे दीवार से सटकर खड़ा कर दिया जाता। जिसे "#ओठंगना" का नाम दिया जाता। जितने बेटे उतने 'ओठंगना' , पर बचपन से ही अपने अधिकारों के प्रति सचेत हम तीनों बहनें यही देखने में रहतीं कि कहीं मां ने सिर्फ भईया के लिए ही तो 'ओठंगना ' नहीं रखा? हमारी यह मंशा मां पहले ही भांप जातीं और चार 'ओठंगना' हर साल ओठंगांती।

फिर बारी आती जितिया के चौबीस घंटे का निर्जला उपवास की। भूखे-प्यासे रहकर भी हम सब की मांए हमारे भोजन का प्रबंध करती हैं। खुद तो मुंह में एक 'खर ' तक नहीं लगातीं। तभी तो इसे 'खर जितीया' कहते हैं। और कहावत ये भी हैं कि संयोग से कोई अगर मौत के मुँह से निकल आए तो लोग कहते हैं कि - 'जरूर एकर माई खर जितीया कइले होखी तबे इ बच गइल' । #जितीया के प्रति इतनी श्रद्धा और विश्वास। दतवन तक नहीं करने की परंपरा है इस पर्व में। शाम का इंतजार होता सबको, पूजा की तैयारी होती, सूती लाल नई साड़ी में अक्सर मां सजी होतीं। मुहल्ले की औरतों का मानना था कि 'सोने का जितीया सिर्फ बेटे के लिए पहना जाता है, बेटी के लिए चांदी का जितीया होता है'! हम बेहद खुशनसीब हैं कि ईश्वर ने हमें ऐसे माता पिता दिए जिन्होंने कभी बेटे और बेटी में फर्क समझा ही नहीं। किसी की सलाह पर अमल न करते हुए हमारी माताजी ने चार सोने का जितीया हम चारों भाई बहनों के लिए बनवा रखा था। पूजा में भी हम सब एकसाथ बिना किसी भेदभाव के शामिल होते। चंद्रमा को अर्घ्य देने और जीवत्पुतिका व्रत की कथा के साथ रात भर का उपवास होता।

फिर होता बेसब्री से सुबह होने का इंतजार। अहले सुबह मां की नींद खुल जाती। शाम को पांच तरह की सब्जी, पांच तरह के दाल और धनिया पत्ती की भरपूर व्यवस्था कर ली जाती। सुबह सवेरे चुल्हा लीपकर आग जला दिया जाता और बारी-बारी से पांच तरह की सब्जी और पांच मिक्स दाल बनाकर जीरा और लहसुन के साथ भर कलछुल शुद्ध घी की छौंक लग जाती। सोए हुए में यह सोंधी खुश्बू नाक तक पहुंचती तो हड़बड़ा कर उठ जाते हमसब। #पारण की शुभ घड़ी सामने जो होती।गरमा-गरम #सोनाचूर के चावल का मांड़ पसाया जाता, उधर धनिया पत्ती की चटनी भी सिलउट पर पीसकर तैयार होती। तबतक ऐलान होता कि #पतई में कर के पहले चील कउआ को खाना दिया जाएगा तब कोई भोजन में हांथ लगाएगा। सच पूछिए तो उसदिन 'चील-कउआ' की किस्मत पर जलन होती थी।यह परंपरा निभाने के बाद भी थोड़ा और इंतजार करना पड़ता कि पहले मां(व्रती) खाएंगी तब बच्चे खाएंगे।तबतक तो सब्र का बांध जाने कईबार टूट जाता! कई दफा तो ऊंगलियां चुपके से चटनी में चली जातीं और परंपरा टूट सी जाती। पर ये सब बच बचाकर करना पड़ता। काफी खतरा भी था। पारण का भोजन जब मिलता तो उसका स्वाद आज के खूब सजे-धजे पांच सितारा होटलों से कई गुणा अधिक होता। अब न तो उस भोजन की खुश्बू मयस्सर है न शुद्ध घी और न पहले जैसी बिना खाद और मिलावट की ताजी सब्जियां। फिर भी जितीया तो हम मनाते ही हैं उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ।

©️ Sharmila Shumee
2 Oct 2018, 06:00

आकाशवाणी पलामू




6 सितंबर 1993 को मेदिनीनगर की धरती पर आकाश से एक वाणी सुनाई पड़ी थी "आकाशवाणी "!

किसी को अपने कानों पर यकीन नही हो रहा था कि जंगलों, पहाड़ों से आच्छादित पलाश, लाह और महुआ की धरती पलामू में कुछ ऐसा चमत्कार हुआ है!

किसी चीज की असली कीमत तब हमें समझ में आती है जब उसके पीछे हम काफी परेशानी झेले होते हैं। पहले रेडियो पर शार्ट और मीडियम वेव पर आवाज साफ सुनाई नही पड़ती थी, तो लोग झुंझलाहट मे रेडियो पटक तक दिया करते थे और उसे हमेशा झकझोरते भी थे। ऐसी स्थिति में जब आकाशवाणी डाल्टनगंज में एफएम की शुरुआत हुई तो यहां के लोगों के (रेडियो प्रेमियों के )सपनों को मानो उड़ान मिल गई। फिर तो वे पंख लगाकर उड़ने लगे आकाश में आकाशवाणी के संग। क्योंकि अब जो आवाज रेडियो सेट से आ रही थी वो बिल्कुल स्पष्ट और धमाकेदार थी। लगता था मानो प्रस्तुतकर्ता हमारे सामने बैठकर बोल रहे हों। फिर क्या था फिर तो सिलसिला सा चल पड़ा साइकिल पर एफएम रेडियो, पंक्चर की दुकान, पान गुमटी, कार, खेत-खलिहान रसोई यहां तक की भैंस पर बैठकर भी रेडियो सुनने का सिलसिला शुरू हो गया। क्योंकि रेडियो श्रोता का पढा लिखा होना भी जरूरी नहीं। अखबार से समाचार जानने के लिए पढाई की जरूरत है, पर रेडियो से समाचार तो अनपढ या अंधे व्यक्ति भी सुन सकते हैं। रेडियो ने सरहदों की सीमाएं भी नहीं मानी। जंगलों पहाड़ों, नदियों से होकर भी इसकी आवाजें छनती रहीं और लोग भावविभोर होते रहे कजरी, सोहर, राखी गीत, विवाह गीत, देवी गीत क्या कुछ सुनने को नही मिलता गंवई श्रोताओं का अपनी ही माटी की खुश्बू अपनी ही भाटी से। लगता है जैसे हमारे बीच का कोई रेडियो से हमारा मनोरंजन कर रहा और यही तो सच भी है!जिन्हें भी मीडिया से जुड़ने का शौक था और हिंदी पर अच्छी पकड़ थी वे बतौर उदघोषक /उदघोषिका /एंकर आपका मनोरंजन करने को एक कठिन स्वर परीक्षा का सामना करके आ गए आपके द्वार। अब तो आपकी सुबह ,शाम और रात इनकी आवाज के साथ ही होती है। रेडियो से जूड़े ये सारे लोग घर घर में नाम से लोकप्रिय हैं।

किसानो को मिला 'किसानवाणी" कार्यक्रम, जिसमें कृषि संबंधी सारी उत्सुकता का हल, तो युवाओं को मिला 'युववाणी' साहित्य प्रेमियों को मिला "खुला आकाश ",खेल प्रेमियो को "खेल गतिविधि" महिलाओं को 'घर आंगन' तो बच्चों की 'बालसभा' और गानों के शौकीन लोगों को 'गीत गुंजन' गाने तराने, बाइस्कोप, चित्रपट से ,आपकी पसंद, एक रंग और रजनीगंधा जैसे बेमिसाल कार्यक्रम। स्वास्थ्य संबंधी सारी परेशानियों का हल घर बैठे मिला 'स्वास्थ्य चर्चा "और 'कल्याणी' कार्यक्रम के तहत ।सबकुछ तो मिल ही जाता है एक ही जगह एक ही सेट पर । बस टयून करना होता एफएम 103 मेगाहर्ट्ज पर आकाशवाणी का डाल्टनगंज केंद्र।

6 सितंबर 2018 दिन गुरुवार को मनाया आकाशवाणी डाल्टनगंज ने अपना ऐतिहासिक रजत जयंती। इस रजत जयंती के उपलक्ष्य में आप भी अपनी आकाशवाणी से जूड़ी यादों को साझा किजिये।

© Sharmila Shumee

-शर्मिला 'शुमि',उदघोषिका आकाशवाणी डाल्टनगंज
8 Sep 2018, 07:34

खईरिका





बदलत परिवेश अउरी अधुनिकता में सबकुछ बदल गेल बा...खान-पान ,रहन-सहन ,पेन्हन-ओढ़न सब कुछ। ई सब बात ओह समय सुनाइल जब एक शादी के पार्टी में खाना खाये के बाद एक साथ बाबा/दादा और उनकर हमउम्र बईठल हलन, काहेकि उनहन के जरूरी रहल खाये के बाद दाँत में फंसल #सँखरी के निकालेके जेकरा खातिर ऊ सब के जरूरत रहल एगो #खईरिका(खरिका) के......लेकिन उनकर ई ज़रूरत के पूरा करे वाला कोई देखाइत न रहे।

आज-कल बुजुर्ग लोग भी समय के साथ समझौता कर लेले हत, काहेकि अब के लईकन के तो उनहन के बोलल बहुते शब्द समझ में ना आवेला आउर साथे-साथे ऊ सब चीज के मिलल भी गाँव-देहात के अलावा आउ कहँउ सम्भव नईखे।

विलुप्त होईत संस्कृति और संस्कार से एकदम से आपन पहचान मिटे के कगार पर बा ,उनहन के ई बात सुनके आपन बचपन याद आ गइल जब घर के ओरिहानी के नीचे खईरिका (नीम की पत्तियों के बीच का पतला डण्ठल, जो अपने समय का सबसे फेवरेट #टूथपिक हुआ करता था और बुजुर्गों को खाना खाने के बाद जरूरी होता था) के #एकमुठ्ठा हमेशा बाँध के टाँगल रहत रहे ,आऊ दादा/बाबा जब भी खाना खा के उठतन ,निकलते के साथ एक लोटा पानी आऊ खईरिका जरूर माँगतन। हालाँकि आज ओकर जगह प्लास्टिक के डब्बा में पैक टूथपिक ले लेले बा ,लेकिन नीम के ऊ खईरिका के आपन अलग ही पहचान अऊर महत्व रहल।

©Rakesh Bharti Goswami
4 Nov 2018, 06:50

मटखान



बेला आंटी ने ऑफिस से छुट्टी ले रखी है। फगुनी काकी के साथ मिल कर घर की सफाई जो करनी है। साल भर बाद तो आती है #दीवाली। ऐसे में बेला आंटी का #प्लास्टर_ऑफ़_पेरिस से पूता शानदार घर दुल्हन की तरह सज जाना चाहिए। बच्चे मदद कम परेशान ज्यादा कर रहे हैं। चारों तरफ दीवाली की धूम है।

इन धूम-धड़ाके से कोसों दूर #गढ़वा_पलामू के सुदूरवर्ती गाँव के लोग हाथों में कुदाल और माथे पर टोकरी लिए #मटखान की और चल पड़े होंगे। इन भोले-भाले लोगों को नहीं मालूम कि पलामू की मिट्टी का PH मान 4.8 से 8.9 है। इस मिट्टी में जैविक कार्बन 0.10 %से 1.64%, नाइट्रोजन 120 से 809 kg/हेक्टेयर, फास्फोरस 0.2 से 38.2 kg/हेक्टेयर, पोटाश 76 से 1680 kg प्रति हेक्टेयर, सल्फर 0.61 से 82.86 mg/kg, लोहा 95.4%, मैंगनीज़ 95.4%, कॉपर 94.1% तथा जिंक 85.7% है। इन्हें ये भी नहीं मालूम कि लौह तत्वों की अधिकता के कारण उनकी मिटटी का रंग इतना लाल है।

इन लोगों के लिए तो ये मिट्टी माँ है, प्रेयसी है, जीविका है, ईश्वर है, सब कुछ तो है और हो भी क्यों ना इसी मिट्टी से वे घरों की पुताई करेंगे और पूरे साल उसकी सौंधी खुशबू को महसूस करेंगे। माटी के दीयों की पवित्र रोशनी न जाने कितने घरों में आशा और प्रेम का संचार करेगी, कितनी ही मासूम बालिकाएंँ इस माटी से घरौंदे बनाएँगी और अपनी #काल्पनिक_गृहस्थी बना लेंगी, देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे अमीर-गरीब सभी सर झुकाएंँगे और खुशहाल जीवन के लिए प्रार्थना करेंगे। किसी भी लाडली का विवाह बिना चौमुख दीया, ढकनी और कलशों के नही होता। "माटी उनके लिए आराध्य है, तो मटखान उनका मंदिर।"

हमारे गाँव के #पछियारा छोर पर एक मटखान है, मेरे घर से कोई 2 km दूर। वहाँ की माटी एकदम चिकनी और लाल है। वहाँ पहुँचने के लिए एक कब्रिस्तान से गुजरना पड़ता है। बचपन में हम सभी बच्चे दीवाली से पहले मटखान जाने के लिए उतावले रहते थे और मौका पाते ही गमला या बड़ा कटोरा ले कर #बनिहारिन के साथ हो लेते। उन दिनों हमें ये लगता था कि कब्रिस्तान में गाड़े गए मुसलमानों के खून के कारण वहाँ की माटी इतनी लाल है।

मटखान पहुँचने के बाद पहला काम होता था, सबसे बढ़िया माटी वाली जगह पर कब्जा करना। बहुत भीड़ होती थी वहाँ। पूरे इलाके के लोग माटी लेने आते थे। बरसात के तुरन्त बाद दीवाली होने के कारण माटी में नमी होती थी, जिसके कारण थोड़ी-सी मिट्टी भी काफी भारी हो जाती थी। बनिहारिन हमें कटोरे में भर कर मिटटी दे देती थी, लेकिन घर पहुँचते-पहुँचते उस कटोरे को आधा हो जाना था, ये उन्हें मालूम होता था। हम रास्ते भर माटी का एक एक ढेला फेंकते जो आते थे। वे माटीवालियाँ हमारे बेतुके सवाल, बदमाशियाँ, नखरे सबकुछ ऐसे झेलती थी, मानो हमारे घर की हों।

अब तो सबकुछ स्वप्न-सा लगता है। माटीवाली अब हाशिये पर आ गईं। मटखान की जमीं पर कंक्रीट और सीमेंट के जंगल स्थापित हो गए। दीयों का स्थान लाइट्स की लड़ियों ने ले लिया। हमने सबकुछ धीरे-धीरे खो दिया है। मिट्टी के दीये, घरौंदे, खिलौने साथ ही अपनी माटी की सौंधी खुशबू भी। सुनो! चलो ना एक बार फिर इस मिट्टी से जुड़ते हैं और जी लेते हैं कुछ पल सुकून के।

©Jaya Dubey

(मझियांव,गढ़वा)
5 Nov 2018, 09:44

घरकुंडा




बचपन की यादें बरबस ही त्योहारों के मौसम में अपनी ओर खींच लेती हैं। कितने सुनहरे थे वो बचपन के दिन। खासकर दीवाली की आहट मिलते ही हम कई तरह की तैयारियों में जुट जाते थे। पटाखे, फूलझड़ी, घिरनी, बम, राॅकेट और बंदूक की कागजी पिटपिट गोली अधिक-से-अधिक खरीदने की योजना। मन में कई ख्वाब तैर जाते थे।

इन्हीं तैयारियों के बीच मैदान से चिकनी मिट्टी लाना और '#घरकुंडा' (भुरकुंडा/ घरौंदा) बनाने का काम भी किया जाता। बाल्टी लेकर चिकनी मिट्टी लेने मैं ही जाया करती थी, फिर उसे फुलाना, सानना और फिर बड़े जतन से 'घरकुंडा' बनाने की तैयारी करना। इस मौसम में सुबह जल्दी ही नींद खुल जाती और फिर हम सारे काम निपटा कर 'घरकुंडा' बनाने में लग जाते।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगी वैसे-वैसे 'घरकुंडे' को लेकर हमारे सपने भी बड़े होने लगे। पहले 'एकतल्ले घरकुंडे' से भी काम चल जाता था, पर थोड़ी उम्र बढ़ने पर #दुतल्ला' बनाने लगे। उसके लिए पलाश की लकड़ी को एक साइज में काटना फिर उसको करीने से लगाने की हम जी-तोड़ कोशिश करते। न खाने की चिंता होती, न आराम करने की फिक्र। दिन कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता था। ताजमहल बनाकर भी उतनी खुशी नहीं मिली होगी, जितनी खुशी हमें हमारे तैयार घरकुंडे को देखकर मिलती थी।

मिट्टी से इसे तैयार कर इसके सूखने का इंतजार होता। फिर हम इस पर पोचारा करने की तैयारी में लग जाते। घर के रंग-रोगन से जो चूना वगैरह बच जाता, उसी का इस्तेमाल हम 'घरकुंडे' की पुताई करने में करते थे। घर के बाहर जब 'झालर लाइट' लगती तो हमारी भी फरमाइश होती अपने 'घरकुंडे' पर #झालर लगवाने की। अगर इस कोशिश में हम सफल हो जाते, तो हमारी खुशी का ठिकाना न होता। मिट्टी सानकर कुम्हार बनने का शौक पूरा होता, तो #पोचारा करते हुए हम किसी मजदूर/रेजा से कम नहीं लगते थे। अगर कोई झालर लगाने को तैयार न होता तो, हमारी #इलेक्ट्रिशियन बन जाने की मंशा भी पूरी हो जाती थी।

इतना सब कुछ करके दीवाली के दिन लाई, खील, बताशे और मिठाई की खरीदारी होती और साथ में मिट्टी के चुक्के भी खरीदे जाते थे और उन्हीं चुक्कों में खील, बताशे और लड्डू भरे जाते और '#गोधन' के दिन प्रसाद के रूप मे ये अपने भाई को दिए जाते। दीए की लड़ियों से सजा हमारा 'घरकुंडा' किसी राजमहल से कम नहीं लगता था। नई नवेली दुल्हन की तरह सजे अपने 'घरकुंडे' को देखकर जो खुशी हमें मिलती थी, वो खुशी अब आलीशान मकान (बंगले) को देखकर भी नहीं मिलती।

©Sharmila Shumee
6 Nov 2018, 09:02

जमदियरी


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बचपन से देखती आ रही हूँ, #दीवाली के एक दिन पहले मेरी आजी सबसे छुपाके एक दीया जलाती थी। दीया भी कैसा? पुराना! जो किसी पूजा-पाठ में जलाया जा चुका हो, घी के बजाय सरसों तेल में डुबोई बाती और दीये का मुख दक्षिण दिशा में हो। सारे सदस्यों के खाना खा लेने के बाद जब सभी लोग सोने की तैयारी करते, तब मेरी आजी घर के मुख्य द्वार के सामने दूर खोरी में दिया जलाती और लौटते वक्त भूल कर भी पीछे मुड़ कर नहीं देखती।

वर्षों बाद इस परंपरा को मेरी माँ, चाची सब वैसे ही निभाते आ रहीं हैं; जैसे मेरी दादी निभाती थी। बड़ी विचित्र पूजा है ये... बचपन में दीवाली के दिन जब गलती से हम बच्चे कोई दीया दक्षिण की तरफ मुँह करके रखते तो बहुत डाँट पड़ती थी। हम में से कितने ही बच्चे दीवाली के कारण दक्षिण दिशा कभी नहीं भूले। थोड़ी बड़ी हुई तो इस विचित्र पूजा के पीछे की कहानी समझ में आई। इसे #जमदियरी निकलना बोलते हैं। यानी #यमराज को प्रसन्न करने के लिए उनके नाम का एक दीया। ऐसी मान्यता है कि इस दिन यमराज के नाम का दीया जलाने से वे खुश हो जाते हैं और अपनी कृपादृष्टि पूरे परिवार पर बनाए रखते हैं। इससे किसी भी सदस्य की अकाल मृत्यु नहीं होती।

मेरी आजी ने हमलोगों को एक कहानी सुनाई थी। राजा #रंथी (रंती) और #जम्हराज (यमराज) की कहानी - "राजा रंथी बहुत बढ़िया राजा रहन ऊ आपन पूरा जिनगी में कौनो पाप के काम नाहीं कइले रहन, लेकिन तबो उनकर #दुहारी पर जम्हराज जी उनका लेवे आ गइलन। ई देख के उनका बहुते अचंभा होईल। ऊ आपन कसूर पूछे लगलन त पता चलल कि एक दिन अनजान से एगो ब्राह्मण उनकर दुहारी से भूखे लवट गइल रहे एहीसे यमराज आ गइलन। राजा रंथी अापन गलती सुधारे ला एक बरस के समय मंगलन अउर उ साल एक साधु बाबा के कहे से दीवाली से एक रोज पहिले रात में दीया बरलन और ब्राह्मण के भोजन करईलन। एह से जम्हराज जी खुश हो गइलन अउर उनकरा छोड़ देलन। बाद में राजा रंथी के स्वर्ग मिलल।"

अब सोचती हूँ मान्यताएँ, परंपराएँ, विज्ञान, पढ़ाई-लिखाई, आधुनिकता सब अपनी जगह लेकिन भारतीय महिलाएँ परिवार की रक्षा के लिए, उनकी समृद्धि और खुशहाली के लिए जो करती हैं, उसका पूरे विश्व में कोई मुकाबला नहीं है। हम सब को अपनी सभ्यता, संस्कृति, पर्व, त्योहार, मान्यताओं और परंपराओं पर गर्व होना चाहिए।

©Jaya Dubey
6 Nov 2018, 22:35

अपन दीवाली





चल गोय चल सब जाईत हथु। कहाँ? अरे!उहे दूधी माटी ला। दूधी माटी!के के जाईत हऊ? अरे! गाँव के सब जाईत हथु। अच्छा! का से जइबे #हिंठ के कि साईकिल से। अरे!बुड़बक हे का साईकिल उँहा तक ना जतऊ, जंगल में जायेला हऊ, हिंठिये के जाए पड़तऊ जल्दी कर न तो सब आगे निकल जईतथू, हमनी पिछुवा जइबे। अब जल्दी से कोड़नी आऊ बोरा लेके आव। हाँ, गोय आवईत हियऊ। अच्छा, ई बताव #दीवाली आ गेलऊ का कि सब दूधी माटी लावे जाईत हथु। हाँ रे! तीने-चार दिन बाकी हऊ दीवाली में, हाँ गोय तबे हमरो माई रोज-रोज सुनावईत हलऊ की झोरे-पोते खातिर पता नई कब दूधी माटी आई हमरा घरे।

हमनी के गाँव के दीवाली के मतलब कुछ अलग ही होवत रहे शहर के चम- चमाईत इलेक्ट्रिक लाईट बत्ती अऊर पटाखा के शोर-शराबा से बिल्कुल अलग बिल्कुल शुद्ध साफ-सफाई और दीया के रोशनी के त्योहार आऊ ओकर तैयारी दशहरा बीते के बाद से शुरू हो जा हलक । गाँव में लगभग सबके घर माटी के होव हलक तो ओकर साफ-सफाई में काफी समय लाग हलक और साथे-साथे धान के कटनी , #दंवनी/दऊरी(दंवाही) और #ओसाई के काम के भीड़ भी रह हलक जेकरा में से समय निकाल के साँझ-सबेरे आऊ रात-बिरात माई चाची, फुआ, दादी लोग घर-अँगना, ढाबा/ओसरा, छत, ओटा सब के #लेवार_लीप के तईयार करतन ओकर बाद बारी अईतक दिवालन के झोराई-पोताई के काम के।

ओकरे खातिर पोताई ला चूना जईसन माटी जंगल में मिलत रहे जेकरा #दूधी_माटी कह हलन ओकरा सब लाव हलन, आज के जईसन पक्का मकान न रहे जेकरा पेंट पोचाड़ा कईल जाव। दीवाली के ठीक एक-दो दिन पहिले तक सब के घर लिपा-पोता के एकदम चमके लागत रहे। धनतेरस के दिन तक हमनी कुम्हार घर जाके माटी के दीया और सरसों या तिल के गोठन दे के सरसों तेल ले आवत रही। दीवाली के एक दिन पहिले आज सब जेकरा छोटका दीवाली बोल हत ऊ दिन दादी पिछला साल के एगो पुरान दिया में तेल भरके सबके सुतला पर घर से दूर जाके ओकरा जला के चुप-चाप वापस मुड़के घर आ जा हलक जेकरा जमदिया/#जमदियरी कह हलन ,दादी बोलतक कि ई जमदिया हन एकरा केहू के न देखे के चाही।

अब अईतक दीवाली .....ई दिन हमनी अपन घर के सब #माल_मवेशी (गाय-बैल) के कोई अहरा या नदी में ले जाके खूब नहउति और घरे लाके ओहनी के सींग में घीव लगा के चमचमा देव हली ओहनी के सींग के। दादी कहतक कि आज एहनिये के पूजा/त्योहार बा लक्ष्मी होखेलन ई सब। ओह समय के परिप्रेक्ष्य में आज सोचिला तो दादी के कहल सहिये लागेला काहेकि ऊ समय पशुधन ही तो बड़ा धन/लक्ष्मी रहे।

अबतक दीवाली के शाम हो गेलक मिट्टी के दीया के धो के ओकरा पूजा खातिर रखे जाये लागल ,जउन पूजा वाला दीया रहे ऊ में घीव भराईल आऊ बाती लागल बाकी में सरसों तेल भरके चौकी पर रखल गेल। अब इन्तजार होवे लागल बेर डूबे के कि जल्दी जल्दी लक्ष्मी पूजा होवे, घर में कूल देवता के पूजा होखो उँहा दीया जले ताकि हमनी मन्दिर, मण्डप में दीया जरावे जाऊँ, ई सब जगह दीया जरे के बाद अपन दीवाली शुरू होइतक घर के हाता/चाहरदीवारी ,#ओटा_पाखा और छप्पर पर लाईन से दीया और मोमबत्ती रखती और ओकर अलावे #खरिहान, गोहाल में भी दीया जलावल जाईत कुछ ही समय मे पूरा गाँव दीया मोमबत्ती के झिलमिल रोशनी से जगमगा जाईत और हमनी ऊ रोशनी के खुशी में डुबकी लगावे लगती साथ ही उहे बीच मे देखइत रहती की केकर घर के दीया जल्दी बुझाईल मतलब समझ जईती कि ऊ गरीब आदमी बा हमनी सब के दीया बुझा जाईत खाली अपन गाँव के गुरूजी लोग के घर के दीया काफी देर तक जलत रहे।

हमनी के दीया दीवाली के बीच में माई, दादी, चाची, फुआ लोग अलग बिजी रह हलन ऊ हलक खाना बनावे के काम काहे कि दीवाली के दिन हमनी के गाँव मे एक विशेष प्रकार के खाना बनेला जेकरा शायद पूरा पलामू में #पीठा(अरवा चावल के पीस के ओकरा #चाँड़ के और उरीद के दाल के सिलवट में पीस के मसाला (अदरक,लहसुन, हींग) मिलाके, चाँड़ल आँटा के खोरुआँ बना के ओहमें पीसल मसाला वाला उरीद डाल भरके भाप में पका वल जाला) कहल जाला बनावे में लागल हलन , ई बड़ा मेहनत वाला भोजन बा दीवाली मे उहे पीठा आऊ घीव और ओल के सब्जी बनेला और बड़ा स्वादिष्ट होला। हमनी पीठा खा के सुतली, पर नींद कहाँ आवत रहे दिमाग में तो दीया बटोरे/जमा करे के बात चलत रहे। अब जल्दी भोरहिं उठ के हमनी दीया चुने मंदिर, मण्डप, खरिहान में भगली काहे कि बिहाने सब लईकन के बीच कम्पटीशन होइतक कि केकरा भीर केतना दीया बा मानो उ अपन रईश होखे के सिम्बल रहे। आऊ उहे भोर में दादी टूटल सूप- बढ़नी लेके हँसुआ से सउँसे घर में पीटते अन्हरिये में निकलतक आऊ ओकरा घर से दूर बाढ़न फेंके वाला जगह पर फेंक अई तक पूछती कि का करईत हे दादी कह तक साल भर ला दुःख-दरीदर भगा दिहलीं।

अबतक सुबह हो जईतक आऊ अब एक स्पेशल इवेन्ट होईत जे हलक #सोहराई गायन आऊ नाच ई उनका द्वारा होव हलक जे हमनी के गाय साल भर जंगल में ले जाके चरावत रहे हमनी के महतो जी, उ ढोल वाला के लेके गाँव में अईतन और घर के छोट छोट बच्चा के गोदी में लेके खूब नाच गा के सोहराई मनईतन , हमनी लईकन के उनकर नाचब गाईब खूब मजा देत रहे, नाच-गा के सब घर से अपन पऊनी लेतन अऊर जउन घर मे गाय गिरउले रहतक उँहा से विशेष पऊनी साड़ी/धोती पक्का ले के जइतन।

एकर बाद दीवाली अब अपन आखरी चरण में बा सब लईकन अपन अपन चुनल दीया के खोरी (गाँव के कच्ची गली) में प्रदर्शनी लगइति अऊर देखल जाईत कि केकरा भीरा सबसे जादा आउ बड़े-बड़े दिया बा, फिर उ दिया में #काँटी से छेद करके सुतरि और सोनाठी से तराजू बनावल जाईत आऊ ऊ तराजू में धूर (धूल) भरके खूब दुकानदार आऊ ग्राहक बनल जाईत, ई तरह से अपन गाँव के दीवाली के समापन हो जा हलक कि अगला साल हम रात के बारहे बजे उठ के ज्यादा से ज्यादा दीया चुनब।

©Rakesh Bharti Goswami

लेखक सेना में सब इंस्पेक्टर के पद पर कार्यरत हैं और फ़िलहाल जम्मू कश्मीर में तैनात हैं। एक फ़ौजी की ओर से #ठेठ_पलामू के माध्यम से सभी पलामू वासियों को दिवाली की हार्दिक बधाई।
7 Nov 2018, 15:22

सोहराई_और_बीरकुंवर_बाबा







हमारा देश कृषि पर निर्भर है और उसकी असली पहचान उसकी ग्रामीण संस्कृति है।कृषि संस्कृति में पशुधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पशुधन में सबसे महत्वपूर्ण है - #गाय।जो हमारी ग्रामीण संस्कृति की महत्वपूर्ण अंग है।पलामू के ग्रामीण समाज में उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने हेतु एक महत्वपूर्ण लोकपर्व मनाया जाता है।जिसे हम #सोहराई के नाम से जानते हैं।यह पारंपरिक लोक त्योहार है।जिसे हम सब दीपावली के दूसरे दिन मनाते हैं।

हमारे गाँव #सिंगरा में #धनतेरस के दिन से लोग अपनी-अपनी गाय और बैल के सिंग पर घी लगाते हैं। गाँव के
लगभग सभी लोग अपनी गाय को माँ लक्ष्मी का ही रुप मानते हैं।इसीलिए उन्हें नहलाते-धुलाते हैं और उनके सिर पर तिलक लगा कर उनकी पूजा करते हैं।सोहराई के दिन गाय का दूध भी नहीं निकाला जाता है। इस अवसर पर कहीं-कहीं कुछ गाँव में तीन दिनों का मेला भी लगता है।जहाँ जानवरों की खरीदी-बिक्री के साथ मेला भी लगता है।जिसे डाढ़ मेला कहते हैं।

सोहराई के दिन गाँव के सभी लोग #बीरकुंवर_बाबा की प्रतीकात्मक प्रतिमा पर एकत्रित होते हैं।यहाँ पर पूजा का काम #यादव जाति (जिन्हें अहीर कहा जाता है) के द्वारा किया जाता है। इस पूजा कार्य में गाँव के सभी लोग अपने घर से सात दुधौरा, कच्चा दूध, सिंदूर,अक्षत एवं अन्य पूजा सामग्री लेकर आते हैं।साथ ही साथ एक #मिट्टी_का_घोड़ा भी.........। वैसे यह अपनी सामर्थ्य क्षमता के ऊपर आधारित रहती है क्योंकि गाँव के जो लोग आर्थिक रुप से उतने मजबूत नहीं होते हैं वे बीरकुंवर बाबा के लिए प्रसाद के रुप में गुड़,चावल और बताशा आदि भी चढ़ाते हैं।

पूजा के दौरान #अहीर जाति के लोगों के द्वारा बीरकुंवर बाबा की प्रतिमा को #कच्चे दूध से नहलाया जाता है। फिर बकरा और सुअर को वहाँ पर उपस्थित गौ माता के पास आशीर्वाद लेने के लिए बार-बार भेजते हैं। उस समय गांव के हरिजन जाति के लोग मगन होकर ढ़ोल बजाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु अहीर जाति के लोगों के द्वारा नृत्य भी किया जाता है जिसे क्षेत्रीय भाषा में #डाढ़ खेलना भी कहा जाता है।

पूजा के अंतिम चरण में बीरकुंवर बाबा की प्रतिमा के समक्ष #बकरे की बलि चढ़ायी जाती है और उसके रक्त से बाबा का तिलक भी किया जाता है।कभी कभी पूजा करने वाले पुजारी उस रक्तरुपी प्रसाद का सेवन भी करते हैं। झारखण्ड के अधिकांश हिस्सों और विशेषकर पलामू जिले के अधिकांश गाँव में सोहराई पर्व को आस्थापूर्वक मनाया जाता है।

आप सभी को कृषि संस्कृति पर आधारित सोहराई पर्व की ढ़ेर सारी बधाई।

©Sunita Shukla
8 Nov 2018, 13:37

दलिद्दर





ईसर पिसर दलिद्दर खेदो,
अहिरा घर खीर पुड़ी,
वहई तू जो।।

हो सकता है कि करोड़ों कंठ से निकलने वाले इस गीत को आपने भी सुना होगा। जी,हाँ।यह दलिद्दर खेदने की लोकपरंपरा पर गाया जाने वाला गीत है।दलिद्दर खेदने से आशय है कि घर की निर्धनता को दूर करने का आह्वान...। सदियों से जिस परंपरा का निर्वहन हमारे समाज में किया जा रहा है।आप और हम सभी के घर की आजी और माई इस परंपरा का निर्वाह करती आ रही हैं।

गोधन कुटने के पहले उसी दिन भोर में हम सभी के घर में दलिद्दर खेदने ठक ठक की आवाज सुनाई पड़ती है।घर की सबसे वरिष्ठ महिला और उनकी सहयोगी के द्वारा एक पुराने सूप को #हंसुआ से ठोका जाता है और इस गीत का उच्चारण किया जाता है।इस दौरान सहयोगी महिला हाथ में दिया जलाकर पीछे रहती हैं।वे दोनों पूरे घर में घुमती हैं।संभव है कि इसके पीछे यह भावना हो कि घर के कोने कोने में घुमकर दलिद्दर को खोजा जाता है और फिर उसे खदेड़ने का काम शुरु होता है।

#दलिद्दर को घर से बाहर खदेड़ने के बाद उस पुराने सूप को घर से बाहर फेक दिया जाता हैं फिर हाथ पैर धोकर हंसुआ को घर में ले आते हैं।उसके बाद उस हँसिया को धोकर दिए की लौ से उस पर काजल बनाया जाता है।उस काजल को सबसे पहले दलिद्दर खेदने वाली महिलाएं लगाती है फिर उस काजल को घर के बाकी सदस्यों को लगाया जाता है।ताकि किसी को बुरी नजर नहीं लगे।

गाँव में ऐसी भी मान्यता है कि उस फेके हुए सूप को जलाकर तापने से #सफेद_दाग(चर्म रोग)दूर होता है।इसलिए सफेद दाग से पीड़ित व्यक्ति उस दिन भोर में उस ठक ठक की आवाज का इंतज़ार करते हैं कि उन्हें वह इस्तेमाल की हुयी पुरानी सूप मिले जिसे जलाकर तापने से शायद उन्हे उनके चर्म रोग से हमेशा के लिए छूटकारा मिल सके।

यह सब सुनी हुयी स्मृतियों पर आधारित जानकारी है।आप भी अपने घर के वरिष्ठ महिलाओं से इस परंपरा से जुड़ी हुयी जानकारी को पूछें और हम सभी को भी बताएँ जिससे हम अपनी लोकसंस्कृति और लोकपरंपराओं से वाकिफ हो सकें।

©Ajay Shukla


9 Nov 2018, 09:18

गोधन कुटाई/ भैयादूज





छोटहन से जउन परब हमरा सबसे निमन लागत हलक उ #गोधने बा। ई ला नई कि उ रोज हमर माई पूड़ी अऊ आलू के रसगर #तरकारी बनाव हलक, बल्कि इ ला कि उ दिन भिनसारे-भिनसारे दउरी लेके गाय के गोबर बटोरे, रेड़ी के पतई खोजे, हम निकल जाइत हली। ओकर बाद हमनी के असली मज़ा त सब रेंगन के साथे #रंगईनि के कांट खोजे में आव हलक।

रंगईनी के कांट के चक्कर में केतना #लट_लटिया हमर पैंट में चिपक जा हलक। सब के सब रेंगन दुसर के घरे से जादे आपन घर के बहिन - माई ला रंगईनी के कांट लान हली हम। बाद में हमनी के गोस्सो बड़ हलक, जब हमर माई बगलहारीन लोगन के हमर गाढ़ मेहनत कमाई दे देव हलक।

उ दिन जेकर घर में लकड़ी के बढ़िया #मूसर होइतक ओकर घर के बहरी गोधन कूटाए के तय्यारी होव हलक। माई-बहिन लोग बड़ा मन से गोबर से चरखाना बना के ओकरे भीतर जम्ह-जम्हिन, सांप, बीछ, कोठी, फूल, अउर न जाने का का बनावत हलन।

फिर सब बहिन, माई, ओला-टोला एक्के जगह जमा होके गोधन कुट हलन। तो बड़ी मन कर हलक कि का चलत बा तनि देखे-सुने मिल जईतक। लेकिन काहे ला अइसन हो परतक...? लईकन के नो एंट्री रहे ओन्ने। तबो हमन छुप के सुनती त सुनाई पड़तक कि " फलनवा भईया खेती करावे जात रहन। गोह काट देलत। मर गईलन। सिरा गईलन।जौरा भौरा के लादी गुदी ले के ऊपर.....।"

ओकर तनी देर बाद सभे कोई मिल के मूसल से गोधन कुटतन अऊर उ समय जो गीत गईतन।हमनी के बड़ा बढ़िया लगतक।आजो उ गीत के कुछ लाईन हमरा याद बा -
"चलले कवन भईया चकरिया
कवन बहिनी दिहली अशीष
हाथ गुलेल मुख पान
त जिय भईया लाख बरिस
भईया के हो बड़ी राज
त बहिनी लियावन चली।"

गोधन कुटाये घरी सबसे ज्यादे इंतज़ार रहतक गीत में आपन नाम गवाए के कि कब हमर नाम आइतक। आऊ जइसहीं अपन नाम सुनती लगतक अब तो #अजर_अमर हो गेली आउ गलती से कहीं अपन से पहीले छोट भाई के नाम लिया जईतक तो एकदम अंदर से अकबकी कि अब का होइ, फिर जब नाम लेतन तबे जान में जान आइतक।
जम भईया के घोड़वा रने- बने दौड़ल जाये ...
कांटे -कुसे अझुरायल ...
बन फल तोड़ी -तोड़ी खाये ...
#फलनवा भईया के घोड़वा ...
घर मुंहे दौड़ल जाये ..
पाने -फूले अझुरायल ...
नारियल फौरी -फौरी खाय.

आउ ओकरो से माजा जब पापा ईसब के नाम के बारी आइतक अब माई के साथे-साथे छोट चाची सब के भी नाम न लेवे ला रह हलक काहे कि भसुर के नाम ना न लेवल जला। गलती से कोई ले लेतक तो अंदर से घोर अपराध वाला मुँह बना देतन। आउ तुरन्त कौनो अपन ममेर फुफेर भाई के नाम लेके कह तन कि " अरे का होलई उहाँ वाली फुआ के बेटो के तो इहे नाम बा। "
जौरा कुटी ला भउरा....
कुटी ला जम के र रात ...
कुटी ला जम भईया के मुदई ..
छव महिना दिन रात ..
कुटी ला #चिलना भईया के मुदई छव महिना दिन रात ....

इ सब के बीच हमनियो बड़ी बदमाशी कर हली, दिवलिया वाला बचल पटखवा बीच-बीच में #भूडूम_भड़ाम
करत रह हली।

बाद में जब बहिन प्यार से बइठा के, चना, गुड़ आऊ चिनियाहा बर्फी खिया के रुइया के बनल अंगूठी पहनावा हलक ता आँख भर जा हलक कि "केतना हम एकरा दिन भर दौड़ावत रह ही, लेकिन आज हमरा खातिर ई आपन जिभिया में केतना कांटा घोंप लेलक।"

ओकरा बाद हमनी सब मिल के घर में बनल #दलपुड़ी अउर गुड़ के रसियाव खईती। वोइसे सच कहूँ त हमरा राखी परब से ज्यादा देशी, #पवितर अउर आपन भावना वाला गोधने परब लागला। आजो जहांँ भी हमर बहिन रह ला, हमरा ला जरूर गोधन कुट ला। हम त इहे कहब कि गोधन के दिन ओकर सराप, जीभ में रंगईनी कांट घोपे के बाद ओकरे अशीष के फल बा कि आज कुशल-मंगल से ही। आज त हम आपन बहिन के इहे संदेश देब कि "धीरे से कांटा #घोंपिहे बहिन, खाली ठेकैहे जीभिया पे।"

©Anand Keshaw
9 Nov 2018, 12:00

छठ महापर्व ( नहाय खाय)



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#छठ लोकपर्व को अब पर्व नहीं महापर्व की उपमा दी गयी है। हमारी भाषा में इसे #महापरब बोलते हैं।

इस आस्था के महापर्व की लोकप्रियता को इसी तरह से समझ सकते हैं कि छठ के समय चाहे दिल्ली हो या कलकत्ता...या भारत देश का कोई भी शहर...बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश जाने वाली सभी बस और ट्रेन में पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती। ट्रेन या बस में टिकट लेने के लिए लोग महीनों पहले बुकिंग करा लेते हैं, लेकिन जिन्हें टिकट नहीं मिल पाती वो आस्थावान लोग भी तमाम कठिनाइयों के बाद भी अपने-अपने घर पहुँच ही जाते हैं।

काम-धंधे की तलाश में विस्थापित हुए लोग चाहे जिस शहर में भी रहते हों। वह अपने गाँव या शहर नहीं जा पाते हैं तो अपने गाँव या शहर में ही छठ की तैयारियों में जुट जाते हैं। इसीलिए छठ के समय भारत के लगभग सभी शहर छठमय हो जाते हैं। प्रत्येक गाँव और शहर के नदी तालाब में श्रद्धालु छठपर्व के शानदार आयोजन के लिए व्यवस्था में जुट जाते हैं।

छठ पर्व की तैयारी #नहाय_खाय से पहले ही शुरु हो जाती है। भारत के लगभग लगभग सभी शहरों में मगही, भोजपुरी, मैथिली, अवधी संस्कृति के लोगों की अच्छी-खासी पहुँच है। आज वह जहाँ भी निवासरत हैं अपनी संस्कृति को गौरवान्वित किए हुए हैं। आज उसी का परिणाम है कि संपूर्ण भारतवासी अब छठ के महत्व को समझने भी लगे हैं। बड़े-बड़े राजनेता भी अपना जनाधार बढ़ाने के लिए इस पर्व की तैयारी की व्यवस्थाओं और शुभकामनाएँ देने में जुट जाते हैं।

अमीर-गरीब सब अपने सामर्थ्य के मुताबिक #परबइतिन (व्रत करने वाली महिलाओं) की मदद के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते हैं। कोई अपने घर में वर्षों से उपेक्षित पड़े हुए जाता को धोकर तैयार रखता है कि परबइतिन अनाज को पीस सकें। जहाँ जाता उपलब्ध नहीं हो पाता, तो वहाँ आटा चक्की वाले निःशुल्क अनाज पीसते हैं। छठ घाट तक जाने वाली सड़क में झाड़ू से धूल कंकड़ साफ किया जाता है और पानी छिड़ककर साफ किया जाता है।

पूरा बाजार गन्ने, मिट्टी के बड़े दीए, मौसमी फल और पूजा सामग्री से भर जाता है। हर गली, हर चौराहे पर आपको छठ के पारंपरिक गीत गूँज सुनाई पड़ेगी। छठ गीतों की लोकप्रियता को भुनाने के लिए कल्लु, खेसारी, छैला, पवन आदि जैसे बेहुदे और अश्लील गायक भी आस्थावान होकर पारंपरिक गीत गाने लगते हैं ।

वैसे छठगीतों के लिए हम सभी की पहली पसंद #शारदा_सिन्हा, #मालिनी_अवस्थी, #भरत_शर्मा'व्यास', आदि ही होते हैं, तो नए लोकप्रिय गायकों में चंदन तिवारी, शैलेन्द्र मिश्र, संजोली पाण्डेय, अंकिता पण्डित आदि का भी कोई जोड़ नहीं है जबकि आजकल सोशल मीडिया में तेजी से लोकप्रिय हो रहे मैथिली ठाकुर, श्रद्धा सिसोदिया आदि बच्चों की शानदार आवाज में छठ गीतों को सुनना भी.. एक गजब के पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण से रुबरू होना होता है।

आज शाम तक सभी घरों में परिवार और रिश्तेदार पहुँच जाते हैं, क्योंकि आज नहाय-खाय से छठ महापर्व शुरु होने वाला है। सभी कोई आज से पूजा सामग्री को एकत्रित करने में लग गए हैं, क्योंकि वह छठ पर्व की महत्ता से परिचित हैं। वह पूरी आस्था के साथ इस महापर्व को मनाकर अपनी गौरवशाली संस्कृति को नयी गति देनें में लगे हुए हैं।

उम्मीद है ठेठ पलामू के पाठक भी छठ महापर्व को मनाने की तैयारी और फिर घाट पर जाकर मनमोहक और पवित्र वातावरण की कल्पना में खोए होंगे। कल से ठेठ पलामू भी आपको छठ पर्व की मौलिक जानकारी देने के लिए प्रयासरत रहेगी। अगर छठ महापर्व पर आप अपने घर के अनुभव भेजेंगे तो हम सभी को बहुत खुशी होगी।

©Sunny Shukla
11 Nov 2018, 16:56

खरना





"ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए
मारबो रे सुगवा धनुख से सुगा गिरे मुरझाए.."

ऐसे गीत कानों में पड़ते ही छठ की याद बरबस ही हमें अपनी ओर खींच लेती है। समय के साथ सबकुछ बदलता है, हमारे तौर-तरीके ही नहीं त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें जितना विस्तार दिया, भीतर से हम उतना ही सिमटते गए और इस 'संकुचन' को बड़ी बेशर्मी से '#आधुनिकता' का नाम दे दिया। पर 'आधुनिकता' के इस दौर में भी अगर कुछ नहीं बदला, तो वह है #छठ_पर्व की परंपरा। गीतों में बदलाव आया, नए जमाने के गायक/गायिकाओं ने नए अंदाज में पारंपरिक गीतों को परोसा पर न ही भाव बदला और न ही जज्बा।

गंगा माई के ऊंची रे अररिया, तिवईया एक बिनवेली हो
हे गंगा मईया अपनी लहर मोहे दिहतू, लहरे मर जईतीं हो
हे गंगा मईया
चुप होख चुह होख तिवई, लोर पोंछ
किअ रे नइहर दुख, किअ रे ससूरा दुख, कवन दुखे रोवेलू हो
नाही मोरा नइहर दुख, ना ही रे ससूरा दुख
पूत दुख रोवली हो
गंगा माई आपन पुत तुहू मरतू हमरो जीवतू हो....

'#गोधन' कुटाते ही छठ होने का ऐलान हो जाया करता था और इस महापर्व की तैयारियाँ शुरू हो जाती। लाल गेहूँ , देशी गुड़, शुद्ध गाय का घी, आम की लकड़ी, नया अरवा चावल, सूती साड़ी, #सूप, #दउरा, #ढकनी, #बेना, #बढ़नी आदि की खरीदारी और अगल-बगल से जुटाने की कवायद। फिर तो रात-दिन बस एक ही चर्चा सिर्फ छठ की। परिवार का हर सदस्य अपनी काबिलियत के हिसाब से इसकी तैयारी में जुट जाता। गोधन से ही गोबर से #दुहारी लिपने की शुरुआत होती चिकनी मिट्टी लाकर चूल्हे बनाए जाते (ये अलग बात है कि अब लोहे के रेडिमेड चूल्हे का प्रयोग होने लगा है।)

आधुनिकता के इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चौंधियाँ नहीं गई हैं, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ पूजा को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमां में उड़ना सीख गए बच्चे होली, दीवाली चाहे जहांँ मना लें, पर छठ के लिए अपने 'घोंसलों' को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे भी ये जान पाते हैं कि 'टू बेडरूम फ्लैट' के बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और संयुक्त परिवार की क्या खूबियांँ होती हैं, क्योंकि छठ में जितने ही काम करने वाले हाथ उतनी ही आसानी। नई पीढ़ी के बच्चे समझ पाते हैं कि डिस्कवरी पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूस करने का आनंद कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप? कैसा होता है दउरा? कौन बनाते है इन्हें और ये समाज के कितने अभिन्न अंग हैं? ये छठ ही इन्हें बताता है डाभ, पानी सिंघाड़ा, #सूथनी, शक्करकंद, शरीफा जैसे फलों का अस्तित्व।

#नहाय_खाय' के दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी को व्रती दिनभर उपवास करके शाम को नदी, तालाब या कुँए पर जाती हैं और स्नान करके वहांँ अपने घाट की पूजा करती हैं, जिसे 'घाट जगाना' कहते हैं। घाट से आकर व्रती खुद आम की लकड़ी से चूल्हे पर गाय के दूध और अरवा चावल और गुड़ से खीर बनाती हैं। जिसे 'खरना' कहा जाता है। व्रती सबसे पहले '#खरना' करती हैं।

मुझे आज भी बचपन का वो दिन याद है जब मांँ 'खरना' करती थीं, तो हम बच्चों को कहीं दूर भेज दिया जाता था। ऐसी मान्यता है कि उस समय अगर किसी ने बोल दिया तो व्रती खरना करना छोड़कर उठ जाती हैं या फिर खाते समय कंकड़ का एक टुकड़ा भी पड़ गया तो वह नहीं खातीं। व्रती के बाद ये खीर सभी को प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। खीर को सबसे पहले छठी मईया के नाम से ढकनी में निकालकर जमीन में सिंदूर टीककर और दीया जलाकर रखा जाता है। प्रसाद का खीर लोग माँग-माँगकर खाते हैं। हमारी चाची कहती हैं- "छठ के परसादी में कोई जात-पात और दुश्मनी ना देखल जाला, कोई ना देवे तो मांग के खाइल जायेला।" और ऐसा होता भी है लोग वर्षों की दुश्मनी भुला कर भी छठ का प्रसाद खाने जरूर जाते हैं। कहीं-कहीं 'खरना' के दिन खीर के साथ रोटी या पूड़ी खाने की भी परंपरा है। चाँद रहने तक व्रती पानी पी सकती हैं।
क्रमशः....
©Sharmila Shumee
12 Nov 2018, 09:06

छठ पूजा





'#खरना' के दूसरे दिन यानी षष्ठी को व्रती छठ का निर्जला व्रत रखती हैं। सुबह नहा-धोकर आम की लकड़ी पर लाल गेहूँ, शुद्ध घी और गुड़ से '#ठेकुआ' प्रसाद बनता है। जिसमें परिवार के सभी लोग मदद करते हैं, पर सूप का प्रसाद व्रती खुद बनाती हैं। इसका आटा 'जांते' में पीसा जाता है। पर आधुनिकता के इस दौर में अब यह संभव नही हो पा रहा। इसलिए लोग आटा चक्की को धुलवाकर वहीं गेहूँ पीसवाते हैं। कई आटा चक्की वाले तो पैसा भी नहीं लेते कि इसी बहाने वो भी तो पूजा में सहयोग कर सके। शुद्धता और साफ-सफाई का इस पर्व में काफी महत्व है। कहा जाता है कि "छठ में धोवलो के धोवेला आऊर पोछलो के पोछेला पड़ हइ।"

प्रकृति से जुड़ी चीजों और शुद्धता का इस पर्व में बड़ा ही खास महत्व है। प्रसाद बनाते समय सूप, दउरा सजाते न जाने कब घाट जाने का समय हो जाता है, पता ही नहीं चलता। लाल-पीली चुनरी और पीली धोती पहन व्रती अपने करीबी लोगों के साथ घाट की ओर गीत गाते चल पड़ते हैं-

"आठ हीं काठ के कोठरिया ऐ हो दीनानाथ,
रूपे सोने लागल #केवाड़
ताही ऊपर चढ़ी सुतले ऐ हो दीनानाथ,
#बांझीन केवड़वा धईले ठाड़
चादर उघारि जब देखले ऐ हो दीनानाथ,
कवने संकट पड़ल तोहार
पुत संकट पड़ले मोरा ऐ हो दीनानाथ,
ऐहीला केवड़वा धईले ठाड़
चदर उघारि जब देखल ऐ हो दीनानाथ,
अंधरा केवड़िया धईले ठाड़
अंधरा के आँख दीहले, कोढिया के कयवा
बांझिन के पुत दीहले ऐ हो दीनानाथ,
हंसत खेलत घर जाए.."

कई व्रतियों के आगे उनके पुत्र या अन्य परिजन #गमछा हिलाते हैं और व्रती 'दंडवत' करती जाती हैं। कुछ व्रती बिना '#दंडवत' के भी घाट जाती हैं। घर के पुरुष सिर पर #दउरा लिए आगे-आगे चलते हैं। एक घर में छठ हो तो पास-पड़ोस के सभी घरों में रौनक हो जाती है। जौ छींटते व्रती नदी में प्रवेश करती हैं। दतवन और स्नान कर जल में खड़ी रहती हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। सूप फलों, नारियल और ठेकुएँ से भरे होते हैं और सामने दीप झिलमिलाते रहते हैं।

छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर ही देखने मिलेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दउरा ढोते मिलेंगे। सबके सूप का मोल महत्व एक समान। कोई आडंबर नहीं, किसी पंडित, पुरोहित की जरूरत नहीं, बस आस्था होनी चाहिए। आपकी प्रार्थना सीधे छठी मईया और सूर्य भगवान तक पहुँच जाती है।

साक्षात भगवान हैं सूर्य, जिन्हें हम अपनी आँखों से देख पाते हैं और जिनके बिना जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकते। सभी धर्मों के बीच खड़ी दीवार भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाजार नहीं, जिसमें छठ पूजन की सामग्री बेचने वालों में सभी समाज के लोग न हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रती भर भी कमी नहीं होती और तो और शिद्दत से ढूंढने पर कुछ घाट भी ऐसे मिलेंगे जहाँ अर्घ्य देती अलग-अलग धर्म की महिलाएँ भी दिख जाएँगी, तभी तो इसे कहते हैं 'लोक आस्था का महापर्व।'

©Sharmila Shumee
13 Nov 2018, 09:15