Sunday, February 21, 2021

हमर डकडर चाचा



"ऐ राजकुमार! देख न आज सुरुज भगवान बड़ी बड़का दखाइत हथु, इ जड़वा में साँझ के साँझ बड़ी बढ़िया लोक हउ एकदम अइसन की जइसे भगवान जी तिरंगा झंडा फहरावइत हथुन।" राजकुमार मेरी तरफ देख के मुस्कुराया आउ फिर खेल का मज़ा लेने लगा। दरअसल, दुरा के ओटा पर बइठ के हमनी दुनोगोड़ा कित-कितवा खेलइत लईकी लोग के खेल के मज़ा उठा रहे थे आउ फ़ोकट में अम्पायरिंगो कर रहे थे। "अच्छा ले भाई! आझु दादी हमरा ला देहात से नया गुड़ के रावा लनले हलक ले तुहु नेवान कर।" मैंने अपने दोस्त की तरफ पोटली बढ़ा दी।

कचिया सड़क से मवेशी के आवे के आवाज़ आउ बदमाश बैलन के गला में बांधल घंटी के आवाज़ हमनी के इशारा करे लगा था कि अब खेल इहइ रोकवा देना है। इतने में बाबा माल-जाल (मवेशी) के बांध के आये थे और बोलीये दिए- "हाँथ-गोड़ धो धा के गाँती बन्हबा न रे! अब का रात ला तोहनी खेलते रहबा।"

दरअसल जाड़े के दिनों में ठण्ड से बचने के लिए चराई गाँव के बड़े बुजुर्ग़ शाल/ चादर या गड़ेरिया वाला कम्बल ओढ़ा करते थे और लइकन सब के शाल या गमछी के दू छोर को कंधों के पीछे क्रॉस कर के बांध दिया जाता था, इसे ही हमलोग गाँती कहते थे, ताकि बच्चे अगर दौड़ते कूदते भी रहे तो खुले नहीं। स्वेटर, कोट और जैकेट के बदले साल चादर और गाँती का इस्तेमाल गरीबी में खोजा गया एक बहुमुखी विकल्प था।

और फिर क्या।जाड़ा के साँझ तो सुरु होवे के पहिलही ख़तम हो जाता है। घरे सबके खाना परोसल जाता है सहिये साँझे ताकि इंजोरिया रहते सब खा लें। अरे ना भाई! बिजली इ गाँव में अभी कहाँ? अभी दिल्ली दूर है बहुत। गरम-गरम बनल नैका चाउर के भात कुर्थी के दाल आउ बूट के साग खा के तो हमनी के मन हरिअर हो जाता था। बाकि दादी अभियो चाचा के आवे के आस देखइत रहती आउ चुल्हनियाँ (रसोई) भीरा बइठ के बड़बड़ाइत रहती कि -"नन्हका अभी ला न अलइ, दुपहरिये में बिन खएले निकलल हलइ?"

'हमिन के चाचा इ गाँव में एकलौता डकडर (डॉक्टर) हैं'-इतने सुन के करेजा जुड़ा जा जाता था। अरे MBBS नहीं जी.. उ लोग इ गांव में कहाँ? ANM आउ आशा दीदी तो ढिबरी बार के खोजे से मिलबे ना करेंगे। आजकल सभ्य समाज में एकनि के 'झोलाछाप डॉक्टर' कहल जाता है। ख़ैर एकर विवादास्पतता के बख़ान नहीं करना चाहते हैं हम, उ तो आपलोग को अख़बार और टीवी में ढेरे मिल जाएगा। चाचा उस दिन इलाज के सिलसिले में दू कोस दूर बभंडी गेल थे।

चाचा के एगो चीज़ अभियो बड़ी इयाद आता है, जब उ सबेरे-सबेरे रेडियो ले के रामचरितमानस आउ बीबीसी लन्दन सुनइत सुनइत घोरानी से तरकारी तोड़त रहते थे। ताजुब तो तब होता था जब उ लोटा आउ रेडियो साथे ले जाते थे।

खा पी के सब बेकत आपन आपन खटियाँ में गुड़मुड़ा गए। हम तो बाबा के साथे दुरा पर वाला दालान में चौकी में सोते थे, बाकि चाची आऊ दादी अभियो चुल्हनियाँ में हाँथ सेकइत आउ चाचा के आवे के आस देखइत थे। हमरा तो बाबा के राम-राम सुनइत कखनी नींद लगा पते ना चला।

अचनाक नींद खुली तो कोई केवाड़ी जोर जोर से पिटइत था अउ 'डकडर साहेब-डकडर साहेब' के आवाज़ लगावइत था। बाबा केवाड़ी खोललथीं, सामने एगो मेहरारू खड़ा हलवा।
बाबा- 'के हाँ माइयाँ ?'
मेहरारू- 'हम रमेशवा के माई रानी-पहरि से; चाचा देखा न रमेशवा के बाबूजी के बैला मार देले हइ तो बड़ी खून बहइत हइ।'

आवाज़ से घर के करीब सबे बेकत उठ गेल थे। हम तो इहे सोचइत थे कि - 'चाचा कखनि अलथी आउ अब फिर जइतो हथीन।' बड़ी चुकु-चुकु अन्हरिया रात थी, दादी तो अगना में निकल के तरेगण देख के रात के केतना पहर गेल हइ इ पता करे लगी थी। चाचा आपन बैग में जरुरी दवाई सरिआवे लगे फिर लुंगिये में पैदल निकल गए। काहे कि कियारीये-कियारी रानी-पहरि जाए पड़ता था। चाचा के निकला के बाद केवाड़ी बंद कर देवल गया। सब बेकत मटिया के सुते के प्रयास करे लगलथुन। जइसे-तइसे रात बीती।

भिनसरे उठिली तो चाचा अउ बाबा के बतियाइत सुनइत थे, बुझाइत था कि चाचा अभी अभी आए थे। चाचा कह रहे थे कि - "रामजतन (रमेश के बाबूजी) के बैल के सींघ दुनू टाँग के बीच में घुस गेल हलवा.. खून तो रुकते ना हलइ, घाव के साफ़-सफाई, खून बंद करे के जरुरी बैंडेज पट्टी कर के उंनकारा रातो-रात दिनेशवा के फटफटीआ से ललटेनगंज सदर अस्पताल में पंहुचा के आवत हिवा। डॉक्टर साहेब बोलइत हलथिन कि ऑपेरशन करना होगा! आपलोग अच्छा किये कि प्राइमरी उपचार करा लिए थे, वरना खून ज़्यादा निकल जाने के कारण जान भी जा सकती थी। अब रमेशवा के माई पईसा के इंतज़ाम में जुटल होतवा।"

फिर चाचा हमरा आवाज़ दिए-" मुनवा-मुनवा! रेडोइया लान न! चल घोरानी से सिम तोड़ल जाओ.. "

और फिर का.......

©अवनीश प्रकाश
15 Jan 2021, 08:44

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