Sunday, February 21, 2021

चूल्हा चउका





पंचवा क्लास में जइते हमार माई खेल के अलावे चूल्हा-चउका करे पर ध्यान देवे के हिदायत देवे लगली। अइसन भी ना रहे कि हमनी के बेटा से कम भैलू रहे, पर बात-बात में हिदायत मिलत रहत रहे कि "कलक्टरो बन जइबू, तबो चूल्हा चउका त करही के पड़ी!” सचे में औरत जन्म लेला पर इ चूल्हा चउका से छूटकारा मरला के बादे मिल हई। आऊ इ बात हमहूं बचपने में स्वीकार कर लेले हली, आऊ माई के साथ अकसरहें बइठ जा हली खाना बनावत देखे। जाड़ा में चूल्हा के पास बइठला के ढेरे फयदो रहे। भूंजल आलू, मकई, गरम-गरम हलुआ ई सब खाए के मिलत रहे आऊ ठंडा में देहों सेंकात रहे! सबसे भारी काम लागत रहे ठीक से आंच लगावे, सच कहल जाव तो इ त अभीओ तक ना आवे हमरा! छठ के खरना के खीर बनावे में नौ-नतीजा हो जा हई, काहे कि ठीक से आंचे न लगावे आव हई।

एगो लकड़ी पर तीनों तरफ से लकड़ी चढ़ा के आंच लगावे बहुते बार सीखावल गइल रहे पर करे समय सब गुड़ माटी! आस्ते-आस्ते आंच के थोड़ा बहुत समझ आ गईल आउ हमहूं कुछो-कुछो कांच-पाकल बनावे लगली। हालाँकि खराबो बनवला पर वाहवाही मिलत रहे ताकि बनवते रहूं हमेशा। आऊ इहे कारण रहे कि खाना बनावे में हम आपन जेनेरेसन में सबसे बेसी आऊ सबसे जल्दी निपुण हो गइली।

एकछिया चूल्हा तक त ठीके रहे कइसहूं आंच संभाल लेवत हली। चैलेंज त तब लागत रहे जब दुअछिआ चूल्हा पर दाल भात एके खवां चढ़ा के माई जिमेवारी दे देवत रही संभाले के। काहे कि एगो आंच स़भरले ना संभरत रहे त दू-दूगो आंच का संभरित। लेकिन बिना कूकर के जुग में एके साथ दूगो आइटम बन जात रहे दुकछिआ चूल्हा पर। कबो-कबो त भात आउ तरकारी ऊपरे आऊ नीचे तनी कून आगी निकाल के ओकरे पर आस्ते-आस्ते दाल सिंझावल जात रहे। ठंडवा में त ओसहीं कुरथी के दाल बघारल खाए के मिलत रहे ओकर स्वाद भूलइले ना भूलाए। बचपने में सुनले रही कि कुरथी के दाल खाए से कइसनो पथरी गल जा हई, जानीओ के अब ना बनावे पारही काहे कि आजकल के लइकन ' दाल फ्राई ' खाए वाला हथी, कुरथी तनको न सोहतइ एहनी के!

स्कूल के पढ़ाई खतम होइला पर जब कॉलेज में रांची पढ़े गइली त इ माटी के चूल्हा से पाला छूटल आऊ पीतल के टंकी वाला चमचमात स्टोव मिलल, पाक कला में महारथ हासिल करे खातिर! शुरू में कुछ महीना मेस के खाना मिलल लेकिन माई के हाथ के खाइल मुंह मेस के खाना कइसे खाए, तब पीतलवा वाला स्टोव निकलल आउ रोज नया-नया आइटम बने लागल! ओह समय ना तो यू टयूब रहे और न ही फोन कि केकरो से देख- पूछ के खाना बनावल जाए। नतीजा इ होखल कि पेपर कटिंग के ढ़ेर तइयार कर लेहली आ ओकरे से देख, पढ़ के हाथ साफ करे लगली। क्लास जाए के हड़बड़ी में केतना बार हांथ जलल, केतना बार अधपकले खा के गेली, आऊ अइसन में माई के बहुते इयाद आइल।

कुछ महीना बाद घर अइली त देखली कि घरे गैस चूल्हा आ गइल बा आऊ झटपट ओकरे पर खाना बनत बा, तो जादू मंतर लेखे लागे लागल। गैस पर खाना बनावल, न हांथ मइल, न गोड़! ना त पाहिले जब भी माई हमरे 'लेवकन' लगावे ला कहत रहे तसला, कड़ाही, बटलोही में, मटिया के चूल्हवा पर चढ़ावे से पाहिले तो सच में बड़ा अनस लागत रहे से खवां। माटी से हाथ रूखर हो जात रहे आऊ राख से करिआ! 'लेवकन' से एकदमे पाला छूट गइल गैस चूल्हा आवते। शुरू-शुरू में त बड़ी मजा आवत रहे टूप से लाइटर से गैस बारे में आऊ चाय, खाना बनावे में, पर धीरे-धीरे ' घर के मुर्गी दाल बराबर' हो गइल आऊ इहो एगो जीवन के हिस्सा बन गइल! लेकिन चूल्हा छूटते सपना हो गइल खाना बनाते टाइम हांथ सेंकाए के सुख, भूंजल आलू, मकई आऊ शकरकंद के स्वाद!
न ऊ बचपन अब रहल, न माई, न लकड़ी वाला चूल्हा, न ...

© शर्मीला सुम्मी
29 Jan 2021, 18:20

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