Sunday, February 21, 2021

बचपन की सरस्वती पूजा





त्योहारों में होली, छठ और सबसे ज्यादा सरस्वती पूजा का बेसब्री से इंतजार होता था। बसंत के आगमन के साथ ही हम भी ऊर्जावान हो जाते थे। इसकी वजह थी #सरस्वती_पूजा और उससे जुड़ी तैयारियां। पिताजी #हाईस्कूल के प्राचार्य थे, तो सारा भंडार हमारे ही हाथों में होता था। स्कूल के एक शिक्षक और किसी होनहार छात्र को प्रसाद बनवाने और वितरण की जिम्मेदारी दी जाती थी और कुछ तेज-तर्रार कला प्रेमी छात्र-छात्राओं को मूर्ति की साज-सज्जा की जिम्मेदारी दी जाती थी। कुछ छात्र-छात्राएं पूजा पर भी बैठते थे, पर हमको बचपने से भूखा नहीं रहा जाता था इसीलिए घर में शार्टकट में सरस्वती मां के फोटो की पूजा करके कुछ फल खा लेते थे और मूर्ति के पास पहुंचते।

सबसे मजा तो आता पूजा के एक दिन पहले, जब मां सरस्वती को #मूर्तिकार के पास से लाया जाता और दूसरी तरफ रातभर अमरूद के बगीचे में प्रसाद बनता। प्रसाद बनाने की जिम्मेदारी हमेशा लक्ष्मण काका को मिलती। हमारी उनसे पहले ही सेटिंग हो जाती थी, क्योंकि कभी-कभार नजर बचाकर हम उनकी दुकान पर पहुंच जाते लकठ्ठो और गाजा लेने। यही परिचय उस दिन काम आता था। मिट्टी का चूल्हा दो दिन पहले ही बनता,फिर सिंदूर टिककर चूल्हे की पूजा होती, तब प्रसाद बनने की शुरुआत होती।बेसन, चीनी लाने से लेकर चाशनी के लिए कुंए से साफ पानी भरने तक में हमारी खूब भागीदारी होती। इस दौरान बीच-बीच में माताजी का प्रवचन भी सुनने को मिलता रहता- "सरस्वती जी के सेवा में लागे से बढि़या नंबर ना आई,पढहूं के पड़ी।" पर अति उत्साह में इन बातों को कौन सुनता। बुंदिया बनने के बाद बेसन का जो घोल बचता उसमें काका से निछूना आलू की पकौड़ी बनवाने की सेटिंग पहले ही हो जाती थी। वो भला हमारी बात टालते भी कैसे? प्राचार्य साहब की बेटी होने का गौरव प्राप्त था मुझे। मेरे साथ-साथ #हाॅस्टल के सभी छात्रों का भी मनोबल ऊंचा रहता कि #हेडमास्टर साहब अगर नाराज होंगे तो इनपर ही सारा आरोप मढ दिया जाएगा।

पिताजी मूर्ति मंगाने और उसकी सजावट के लिए निर्देश देने में व्यस्त होते और हम इधर गर्मागर्म आलू की पकौड़ियों का जमकर लुत्फ उठाते। जब सजावट के लिए साड़ी देने की बारी आती तो मुझे खोजा जाता क्योंकि यह जिम्मेदारी मेरी थी। आलमारी सरियाने का काम मेरा ही था, इसलिए मुझे ही मालूम होता कौन- सी साड़ी कहां है। सामने की लाइन के लिए रंग-बिरंगी या लाल चुनरी और पीछे के लिए एक रंग की कोई हल्की साड़ी, झालर के लिए प्रिंटेड साड़ी ये सब खोजकर देना मेरा काम था।ये सब करते-कराते काफी रात हो जाती। कभी फाउंटेन बनवाने या रूई की सजावट करवाने में भी हम काफी रात तक अपनी भागीदारी निभाते तो कभी जल्दी सो जाते, ताकि सुबह जल्दी उठकर प्रसाद की बाकी तैयारी कर पाएं।

पूजा के दिन सुबह- सुबह उठकर गाजर धोने-काटने , मटर छिलने, दोना लाने जैसे काम होते। इतना सब करके अच्छे से तैयार होने की भी होड़ होती।अक्सर इसदिन पीले कपड़े पहना करती थी, आज भी लगभग यह परंपरा जीवित रखी हूं। कई बार तो सरस्वती पूजा के अवसर पर विशेष तौर पर पीले कपड़े सिलवाती या रेडीमेड लेती। थोड़ी- सी बड़ी होने के बाद नौंवी दसवीं क्लास में पीली साड़ी पहनने की शुरुआत हुई। काफी चुनकर कोई एक साड़ी कभी दीदी की तो कभी मां की साड़ी पसंद आती और बड़ी मेहनत से उसे किसी और के सहारे पहनती। चलना भी नहीं आता पर कोशिश जारी रहती और सभी सहेलियां साड़ी ही पहनती इसलिए बड़ा आनंद आता।

फिर हम सजधज कर निकलते सब जगह मूर्ति देखने। उस समय रथ डालडा से बने बुंदिया और बेसन के सेव में जो स्वाद मिलता वो अब शुद्ध घी से बने बुंदिया में भी नही मिलता। बुंदिया का चटचट चाशनी कईबार कपड़ों पर भी गिरा है, पर परवाह कहां थी। बुंदिया, बेर, गाजर, मटर, अंगूर, सेव का मिश्रित प्रसाद बड़ा भाता था। फिर शाम को होता स्कूल द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम, जिसमें सीनियर्स भाग लेते और हम होते दर्शक । 'गोदान', 'शतरंज के खिलाड़ी ' जैसे नाटकों का मंचन होता तो कभी रामायण के कुछ प्रसंग।

अगले दिन विसर्जन की तैयारी होती। आंख सुबह से ही नम रहती, बेटी की विदाई जैसा आलम होता। सहेलियों में सरस्वती जी के बाल नोंचकर अपनी-अपनी किताब में रखने की योजना बनती, जिसमें मैं शामिल नहीं होती। बचपन से ही अंधविश्वास के खिलाफ रही और यही मानती रही कि कर्म ही सबसे महत्वपूर्ण है। बिना माता के बाल किताब में रखे भी मैंअपनी सहेलियों से अव्वल रहती। मंत्रोचार के बाद मां की मूर्ति उठाई जाती और नदी किनारे आखिरी पूजा के बाद माता की मूर्ति विसर्जित हो जाती। बेटी के ब्याह के बाद वाली थकान हमसब महसूस करते और फिर इंतजार करते अगले सरस्वती पूजा का।

Sharmila Shumee
10 Feb 2019, 01:08

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