Sunday, February 21, 2021

चौदिशी




हमारे अंचल में #फागुन के महीने में लोकगीत की समृद्ध परंपरा है किंतु धीरे धीरे हम अपनी गौरवशाली संस्कृति,परंपरा से जुड़े हुए गीत-संगीत से दूर होते जा रहे हैं।आज के दौर में हम सभी को अपने सांस्कृतिक धरोहरों को बचाने के लिए आगे आना होगा।हमारे क्षेत्र में न चाहते हुए भी तेज ध्वनि वाले अश्लील और द्विअर्थी गीत आपको हर जगह सुनाई देगा। इन्हें गीत कहना गीत का अपमान होगा। इन्हें कर्कश शोर कहा जा सकता है। यात्रा,उत्सव या त्योहार के दौरान जब आप अपने परिवार के साथ बैठे हैं और ऐसा अश्लील,द्विअर्थी गीत जब बजता है तो शर्म से हमारा-आपका सिर झुक जाता है।अब हम सभी को मिलजुल कर ऐसे गीत बजाने पर विरोध करना चाहिए।बेहतर होगा कि हम सभी हमारी संस्कृति को कलंकित करने वाले ऐसे गायक और गीतकारों का सामाजिक बहिष्कार करें।

आज यह सब लिखते हुए मुझे अपने बाबा याद आ रहे हैं। वे #कोयल_नदी के उस पार एक हाई स्कूल में हेडमास्टर हुआ करते थे। शाम को जब वे घर आते थे तो हम बच्चें उनके पैर का बंटवारा कर लेते थें।हम में प्रतिस्पर्धा होती थी कि कौन ज्यादा अच्छे से उनके पैर दबाता है। इसी बीच बाबा हमें अनेक किस्से, कहानियाँ और गीत इत्यादि सुनाते थे।एक बार उन्होंने हमें एक गीत सुनाया और बताया कि इसे चौदिशी कहा जाता है। इसमें चारों दिशाओं के प्रदेशों की संस्कृति को रोचक तरीके से प्रस्तुत किया गया है।यह गीत तब कितना समझ में आया होगा। आप अंदाजा लगा सकते है लेकिन आज जब उस गीत को याद करती हूँ तो आनंद के साथ साथ सुकून भी मिलता है।

इस गीत में एक स्त्री अपनी सखियों से अपने पति के बारे में कहती है कि उसके पति उसकी बात ही नहीं सुनते हैं-

"ओ आली रे
मोर बतियो न माने
सखी रे मोर कहलियो न माने
अहो पुरुब दिशा मत जईह मोरे स्वामी
पुरुब के नारी सायानी
रात #सुताईहे बालम लाले पलंगे पर-2
दिनवा भरावत पानी
पुरुब के नारी #सायानी अरे हाँ।"

(इन पंक्तियों में पूर्वी राज्य जैसे मणिपुर, मेघालय, सिक्किम इत्यादि में स्त्री प्रधान समाज और बंगाल की बुद्धिमान नारियों के बारे में चुटीले अंदाज में वर्णन है)

"पच्छिम दिशा जनि जईह मोरे स्वामी
पच्छिम के देश वीरानी
खाये के दिहे #बालम खाड़ चिरौंजी
अहो चढ़ने को घोडा सुल्तानी
पछिमवा के देश वीरानी
अरे हाँ।"

(इन पंक्तियों में भारत के पश्चिमी राज्य जैसे राजस्थान गुजरात,पंजाब इत्यादि में भोज्य पदार्थों में विविधता की कमी और यातायात के साधनों के अभाव का वर्णन है)

"दखिन दिशा मत जईह मोरे स्वामी
दक्खिन के पातर पानी
पनिया पियते बालम तुहु मरी जईब
अहो हम धनि करत मंदिर के निहोरी
दक्खिनवा के ,#पातर पानी
अरे हाँ।"

(ये पंक्तियां दक्षिण के तटीय राज्यों के खारे पानी और मंदिरों की बहुलता को प्रदर्शित कर रही हैं।)

" अहो उत्तर दिशा चली जईह मोरे स्वामी
उत्तर गंगा बहे पानी
पनिया पियते बालम तुहु तरी जईब
संगे तरिहें सकल परिवार
उत्तरवा गंगा बहे पानी
अरे हाँ।"

(ये पंक्तियां उत्तर के प्रदेशों की बड़ाई कर रही है। गंगा सभी पापो का नाश करती है इसका जल ग्रहण करने से पुरे परिवार का उद्धार होता है और सौभाग्य से गंगा उत्तर के प्रदेशों में बहती है इसलिए उत्तरी प्रदेश श्रेष्ठ है)

ये पारंपरिक गीत जितने ज्ञानप्रद होते हैं उससे कई गुना ज्यादा आनंददायक भी हैं। हर कंडिका के बाद लय और ताल का बदल जाना पारंपरिक वाद्य यंत्रों का जबरदस्त प्रयोग लोगों को झूमने पर मजबूर कर देता है। कही कोई अश्लीलता या #फूहड़ता नहीं बल्कि आनंद ही आनंद इन गीतों की पहचान है।

Jaya Dubey
मंझिआँव (गढ़वा)
25 Feb 2019, 06:10

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