बचपन में ठंड के दिन के दू चार चीज बहुत अच्छी लगती थी ।एक तो सुबह के #घाम ,गजरा के हलुवा,मेथी के लड्डू अउ सुबह शाम जलने वाला 'बोरसी'(अलाव)।
गांव के लोगों के जीवन में आज भी बोरसी का बहुत ही अहम स्थान है। अब शहरों में तो ये प्रथा थोड़ी कम हो गई है पर हमारे बचपन के समय तो ठंड के समय बोरसी तापना हमारे जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग था।
सुबह-सुबह बाबूजी बोरसी में आग जलाते थे और हम सभी बच्चों को उठाते कि मुँह-हाथ धोकर थोड़ा आग सेककर सब लोग पढ़ने बैठ जाओ। एक तो घर के बाहर गोलाकार गड्ढा खोदकर उसमें लकड़ी जलाई जाती थी और दूसरा मिट्टी की #हांड़ीनुमा बोरसी हुआ करती जिसे उठाकर कहीं भी ले जाया जा सकता था।हालांकि ये काम बड़े लोग ही किया करते क्योंकि इसमें खतरा था।लकड़ी के चूल्हे पर खाना बनाने के दौरान घर की महिलाएं तो हाथ-पैर सेक ही लेती थी लेकिन पुरूष और बच्चे बोरसी(अलाव) के पास ही महफिल जमाते थे।कईबार तो हमारी मौखिक परीक्षा भी आग तापते ही हो जाती थी।सामान्य ज्ञान के सवालों का सिलसिला भी यहीं पर चलते रहता था।
बोरसी के किनारे-किनारे बैठे हम सभी बच्चे अंत्याक्षरी भी खूब खेला करते थे।कभी "#बुझौवल"का भी दौर चलता तो बातें करते-करते हम सभी छोटे-छोटे नए आलू आग में डाल दिया करते थे।आजतक मैं नहीं भूली हूँ उस सोंधे-सोंधे आग में पके आलूओं का स्वाद को।कभी कभी तो हमारे यह आलू चैरी हो जाया करते थे पकते-पकते।वैसे शातिर चोर के पास बहाना भी होता कि जल गया होगा तुम्हारा डाला हुआ आलू।हाँ,इसी बोरसी की आग में हम कभी-कभी शककरकंद तो कभी चिनिया बादाम पका लिया करते थे।
बड़े होने पर बोरसी (अलाव) की जगह ले ली हाॅट ब्लोवर और रूम हीटर ने।पर इसमें वो बात कहां जो बोरसी किनारे बैठकर हम हासिल किया करते थे ।आपसी प्रेम, झगड़े ,फिर सुलह, ग्रुप डिस्कशन, अंत्याक्षरी, टूटी फूटी आवाज में गाने और न जाने क्या क्या ।आज इस 'हाॅट ब्लोवर' मे न तो शकरकंद पकाने की सुविधा है और न ही सोंधे आलू का स्वाद मयस्सर है।
हां, आजकल अखबारों में पढ़ने को मिल जाता है कि कड़ाके की ठंड के मद्देनज़र प्रशासन ने चौक चौराहों पर अलाव की व्यवस्था की गयी है।आते-जाते कुछ बेबस लोग भी दिख जाते हैं अलाव के जरिए खुद को ठंड से बचाते हुए।पर आज न तो अलाव किनारे बैठकर हंसी ठिठोली का ,किस्से कहानियों का वो दौर रहा है न ही वैसे बच्चे दिखते हैं जो अब परियों की कहानियां सुनने में दिलचस्पी रखते हों।
रजाई कंबल काम न आवै,थर थर जाड़ हाड़ कंपावै
बूढ़ी नानी" बोरसी" सुलगावे ,सब लरिकन के कथा सुनावै"।
ये सब बातें अब अतीत का हिस्सा बन चुकी हैं। पर अब भी ठंड आते ही वो 'बोरसी ' याद आती है और साथ ही पूरा बचपन आंखों के सामने चलचित्र की भांति घूम जाता है । मुझे याद है कि ठंड बढ़ने पर ये बोरसी बूढ़े बुजुर्ग अपनी खटिया के नीचे रखा करते थे ताकि शरीर गर्म रहे।यह संभव हो पाता था बाध या सुतरी से बुने खटिया के कारण । उस समय छोटे छोटे बच्चों को बोरसी में अजवाइन डालकर सेंकने का रिवाज था । अब की तरह सीने में बलगम जकड़ने पर हाई एंटीबाॅयोटिक खिलाने का रिवाज नहीं था।पुराने गाय के घी को हांथ सेंक सेंककर छाती पर मलने से सर्दी जुकाम में में बहुत राहत मिलती थी ।जाड़े के दिनों में यह बोरसी सिर्फ हाथ सेंकने ही नहीं बल्कि लिट्टी पकाने के भी काम आती थी तो बल्कि आलू, #शकरकंद और चीनिया बादाम पकाने में। बहुउद्देशीय थी यह बोरसी की गर्माहट.. कह सकते हैं कि आम के आम और गुठलियों के भी दाम ।आग की गर्माहट में आपसी स्नेह के साथ मिल जाती थीऔर स्वादिष्ट #लिट्टी का स्वाद और हमारी माताएं तो कईबार इस #बोरसी में मिट्टी की हांडी रखकर दूध भी '#अऊटा लिया करती थीं।
उम्मीद है कि इस पोस्ट को पढ़कर आप भी बोरसी की जुड़ी अपनी स्मृति और आज भी उसके महत्व पर अपने स्मरण को साझा करेंगे।
©Sharmila Shumee
29 Dec 2018, 09:35

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