केकरा वोट देलीअई महतवाईन
पूरा #बूथ के आसपास एतना पुलिस रहता था कि पूछिए मत। अब जो कि हमलोग के सुरक्षा के लिए रहते थे, पर बचपन से अभी तक हमलोग के मन में कभी ये नहीं रहता था कि वो लोग हमलोग के सुरक्षा के लिए हैं, बल्कि उसके उल्टा डर ही लगते रहता था।
पहले तो वोट पेज में न होता था, तो कागज मोड़ने का ट्रेनिंग आऊ प्रैक्टिस दुनो घरे हमलोग करवाते थे। अब लाइन में लग के वोट दिलाने की बारी आती। अब एक एक घर के #लेडिज सब एके साथे लाइन में लग जातीं। बारी-बारी से सब लोग वोट देते। अब सब पहिले से जानते रहता है कि #फलनवा घर के लेडिज लोग हैं ई लोग #चिलनवा के वोट देंगे। लेकिन फिर भी अंत-अंत तक दु-चार ठो पहुँच ही जाता ट्राय मारने। आते के साथ -"गोड़ लागी, सभे जना आईल हिया। इहो #लालटेन छाप वाला बढ़िया आदमी हथी, फलना भईया से अभिये बतइले हली। कहलन कि बता दिहें फिर से रउअन के। का जनि कहूँ भीड़ में फंस गईल होइहें, इहेला सोचली कि बता दिंहू। ठीक बा न पाँचवाँ नम्बर वाला बा।"
अब इ सब एतना आराम से कहा जाता था कि एक-दो बार तो चाची सब देइयो के आ गए। बाद में पूछला से बोलती कि-" रऊये न कहेला भेजले हली एगो आदमी के, आके कहलन कि भईया कहले हथ कि बता देवेला। अब हम का जानी कि झूठो के कहत बा #निरबसिवा।" फिर हल्का-फुल्का शोरगुल होता, उसके बाद असली मिलन समारोह स्टार्ट होता। अब पंचायत भर के सब के घर से लेडिज लोग आती थीं। मेला पूजा के टाइम भी नया-नया पूतोह लोग नहीं निकलते थे,लेकिन वोट के दिन तो सब के सब न। उहो में हमर घर के लेडिज लोग अब पंडीजी थे तो सब गाँव घर के लेडिज लोग के #लॉटरी लगे जैसा हो जाता। बारी-बारी से सब आती अपन पूतोह सब के लेके दादी लोग ही पहचानती थी। तो दुनो तरफ से फिर #गोड़_लगाई स्टार्ट होता। ई फलना बहु हथ तो ई चिलना बहु।
अब कहीं कोई हाल फिलहाल में शादी होईल #पूतोह रहे तो ज़ाहिर सा बात है कि घुघ तान के रखती। उसी में कौन-कौनो लेडिज लोग उहईं #घुघ उठा के मुँह दिखाई भी स्टार्ट कर देते। अच्छा ईहाँ के फलना बाबू के परिवार हथ। कहाँ के हिया ओह फलनवा गाँव के, उहे #बिजुन तो हमर नन्हकी बहिन के बेटी के बियाह होईल बा। का तो नामो हई ओकर ससुर के याद नईखे अावत अभी। लेकिन बड़का जमींदार हथी उहाँ के , कइसे तो नमवा हई हम #बड़का_बाबु से पूछ के बताइब। ई तो बारी-बारी से चलते ही रहता था। कभी ई घर के तो कभी ई घर के परिवार लोग से मिलन समारोह चलते रहता।
फिर उधर से मिल जाती हमलोग के #महतवाईन_दादी। #हरवाहीन थी हमलोग की, पर बचपन से हमलोग उनको महतवाईन दादी के ही नाम से ही जानते थे। आके कहती -"सभे #गवाईन लोग के गोड़ लागईत ही, दे लेली वोट।" तब तक दादी पूछती-"केकरा देली वोट महतवाईन।" लालटेन के आऊ केकरा, #ललुआ आईल हलइ तो कह के गेल हलइ कि लालटेन के वोट दिह। अब कइसे ना देतिअई। राति तो सब घर दू-दू बोतल आदमी के नाम पर #दारुओ मिलल हलइ वोट देवेला। अब आज के दिन उनका वोट देने के लिए बराबरी का अधिकार दिखाना अच्छा भी लगता कि कम-से-कम एक दिन ही सही उनको इस बात का एहसास तो होता है कि उनका भी उतना ही महत्व है, जितना बाकी लोगों का भले कोई अमीर-गरीब कुछ भी रहे । वहीं रात में मिले हुए दारू के चलते वोट देना सुन के अफसोस भी कि अभी भी उनका इस्तेमाल किस तरह से किया जा रहा है।
खैर, ये सब तो चलते रहेगा। आज वोट है न ,#फेसबुक छोड़िए, जाइए वोट दीजिए और एक जिम्मेदार नागरिक होने का परिचय दीजिए। #पलामू में मतदान का प्रतिशत ही इस बात का गवाह बनेगा कि कितने लोग जागरुक हैं। आउर हाँ, शायद गाँव-घर के बूथ पर अभी भी कहानी का कुछ भाग देखने मिल जाए तो देखिए और मजा लीजिए।
Anand Keshaw
29 Apr 2019, 07:36

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