Sunday, February 21, 2021

लालटेन








बेर डूबते माई के फरमान शुरू हो जाइत रहे 'ललटेनिया के शीशवा साफ कर द तोहनी, लाइट के कवनो ठेकाना नइखे।' पापा की नौकरी के कारण #पाटन जैसी छोटी-सी जगह पर बचपन बीता और बचपन की उन यादों में '#लालटेन' भी शामिल है। अब तो लालटेन ढूँढने पर भी नहीं मिलता। उस समय बिजली नहीं रहने पर उसकी कमी 'लालटेन' से ही पूरी होती थी। लालटेन का शीशा निकालना और उसे सही-सलामत चढ़ाना सबके बस की बात नहीं थी। टिन का टंकी हुआ करता था मिट्टी तेल भरने के लिए और चौड़ी-सी बत्ती चढ़ाने के लिए चाबी के समान बना होता था, जिससे उसकी लौ कम-बेसी करने की सुविधा भी थी।

धीरे-धीरे लालटेन की परंपरा खत्म होने लगी और उसकी जगह ले ली' लैंप' ने। तरह-तरह के शीशे और मेटल टंकी वाले लैंप बाजार में आने लगे। इनका आधुनिकीकरण भी हुआ और रंगीन लैंप भी आए जो जलते तो मिट्टी तेल से ही थे, पर बेहद खूबसूरत लगते थे। पूस की रात में मैट्रिक की परीक्षा की तैयारी के लिए सुबह तीन बजे उठना पड़ता था। बड़े ही भारी मन से फिर से लालटेन के शीशे को हम साफ करते। कभी हमसे पहले सामने रहने वाले श्रीवास्तव सर के घर लालटेन की रोशनी दिख जाती तो गजब की प्रतिस्पर्धा की भावना आ जाती कि उनके बेटे ने तो अबतक एक चैप्टर पूरा भी कर लिया होगा। बाबूजी का कहना था कि भोरे उठ के कुछ भी रटने से जल्दी याद हो जाता है और हमेशा याद भी रहता है। इहे ललक में हमनियो भोरे-भोरे उठके इतिहास की तैयारी किया करते ताकि सन ईस्वी बढ़िया से याद हो जाए। कबो आँख खुले में देर हो जाए तो बहुत अफसोस होता था कि सामने के घर में 'लालटेन' जल गइलक आउ हम अभी सुतले रह गइली। आँख मइसते 'लालटेन' जरावे में पारंगत हो गइल रही। अब के लइकन के सब सुविधा मिलल बा इमरजेंसी लाइट, इन्वर्टर, जेनरेटर, नियमित बिजली, तबो इनकर मन पढ़ाई में जादे ना लगे। हमनी 'लालटेन' में पढ़ के आपन ग्यान बढ़इले हली।

एकबार त 'लालटेन' ले के पुआल के #बिछौना पर होमवर्क बनावे के चक्कर में लालटेन पुआल पर गिर गइलक आऊ आग लग गइलक ओह दिन अगर नेवार वाला ऊँचका पलंग ना रहित, तो कुटाए से हमरा केहू न बचाइत। गलती त होइए गइल रहे का करती पलंग के नीचे घुस के जान बचइली। इ 'लालटेन' गाँव के लोगन के सामाजिक भी बना देलक। जेकर घर में 'लालटेन' के रोशनी हो सब बच्चा पार्टी वहीं पढ़े पहुँच जा हलन। ये सब उस दौर की बातें हैं जब हमारे गाँव 'लालटेन युग' में जीने को विवश थे। अब तो भकभक इंजोरिया है सगरो गाँव में भी। बल्ब, सीएफएल की रोशनी से नहाए हैं गाँव भी। अब 'लालटेन' इतिहास की वस्तु बन गई है। इसे संजोकर रख सकते हैं अपनी भावी पीढ़ी को दिखाने के लिए कि कभी इसकी रोशनी में हम पढ़ा करते थे।

अब इतनी सुविधाजनक जिंदगी हासिल करने के बाद भी वो सुकून नहीं मिलता, जितना 'लालटेन' की रोशनी से हासिल ज्ञान में था। लगता है कि सब नाॅलेज तो 'लालटेन' के उजाले से ही मिला। पर उसका धुआँ और धुएँ से निकलती बदबू आज भी हमें याद है। हमारे पुराने जमाने की यादगार चीजें हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए धरोहर हैं।हमारी अगली पीढ़ी बड़ी ही कौतूहल से 'लालटेन', नेवार पलंग, खटिया, मचिया, #सिलऊट, #जांता और #ढेंकी जैसी चीजों को देखेगी।

©Sharmila Shumee
6 Dec 2018, 10:09

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