तैयार हो गेली भऊजी वोट देवे ना जबई का
वोट का टाईम है, हर तरफ शोरगुल चल रहा है। ये तो सब कोई देख रहा है और देखते आया है, पर बस वोट के एक दिन पहले पूरा सन्नाटा। लेकिन असली हल्ला-गुल्ला तो वोट के दिन होता था। तो चलिए आज से 15-16 साल पहिले के वोट के दिन का माहौल दिखाते हैं।
10 बजते चाचा उधर से आते और माई चाची लोग से कहते-"आंय जी भऊजी, अभी तक रउअन के काम नईखे ख़त्म होईल। आऊ ई देख न #हटिया के माई के एतना #बासन लेके बईठल हथी अभी। कखनी तैयार होतथी, कखनी जतथिन। उहाँ #मिसिर जी घर सब तैयार हो के असरा देखइत हथीन।" हर बार की तरह चाची लोग कहती-"अरे अब वोट देवे जायेला हई तो कामवो नखई करेला, कमवा ख़त्म कर लिहुँ तब न। काहेला तो ई #अल्कोरवा के वोट आवेला न कुछ मिलेला न जायेला झूठो को #कपरबथि।"
अच्छा-अच्छा चलूँ तैयार हो जाऊँ जल्दी अवइत ही देख के होने #बिंदु_भैया के मेहरारू तैयार होलन की ना । जल्दी-जल्दी करूँ सब फिर ढेरे भीड़ हो जाई तो जा के खाड़ा रहेला पड़ी। अब भले चाची लोग इसको कपरबथि कहे पर अंदर से सब का किसी बड़े मेला से कम उत्साह नहीं रहता था और हो भी काहे नहीं आखिर लोकपर्व का सबसे बड़ा त्योहार ही तो है #मतदान। एतना उत्साह शहर के बूथ पर मुश्किल से देखने मिलेता होगा। अभी के जैसा इतना गाँव-गाँव मुहल्ले- मुहल्ले बूथ नहीं रहता था। सब मिला के पंचायत भर में एके गो सेंटर रहता था। जहाँ पूरा #पंचायत के लोग वोट देने आते थे। इसलिए भीड़ भी अच्छा खासा रहता था।
अब ये टाईम में हमलोग बच्चा लोग का अलग उत्साह रहता था। माँ लोग के कहने पर 10-12 घर में जा के दौड़-दौड़ के पता करना कि के के तैयार हो गया है के नहीं हुआ है। इसके साथ-साथ हमलोग घरे आ के ई भी बताते कि कवन चाची कवन रंग के साड़ी पहिन के जा रही हैं। ताकि एके रंग के साड़ी दु लोग के न रहे। इस बात का भी ध्यान पूरा रहता था। हाँ अब कोई गोई रहे तब तो जान बूझ के एके रंग के पहिना जाता था कि सबको पता चले कि दुनो आपस में #गोई हैं।
जब सब तैयार हो जाते तो एके साथ सब अपना अपना घर से निकलते। लगभग 30-40 के संख्या में निकलते तब हमलोग भी सब के साथे पूरा तैयार होके सब के आगे-आगे निकलते जैसे कि अभी बूथ पे जा के #नामधारी जी से कहे कि देखिये एतना वोट हमही लेके आये हैं। 2-4 पॉकिट 5 #किरिया चॉकलेट तो चाहिए ही।
अब बुथ में भीड़ तो रहता ही था उसके बाद चाचा लोग के गोसाना स्टार्ट- "आउ देरिये से आईति एतना जल्दी काहे आ गेली? ई सब के कितना भी समझाओ लेकिन इनलोग सुधरेगा ही नहीं "। (कभी घर मे #गार्जियन लोग के बात करते हुए सुनियेगा #पलमुआ बोलते-बोलते जब तक बीच मे 2 लाइन हिंदी न बोल ले तब तक बात ही पूरा नहीं होता है और यही हिंदी बोलते टाइम पलमुआ का होता है।)
अब इतना होने के बाद होता है सबके नाम के पर्ची का बारी होता था। अब अभी तक तो हमलोग गांव भर के दादी चाची के #फलनवा के दादी, #चिलना भईया के माई के नाम से जानते थे, पर आज के दिन सब का असली नाम पता चलता था। एक एक लोग का नाम जइसे-जइसे पता चलता तो लगता कि कउनो बड़का राज जान रहे हैं। इसी बीच मे चाचा लोग आ आ के बीच मे बोलते रहते कि इयाद बा न नामधारीया के ही देवेला बा, तीसरा नम्बर पर बा, तीर के निशान देख के लगाएब (उ घरी इहे एगो उमीदवार रहते थे लगातार 4-5 बार विधायक भी तो रहे थे)। घर के #सवांग लोग के एतना वोट दिलाने के लिए जो जिम्मेदारी और ओतना ही घरे के #जनानी सब के वोट देने के लिए जागरूकता देख के सही में बचपन के #दशहरा #दिवाली के मेला भी छोटा दिखने लगता था। शायद इसीलिए इसको सबसे बड़ा लोकपर्व भी कहा गया है।
अब वोट देने,उसके बाद का सब लेडीज लोग के मिलन समारोह और अभी के समय मे वोट के कहानी अगला भाग में....
Anand Keshaw
23 Apr 2019, 04:31

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