बेला आंटी ने ऑफिस से छुट्टी ले रखी है। फगुनी काकी के साथ मिल कर घर की सफाई जो करनी है। साल भर बाद तो आती है #दीवाली। ऐसे में बेला आंटी का #प्लास्टर_ऑफ़_पेरिस से पूता शानदार घर दुल्हन की तरह सज जाना चाहिए। बच्चे मदद कम परेशान ज्यादा कर रहे हैं। चारों तरफ दीवाली की धूम है।
इन धूम-धड़ाके से कोसों दूर #गढ़वा_पलामू के सुदूरवर्ती गाँव के लोग हाथों में कुदाल और माथे पर टोकरी लिए #मटखान की और चल पड़े होंगे। इन भोले-भाले लोगों को नहीं मालूम कि पलामू की मिट्टी का PH मान 4.8 से 8.9 है। इस मिट्टी में जैविक कार्बन 0.10 %से 1.64%, नाइट्रोजन 120 से 809 kg/हेक्टेयर, फास्फोरस 0.2 से 38.2 kg/हेक्टेयर, पोटाश 76 से 1680 kg प्रति हेक्टेयर, सल्फर 0.61 से 82.86 mg/kg, लोहा 95.4%, मैंगनीज़ 95.4%, कॉपर 94.1% तथा जिंक 85.7% है। इन्हें ये भी नहीं मालूम कि लौह तत्वों की अधिकता के कारण उनकी मिटटी का रंग इतना लाल है।
इन लोगों के लिए तो ये मिट्टी माँ है, प्रेयसी है, जीविका है, ईश्वर है, सब कुछ तो है और हो भी क्यों ना इसी मिट्टी से वे घरों की पुताई करेंगे और पूरे साल उसकी सौंधी खुशबू को महसूस करेंगे। माटी के दीयों की पवित्र रोशनी न जाने कितने घरों में आशा और प्रेम का संचार करेगी, कितनी ही मासूम बालिकाएंँ इस माटी से घरौंदे बनाएँगी और अपनी #काल्पनिक_गृहस्थी बना लेंगी, देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे अमीर-गरीब सभी सर झुकाएंँगे और खुशहाल जीवन के लिए प्रार्थना करेंगे। किसी भी लाडली का विवाह बिना चौमुख दीया, ढकनी और कलशों के नही होता। "माटी उनके लिए आराध्य है, तो मटखान उनका मंदिर।"
हमारे गाँव के #पछियारा छोर पर एक मटखान है, मेरे घर से कोई 2 km दूर। वहाँ की माटी एकदम चिकनी और लाल है। वहाँ पहुँचने के लिए एक कब्रिस्तान से गुजरना पड़ता है। बचपन में हम सभी बच्चे दीवाली से पहले मटखान जाने के लिए उतावले रहते थे और मौका पाते ही गमला या बड़ा कटोरा ले कर #बनिहारिन के साथ हो लेते। उन दिनों हमें ये लगता था कि कब्रिस्तान में गाड़े गए मुसलमानों के खून के कारण वहाँ की माटी इतनी लाल है।
मटखान पहुँचने के बाद पहला काम होता था, सबसे बढ़िया माटी वाली जगह पर कब्जा करना। बहुत भीड़ होती थी वहाँ। पूरे इलाके के लोग माटी लेने आते थे। बरसात के तुरन्त बाद दीवाली होने के कारण माटी में नमी होती थी, जिसके कारण थोड़ी-सी मिट्टी भी काफी भारी हो जाती थी। बनिहारिन हमें कटोरे में भर कर मिटटी दे देती थी, लेकिन घर पहुँचते-पहुँचते उस कटोरे को आधा हो जाना था, ये उन्हें मालूम होता था। हम रास्ते भर माटी का एक एक ढेला फेंकते जो आते थे। वे माटीवालियाँ हमारे बेतुके सवाल, बदमाशियाँ, नखरे सबकुछ ऐसे झेलती थी, मानो हमारे घर की हों।
अब तो सबकुछ स्वप्न-सा लगता है। माटीवाली अब हाशिये पर आ गईं। मटखान की जमीं पर कंक्रीट और सीमेंट के जंगल स्थापित हो गए। दीयों का स्थान लाइट्स की लड़ियों ने ले लिया। हमने सबकुछ धीरे-धीरे खो दिया है। मिट्टी के दीये, घरौंदे, खिलौने साथ ही अपनी माटी की सौंधी खुशबू भी। सुनो! चलो ना एक बार फिर इस मिट्टी से जुड़ते हैं और जी लेते हैं कुछ पल सुकून के।
©Jaya Dubey
(मझियांव,गढ़वा)
इन धूम-धड़ाके से कोसों दूर #गढ़वा_पलामू के सुदूरवर्ती गाँव के लोग हाथों में कुदाल और माथे पर टोकरी लिए #मटखान की और चल पड़े होंगे। इन भोले-भाले लोगों को नहीं मालूम कि पलामू की मिट्टी का PH मान 4.8 से 8.9 है। इस मिट्टी में जैविक कार्बन 0.10 %से 1.64%, नाइट्रोजन 120 से 809 kg/हेक्टेयर, फास्फोरस 0.2 से 38.2 kg/हेक्टेयर, पोटाश 76 से 1680 kg प्रति हेक्टेयर, सल्फर 0.61 से 82.86 mg/kg, लोहा 95.4%, मैंगनीज़ 95.4%, कॉपर 94.1% तथा जिंक 85.7% है। इन्हें ये भी नहीं मालूम कि लौह तत्वों की अधिकता के कारण उनकी मिटटी का रंग इतना लाल है।
इन लोगों के लिए तो ये मिट्टी माँ है, प्रेयसी है, जीविका है, ईश्वर है, सब कुछ तो है और हो भी क्यों ना इसी मिट्टी से वे घरों की पुताई करेंगे और पूरे साल उसकी सौंधी खुशबू को महसूस करेंगे। माटी के दीयों की पवित्र रोशनी न जाने कितने घरों में आशा और प्रेम का संचार करेगी, कितनी ही मासूम बालिकाएंँ इस माटी से घरौंदे बनाएँगी और अपनी #काल्पनिक_गृहस्थी बना लेंगी, देवी-देवताओं की मूर्तियों के आगे अमीर-गरीब सभी सर झुकाएंँगे और खुशहाल जीवन के लिए प्रार्थना करेंगे। किसी भी लाडली का विवाह बिना चौमुख दीया, ढकनी और कलशों के नही होता। "माटी उनके लिए आराध्य है, तो मटखान उनका मंदिर।"
हमारे गाँव के #पछियारा छोर पर एक मटखान है, मेरे घर से कोई 2 km दूर। वहाँ की माटी एकदम चिकनी और लाल है। वहाँ पहुँचने के लिए एक कब्रिस्तान से गुजरना पड़ता है। बचपन में हम सभी बच्चे दीवाली से पहले मटखान जाने के लिए उतावले रहते थे और मौका पाते ही गमला या बड़ा कटोरा ले कर #बनिहारिन के साथ हो लेते। उन दिनों हमें ये लगता था कि कब्रिस्तान में गाड़े गए मुसलमानों के खून के कारण वहाँ की माटी इतनी लाल है।
मटखान पहुँचने के बाद पहला काम होता था, सबसे बढ़िया माटी वाली जगह पर कब्जा करना। बहुत भीड़ होती थी वहाँ। पूरे इलाके के लोग माटी लेने आते थे। बरसात के तुरन्त बाद दीवाली होने के कारण माटी में नमी होती थी, जिसके कारण थोड़ी-सी मिट्टी भी काफी भारी हो जाती थी। बनिहारिन हमें कटोरे में भर कर मिटटी दे देती थी, लेकिन घर पहुँचते-पहुँचते उस कटोरे को आधा हो जाना था, ये उन्हें मालूम होता था। हम रास्ते भर माटी का एक एक ढेला फेंकते जो आते थे। वे माटीवालियाँ हमारे बेतुके सवाल, बदमाशियाँ, नखरे सबकुछ ऐसे झेलती थी, मानो हमारे घर की हों।
अब तो सबकुछ स्वप्न-सा लगता है। माटीवाली अब हाशिये पर आ गईं। मटखान की जमीं पर कंक्रीट और सीमेंट के जंगल स्थापित हो गए। दीयों का स्थान लाइट्स की लड़ियों ने ले लिया। हमने सबकुछ धीरे-धीरे खो दिया है। मिट्टी के दीये, घरौंदे, खिलौने साथ ही अपनी माटी की सौंधी खुशबू भी। सुनो! चलो ना एक बार फिर इस मिट्टी से जुड़ते हैं और जी लेते हैं कुछ पल सुकून के।
©Jaya Dubey
(मझियांव,गढ़वा)
5 Nov 2018, 09:44

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