Sunday, February 21, 2021

तिमिर में दीपोत्सव





ये एक अजीब सा संयोग है कि आज 31 अक्तूबर, अनुराग का जन्मदिन है। ये नाम 1 अक्तूबर,साल 2000 के बाद आज पहली बार ले रही,वो भी पन्ने पर। जुबान पर लाने का साहस कभी नहीं जुटा,ह्रदय में तो हर पल,हर घड़ी,हर धड़कन में जीवित है।
मात्र एक दिन पहले तो मेरे पति से मेरे लिए किताबें भेजी थी उसने। उन्हे स्टेशन पर कुछ छूटी चीजें पहुँचा कर गया था। बड़ा हो गया था अनुराग। वो बच्चा जो हमारी शादी के वक्त मात्र छः वर्ष का था, अब तेरह का हो चला था।
दुर्गा पूजा की चतुर्थी थी, दिन रविवार का था। मैं कोलकाता में अपने पति के साथ पूजा की खरीदारी कर घर लौटी थी। दोपहर का भोजन कर हाथ धो रही थी कि फोन की घंटी घनघनाने लगी। फोन की दूसरी ओर शायद मेरी बहन थी। फोन रखने के पश्चात मेरे पति व्याकुल हो गये –
“अनुराग बहुत बीमार है, हमें शीघ्र प्रस्थान करना होगा “,ऐसा कह कर मुझे सामान समेटने का निर्देश दिया उन्होंने। मेरा मन अनिष्ट की आशंका से काँप रहा था। लग रहा था, जैसे मुझसे कुछ छिपाया जा रहा हो।
जैसे तैसे कुछ जरूरी सामान पकड़, एक हाथ मे अपने दो साल के बच्चे को गोद में ले,पति के पीछे चल पड़ी थी ट्रेन पकड़ने। दुर्गा पूजा की भीड़, ठसाठस भरा जनरल बोगी। रास्ते भर के पंडाल, सब कुछ उस वक्त बेमानी थे मेरे लिये। अगले दिन दस बजे मायके की देहरी पर कदम रखते ही सब समझ गई थी मैं। सीढ़ी पर बहन खड़ी थी, कलप उठी मुझे देखकर।
“बौआ चला गया ” हथौड़े की तरह मेरे कलेजे पर लगा था यह वाक्य। ये काँटा आज भी उतनी ही जोर से गँथा हुआ मालूम पड़ता है।
बौआ अनुराग का ही घरेलू नाम था। हमारे घर का सबसे छोटा और दुलारा सदस्य,जिसे हम खो चुके थे।मेधावी,होनहार और प्रिय बालक जो उस दिन अपने दो मित्रों के साथ छुट्टी मनाने डैम की ओर गया और फिर कभी लौट कर नहीं आया। वो डैम तीनों को एक साथ लील गया।
घर के सदस्यों की हालत तो अवर्नणीय थी,उसका पालतू कुत्ता “लाइका” भी सदमे में था। आखिर अपने हिस्से का दूध उसे देने वाला,अपने हाथों से उसे रोटी पका कर देने वाला उसका प्रिय मालिक जो चला गया था। उस सुबह भी उसे प्यार से नहा कर उसके गले का पट्टा बदला था उसने।
दुर्गा पूजा तो हमारे लिए आज भी उसी दुःखद घटना की यादों का सैलाब लेकर आता है। उस बार भी , पचीस दिनो बाद फिर दीवाली आई थी,दीपों का उत्सव लेकर। पर हमारे मनों में तो अंधकार ही अंधकार था। पापा ने कहा था,”ये हमारी सबसे काली रात है “। हम सब बहुत कष्ट में थे।
रात आई तो हम छत पर चढ़े। शायद देखना चाह रहे थे कि बौआ के बिना भी दीपावली संभव थी क्या?
“ये क्या ?”,चारो ओर जहां तक नजर जा सकती थी, किसी भी छत, किसी भी दीवाल पर एक दीप नहीं नजर आया था। सारे मुहल्ले में दूर दूर तक पसरा अंधेरा देख कर हम रो उठे थे। बाहर का तिमिर इस बात का प्रतीक था कि हम अकेले नहीं थे। सारा शहर हमारे दुःख में हमारे साथ था। हमारे उर का तम धीरे-धीरे धुंधला हो रहा था और दीपों की अनेक पंक्तियाँ हमारे अंतरतम में अनायास जगमगा उठीं थीं।

© Priyanki Mishra
31 Oct 2018, 20:21

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