Sunday, February 21, 2021

मारवाड़ी पुस्तकालय (since 1915)




डाल्टनगंज के ऐतिहासिक धरोहरों की बात की जाए तो एक महत्वपूर्ण नाम है-मारवाड़ी पुस्तकालय। सन 1915 में स्थापित इस पुस्तकालय के महत्व का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि उस वक़्त के कई बड़े नेता महान विचारक और बुद्धिजीवी लोगों का स्नेह इस पुस्तकालय को सदैव मिलता रहा है। जी हाँ,कन्नीराम चौक स्थित इस ऐतिहासिक पुस्तकालय में महामना पंडित मदन मोहन मालवीय, राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी, लोकनायक जयप्रकाश नारायण जैसे बड़े-बड़े दिग्गजों का आगमन हो चुका है। इन महापुरुषों ने यहाँ पर रखी आगंतुक पुस्तिका में पुस्तकालय के लिए शुभकामना संदेश भी लिखें है जो आज भी पढ़ी जा सकती है।

अपने स्वर्णिम समय में यह एक समृद्ध लायब्रेरी थी।लंबे समय तक यह ज्ञानपिपासु लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण केन्द्र के रुप में लोकप्रिय रही है। आज भी यहाँ पर ढ़ेर सारी दुर्लभ पुस्तकें,पत्र-पत्रिकाएं और ऐतिहासिक अख़बारों की प्रतियां उपलब्ध हैं। जैसे भगत सिंह को फांसी लगने के दूसरे दिन का अख़बार, आज़ादी मिलने के बाद सुबह का अख़बार.... जैसे धरोहर, जो आज अमूल्य हैं।इसके अलावा यहाँ हिन्दी अंग्रेज़ी और उर्दू भाषा के ढ़ेर सारे दुर्लभ ग्रंथ हैं और उस समय की अनेक महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाएं, जो आज हमारी बहुमूल्य धरोहर बन चुकी है।

इस लायब्रेरी के ऐतिहासिक महत्व और उसकी स्थापना से संबंधित बातों की जिज्ञासा के कारण कुछ दिन पहले पुस्तकालय गया था।उस समय वहाँ की दयनीय स्थिति को देखकर बहुत बुरा लगा।आज भी यह लाइब्रेरी नियमित रुप से खुलती जरूर है परन्तु जिज्ञासु लोगों को पुस्तकें पढ़ने को नहीं मिल पाती है। वहाँ जाने पर हमें भी सिर्फ निराशा ही हाथ लगी क्योंकि पुस्तकों की सभी अलमारियां बंद थी।यह देखकर हमें बहुत दुःख हुआ।

आज 100 साल से अधिक पुरानी और हमारी अमूल्य धरोहर इस पुस्तकालय की बहुत बुरी स्थिति है। पलामू के नागरिक,लाइब्रेरी के संस्थापक सदस्यों के उत्तराधिकारियों और पलामू के जनप्रतिनिधियों को यह सोचना चाहिए कि उनकी अनदेखी और नाकामी के वजह से आज एक ऐतिहासिक धरोहर सीमित संसाधन और अव्यवस्था के कारण दुर्दशा की शिकार हो चुकी है।आज यहाँ पढ़ने के लिए पुस्तकें भी उपलब्ध नहीं हो पाती है। इसीलिए गिने चुने ही लोग वहाँ जाते हैं। वर्तमान में पुस्तकालय परिसर में शिक्षा के नाम पर तीन कमरों का तीन स्कूल चल रहा है। जिसमें विद्यार्थी तो कम हैं किन्तु 20 से ज्यादा शिक्षक पदस्थ है।

अपने शुरूआती दिनों में एक महान उद्देश्य को लेकर इस पुस्तकालय का निर्माण किया गया होगा।उस समय तत्कालीन समस्याओं के लिए समाधान के लिए,गुलाम भारत की आज़ादी के लिए और एक क्रांतिकारी प्रयास के रुप में समाज को शिक्षित करने के लिए इस पुस्तकालय की स्थापना की गयी होगी। पर आज इस गौरवशाली पुस्तकालय के इतिहास और महत्व को देखते हुए पर्याप्त संसाधनों का विस्तार नहीं हो पाया।जिसके कारण यह जर्जर और उपेक्षित पड़ा हुआ है।जिम्मेदार लोगों के अनदेखी की वजह से आज यह महत्वपूर्ण स्थल अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

ठेठ पलामू के माध्यम से मैं सभी विद्यार्थियों, बुद्धिजीवियों,इतिहासकार और साहित्य प्रेमियों का ध्यान इस ओर आकर्षित करना चाहता हूँ कि आप सभी आगे आएं और हम-सब मिलकर इस ऐतिहासिक लाइब्रेरी को पुनः समृद्धि और यश के शिखर तक पहुंचाए और इसमें उपलब्ध ज्ञान के भंडार को वर्तमान और भावी पीढ़ी को उपलब्ध कराएं और इसको विलुप्त होने से बचाने का भरसक प्रयास करें ।

©रोहित पाठक
24 Oct 2018, 15:09

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