Sunday, February 21, 2021

चइता गीत








ठेठ पलामू के पिछले लेख में जैसा बताया गया था कि '#चैता' और '#चैती' दो अलग विधाएँ हैं।
'चैती' श्रृंगार प्रधान गीत होते हैं। चैत का महीना ऋतु के गहरे भाव बोध का महीना माना जाता है। यह महीना प्रेम के गहरे रंग में दिल के दाग को देखने का महीना है। इसमें सुख और दुख, आशा और निराशा, राग और विराग दोनों भाव दिखाई पड़ते हैं।

ठेठ पलामू के पिछले पोस्ट के बाद ही बलिया (उत्तर प्रदेश) की एक प्रमुख पत्रिका '#पाती' में बक्सर (#बिहार) के कवि #जगन्नाथ द्वारा रचित एक गीत पढ़ा। जिसका अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ।

इस ''#चइता_गीत' में नायिका का प्रियतम उससे दूर है और नायिका की विरह वेदना अपनी चरम सीमा पर है। प्रिय-विरह में दुखी नायिका इस गीत के माध्यम से अपने दुख को व्यक्त करते हुए कह रही है कि हे रामजी! चैत के इस महीने में जब मैं अपने प्रिय को याद करती हूँ, उनसे मिलन के स्वप्न देखती हूँ।इस गहरे दुख के कारण मेरी आँखें आँसुओं से भर जाती हैं।

ऐसे दुख भरे क्षण में #पपीहा की पीउ-पीउ की आवाज सुनकर ऐसा लगता है कि वह मुझे दुखी देखकर और चिढ़ा रहा है। सच कहूँ तो मेरे मन की बात मन में ही रह गई है और चाहकर भी मैं उसे अपने होंठों तक नहीं ला पा रही हूँ कि मेरे मन रुपी भवन के स्वामी अर्थात मेरे प्रियतम मुझसे दूर हैं और इस सूनेपन में उनके बिना मैं स्वयं को अकेली महसूस कर रही हूँ।

हे रामजी! इस सुहावने चैत के मौसम में मंजर से भरी आम की डाली पर बैठी कोयल की "कुहुss कुहुss.."की आवाज भी मुझे विष जैसी जहरीली महसूस हो रही है। उसकी जहरीली आवाज सुनकर मेरा जी और जल उठता है।यहाँ सब सुखी हैं, आनंद उठा रहे हैं। मैं अकेली दुखी हूँ। यहाँ उनके(प्रिय)नहीं होने के कारण मैं विरह की आग में जल रही हूँ और सब मेरा मजाक उड़ा रहे हैं।

मैं प्रत्येक क्षण भगवान से प्रार्थना करती हूँ कि मेरा दुख समाप्त हो।इस असहनीय विरह के कारण मेरी बुद्धि भी काम नहीं कर रही है कि किस तरीके से मेरे प्रियतम से मेरा मिलन हो। इस समय तो मेरे हाथ का कंगन भी मुझे अपना दुश्मन प्रतीत होता है। जिसके बार-बार खनकने से मुझे अपने प्रियतम की याद आ जाती है।

हे रामजी! इस जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है। यह बदमाश पछुआ हवा तो रह रहकर मुझे और भयभीत कर रहा है। कहीं एक दिन यह मेरी जान न ले ले। हे रामजी! मुझे अपने प्रियतम से मिला दो। मेरे विरह को दूर कर दो। अपने प्रियतम के अमूल्य धन अर्थात मैं स्वयं को आखिर कब तक इस लूटमार से बचा पाऊँगी।

हे रामजी! मुझे इस झूठे कौए पर भी बहुत गुस्सा आ रहा है।घर की मुंडेर पर रोज इसकी आवाज सुनकर मुझे लगता है कि मेरे प्रियतम आएँगे, लेकिन यह पापी कौआ भी मुझ अबला के साथ झूठा मजाक कर रहा है। सच कहूँ, मुझे ऐसा लगता है कि बुरे समय में दुख कम करने की बजाए सभी आपका मजाक उड़ाते रहते हैं।

हे राम जी! अपने प्रियतम तक किसके हाथ से संदेश भेजूँ कि उनके यहाँ नहीं रहने के कारण मैं कितनी दुखी हूँ। यहाँ तो सभी अपना वेश बदल बदलकर मुझे परेशान करने में लगे हैं। आपको छोड़कर मैं अब किसी पर भरोसा नहीं कर सकती। हो सके तो उन तक यह संदेश पहुँचवा देना कि चैत के इस महीने में उनके विरह ताप में मैं जल रही हूँ। मेरी साँसें अब पल दो पल की ही मेहमान है। इसलिए वह जल्दी आ जाएं, जिससे मेरा दुख दूर हो जाए।

Ajay Shukla
3 Apr 2019, 04:39

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