कबो-कबो पिकनिक मनावे जंगल तरफ जाए के मौका मिला तो पहिला बार देखे कि इहां लोग '#चुआंड़ी' से पानी निकाल के पीता है। एकबार हमनीओ पानी के डिब्बा ले जाएला भूला गए घरे से तो 'चुआंड़ी के पानी सूती कपड़ा से छान कर के पीए थे। अभीओ तक इयाद है। तनको अच्छा नहीं लगा था पर मरता क्या न करता! ।पिआसे जान निकल रहा था।
जब बड़ा हुए त देखे कि इ 'चुआंड़ी ' त कईलोग खातिर गर्मी में जान है। नदी में जब सिर्फ बालूए बालू बचता है ,पानी के नामोनिशान नहीं रहता है तब इ 'चुआंड़ी ' ही लोगन के प्यास बुझाएवे के आखिरी उम्मीद बचता है।जहां पानी के एक एक बूंद खातिर लोग तरसता है अप्रैल मई में तो इ भूल जाता है लोग कि इ पानी स्वास्थ्य खातिर सुरक्षित नहीं है।इ पानी से केतना बीमारी हो सकता है । नहाए धोवे चाहे बर्तन धोवे खातिर तो ठीक है पर पीए खातिर इ पानी खतरे से खाली नहीं! अब बहुत जल्दीए कोयल में इ नजारा सरेआम देखने को मिलेगा । सुबह होते लोग डेकची ,तसला ले के पहुंचने लगता है 'चुआंड़ी 'खोदने आऊर आपन प्यास बुझाने । #कोयल में अभिए रेत दिखने लगा है।जल्दीए पानी खातिर लोग भटकेगा आऊर 'चुआंड़ी ' के सहारा लेगा।कई बार तो मारापीटी के नौबत भी आ जाता है ।डॉक्टर कहते हैं कि अशुद्ध पेयजल कई बीमारी के जड़ है पर इ जानते हुए भी कोई ऑप्शन नहीं है लोगों के पास! आपलोग 'चुआंड़ी ' के पानी पर आपन राय से अवगत कराएं , क्या यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक नहीं!
©Sharmila Shumee
27 Feb 2019, 05:35

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