#हूर-मधेया एक ऐसा गांव जो पलामू प्रमंडल के गढ़वा जिले के अंतर्गत गोवावल क्षेत्र में आता है। #दानरो नदी के किनारे बसा ये गांव गढ़वा जिले से लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर बसा एक ऐसा गांव जहाँ सभी जाति धर्म मिल-जुलकर प्यार, मोहब्बत से रहते हैं। कहा जाय की हूर-मधेया गांव पलामू प्रमंडल का सबसे बड़े गांवो में से एक है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नही होगी। लगभग 11 #टोलो का यह गांव यही इसकी विशालता का परिचय देता है। हूर और मधेया दो अलग-अलग गांव है, #मधेया पंचायत के अंतर्गत ही #हूर गांव आता है, अर्थात हूर और मधेया एक-दूसरे के प्रतिरूप हैं। इसलिए हूर मधेया कहा जाता है।
हमारे पलामू के हरेक गांव के पीछे एक कहानी होती है वैसे ही हमारे गांव की भी कहानी है। कई साल पहले हूर मधेया गांव परसबन से घिरा हुआ था। यहाँ एक जाति निवास करती थी जिसका नाम #मार-मारिन। हूर गांव में स्थित बड़े पोखरे की खुदाई इन्ही #मार-मारिन के द्वारा किया गया था।लेकिन कहा जाता है की टीबी की बीमारी फ़ैल जाने के कारण धीरे-धीरे ये लोग यहाँ से चले गए।
उसके बाद फिर यहाँ दूसरे जगह से लोग आकर बस गए। उनमें से मुख्यतः एक हैं चौबे और दूसरे तिवारी। हमारे पूर्वज बताते हैं की चौबे लोग उत्तरप्रदेश के #कन्नौज से आये थे #रंका_राजा के यहाँ पूजा कराते थे। #तिवारी लोग #उत्तरप्रदेश से आये थे। चौबे और तिवारी परिवार में मामा-भगिना का रिश्ता है। जब तिवारी लोगो के घर शादी होती है तो #मड़वा मे माटी कोड़वाने के लिए चौबे के घर से एक महिला जाती है और माटी कोड़ती है। कहा गया है की भगिनी(चौबे की घर की कोई महिला) के हाथों से कोड़ा जाय तो शुभ होता है। इसी परम्परा का निर्वाह हमलोग कई सालो से करते आ रहे हैं। आबादी में चौबे अधिक और तिवारी कम हैं। कहा जाता है की हमलोग के पूर्वज ने ही और सभी जातियो को अपना जमीन देकर बसाया। अब तक दो बार महायज्ञ का आयोजन किया जा चूका है। पहली बार हमलोगो के जन्म से पहले 1990 में आदरणीय गुरु महाराजः #देवनराणाचार्य के नेतृत्व में सम्पूर्ण ग्रामवासी के सहयोग से भव्य यज्ञ सह भण्डारा का आयोजन आयोजन बगीचा स्थित शिव मंदिर ,हनुमान जी, प्रांगण में किया गया। लगभग 22 सालो के बाद सन् 2012 में महायज्ञ हुआ। हमारे गाँव में एक बगीचा नामक पवित्र स्थल है जहाँ शिव मंदिर ,हनुमान मंदिर, दुर्गा मंडप है। बगीचा में प्रत्येक वर्ष भव्य 10 दिनों के लिए दुर्गापूजा का आयोजन होता है, जिसमें कथावाचक महराज को बुलाया जाता हैं।
एक और महत्वपूर्ण तीर्थस्थल #अड़ंगा_बाबा है। इन्हें भूखों का बाबा भी कहा गया है। इसके पीछे ये कहानी है कि कोई भी गरीब भूखा नही सोता था, अगर किसी के पास खाना न हो तो वो बाबा के पास आकर हाथ जोड़ते ही अड़ंगा बाबा के आशीर्वाद से थाली, लोटा, पूरी-सब्जी तैयार हो जाता था। खाने के बाद थाली को धोकर रख देने के बाद एकाएक थाली गायब हो जाता था। लेकिन लोग इसका दुरूपयोग करने लगे थाली और लोटा अड़ंगा बाबा के पास नही रखने लगे। अब ये कहानी तो वो थी जो हमने सुनी थी लेकिन उससे भी अच्छी बात ये है कि यहाँ के मन्नत पुरे होने पर कोई चढ़ावा या प्रसाद नहीं चढ़ाता बल्कि जितने गरीब लोगों को खाना खिलाने को #गछा(वादा किया ) जाता है उतने गरीब लोगों को भोजन करवाता है। अब उपर की कहानी और प्रचलन की बात की जाये तो ऐसा लगता है कि लगभग दिन किसी न किसी का मन्नत पूरा होता होगा और कोई भूखा वहाँ जाये तो उसे खाना मिल जाता होगा।
हमारे दादाजी कहा करते थे की गांव में दानरो नदी स्थित भव्य #पहलवानी अखाडा का आयोजन किया जाता था जिसमे आस-पास के गांव के सभी लोग शमिल होते थे और अपनी पहलवानी का जौहर दिखाते थे।
मुसलमानो का महत्वपूर्ण पर्व मुहर्रम भी हमारे गांव में भव्य तरीके से मनाई जाती है। मुहर्रम से दो दिन पहले #सतई का मेला पुरे झारखण्ड में प्रसिद्ध है। इस दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। सतई के दो दिन बाद मुहर्रम में भव्य #ताजिया मुसलमान भाइयो द्वारा पुरे गांव में निकाला जाता है, जिसमे गांव के सभी हिन्दू धर्म के लोग पेड़ा, शरबत लेकर तैयार रहते हैं,और आपसी भाईचारे का परिचय देते हैं।
#मार_मारिन से एक प्रश्न दिमाग मे आता है कि क्या ये ही एक आदिम जनजाति थी जो गढ़वा के आसपास के गांव मे रहती थी या वहाँ भी हमारे आदिवासी #चेरो समुदाय के लोग रहा करते थे। या फिर ये #मार_मारिन #चेरो ही थे। अगर कुछ जानकारी हो तो जरूर लोगों तक पहुचाये।
©Ankit Kumar Chaubey
हमारे पलामू के हरेक गांव के पीछे एक कहानी होती है वैसे ही हमारे गांव की भी कहानी है। कई साल पहले हूर मधेया गांव परसबन से घिरा हुआ था। यहाँ एक जाति निवास करती थी जिसका नाम #मार-मारिन। हूर गांव में स्थित बड़े पोखरे की खुदाई इन्ही #मार-मारिन के द्वारा किया गया था।लेकिन कहा जाता है की टीबी की बीमारी फ़ैल जाने के कारण धीरे-धीरे ये लोग यहाँ से चले गए।
उसके बाद फिर यहाँ दूसरे जगह से लोग आकर बस गए। उनमें से मुख्यतः एक हैं चौबे और दूसरे तिवारी। हमारे पूर्वज बताते हैं की चौबे लोग उत्तरप्रदेश के #कन्नौज से आये थे #रंका_राजा के यहाँ पूजा कराते थे। #तिवारी लोग #उत्तरप्रदेश से आये थे। चौबे और तिवारी परिवार में मामा-भगिना का रिश्ता है। जब तिवारी लोगो के घर शादी होती है तो #मड़वा मे माटी कोड़वाने के लिए चौबे के घर से एक महिला जाती है और माटी कोड़ती है। कहा गया है की भगिनी(चौबे की घर की कोई महिला) के हाथों से कोड़ा जाय तो शुभ होता है। इसी परम्परा का निर्वाह हमलोग कई सालो से करते आ रहे हैं। आबादी में चौबे अधिक और तिवारी कम हैं। कहा जाता है की हमलोग के पूर्वज ने ही और सभी जातियो को अपना जमीन देकर बसाया। अब तक दो बार महायज्ञ का आयोजन किया जा चूका है। पहली बार हमलोगो के जन्म से पहले 1990 में आदरणीय गुरु महाराजः #देवनराणाचार्य के नेतृत्व में सम्पूर्ण ग्रामवासी के सहयोग से भव्य यज्ञ सह भण्डारा का आयोजन आयोजन बगीचा स्थित शिव मंदिर ,हनुमान जी, प्रांगण में किया गया। लगभग 22 सालो के बाद सन् 2012 में महायज्ञ हुआ। हमारे गाँव में एक बगीचा नामक पवित्र स्थल है जहाँ शिव मंदिर ,हनुमान मंदिर, दुर्गा मंडप है। बगीचा में प्रत्येक वर्ष भव्य 10 दिनों के लिए दुर्गापूजा का आयोजन होता है, जिसमें कथावाचक महराज को बुलाया जाता हैं।
एक और महत्वपूर्ण तीर्थस्थल #अड़ंगा_बाबा है। इन्हें भूखों का बाबा भी कहा गया है। इसके पीछे ये कहानी है कि कोई भी गरीब भूखा नही सोता था, अगर किसी के पास खाना न हो तो वो बाबा के पास आकर हाथ जोड़ते ही अड़ंगा बाबा के आशीर्वाद से थाली, लोटा, पूरी-सब्जी तैयार हो जाता था। खाने के बाद थाली को धोकर रख देने के बाद एकाएक थाली गायब हो जाता था। लेकिन लोग इसका दुरूपयोग करने लगे थाली और लोटा अड़ंगा बाबा के पास नही रखने लगे। अब ये कहानी तो वो थी जो हमने सुनी थी लेकिन उससे भी अच्छी बात ये है कि यहाँ के मन्नत पुरे होने पर कोई चढ़ावा या प्रसाद नहीं चढ़ाता बल्कि जितने गरीब लोगों को खाना खिलाने को #गछा(वादा किया ) जाता है उतने गरीब लोगों को भोजन करवाता है। अब उपर की कहानी और प्रचलन की बात की जाये तो ऐसा लगता है कि लगभग दिन किसी न किसी का मन्नत पूरा होता होगा और कोई भूखा वहाँ जाये तो उसे खाना मिल जाता होगा।
हमारे दादाजी कहा करते थे की गांव में दानरो नदी स्थित भव्य #पहलवानी अखाडा का आयोजन किया जाता था जिसमे आस-पास के गांव के सभी लोग शमिल होते थे और अपनी पहलवानी का जौहर दिखाते थे।
मुसलमानो का महत्वपूर्ण पर्व मुहर्रम भी हमारे गांव में भव्य तरीके से मनाई जाती है। मुहर्रम से दो दिन पहले #सतई का मेला पुरे झारखण्ड में प्रसिद्ध है। इस दिन भव्य मेले का आयोजन किया जाता है। सतई के दो दिन बाद मुहर्रम में भव्य #ताजिया मुसलमान भाइयो द्वारा पुरे गांव में निकाला जाता है, जिसमे गांव के सभी हिन्दू धर्म के लोग पेड़ा, शरबत लेकर तैयार रहते हैं,और आपसी भाईचारे का परिचय देते हैं।
#मार_मारिन से एक प्रश्न दिमाग मे आता है कि क्या ये ही एक आदिम जनजाति थी जो गढ़वा के आसपास के गांव मे रहती थी या वहाँ भी हमारे आदिवासी #चेरो समुदाय के लोग रहा करते थे। या फिर ये #मार_मारिन #चेरो ही थे। अगर कुछ जानकारी हो तो जरूर लोगों तक पहुचाये।
©Ankit Kumar Chaubey
8 Oct 2018, 08:43

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