बचपन में कई त्योहारों का बेसब्री से इंतजार होता था।उसमें एक #जीवत्पुतिका व्रत जिसे ठेठ भाषा में '#जितिया' भी कहते हैं। वजह बस इतनी सी कि एक से एक पकवान खाने को मिलेंगे और ये खुलासा भी होगा मां कहीं हमसे ज्यादा भईया को तो प्यार नहीं करती।
इसका अनुष्ठान एक दिन पहले 'नहाय खाय ' से शुरू होता। बहुत मशक्कत के बाद बाबूजी नोनी का साग, मड़ुवा का आटा और बराई के दाल का जुगाड़ कर पाते। सबसे दुर्लभ और जरूरी होता खींचा (मुलायम और छोटा) 'झींगी' मिलना, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि शाकाहारी महिलाएं नहाय खाय के दिन झींगी निगलेंगी और इसकी सब्जी खाएंगी। मांसाहारी महिलाओ के लिए छोटी से छोटी मछली (शायद झींगा) निगलने की बातें बचपन से हम सुनते आए हैं। नहाय खाय के दिन शुद्ध घी में मड़ुवा के आटे का हलवा, पूरी, नोनी का साग, सेवई और ठेकुआ बनता, जिसे दीवार से सटकर खड़ा कर दिया जाता। जिसे "#ओठंगना" का नाम दिया जाता। जितने बेटे उतने 'ओठंगना' , पर बचपन से ही अपने अधिकारों के प्रति सचेत हम तीनों बहनें यही देखने में रहतीं कि कहीं मां ने सिर्फ भईया के लिए ही तो 'ओठंगना ' नहीं रखा? हमारी यह मंशा मां पहले ही भांप जातीं और चार 'ओठंगना' हर साल ओठंगांती।
फिर बारी आती जितिया के चौबीस घंटे का निर्जला उपवास की। भूखे-प्यासे रहकर भी हम सब की मांए हमारे भोजन का प्रबंध करती हैं। खुद तो मुंह में एक 'खर ' तक नहीं लगातीं। तभी तो इसे 'खर जितीया' कहते हैं। और कहावत ये भी हैं कि संयोग से कोई अगर मौत के मुँह से निकल आए तो लोग कहते हैं कि - 'जरूर एकर माई खर जितीया कइले होखी तबे इ बच गइल' । #जितीया के प्रति इतनी श्रद्धा और विश्वास। दतवन तक नहीं करने की परंपरा है इस पर्व में। शाम का इंतजार होता सबको, पूजा की तैयारी होती, सूती लाल नई साड़ी में अक्सर मां सजी होतीं। मुहल्ले की औरतों का मानना था कि 'सोने का जितीया सिर्फ बेटे के लिए पहना जाता है, बेटी के लिए चांदी का जितीया होता है'! हम बेहद खुशनसीब हैं कि ईश्वर ने हमें ऐसे माता पिता दिए जिन्होंने कभी बेटे और बेटी में फर्क समझा ही नहीं। किसी की सलाह पर अमल न करते हुए हमारी माताजी ने चार सोने का जितीया हम चारों भाई बहनों के लिए बनवा रखा था। पूजा में भी हम सब एकसाथ बिना किसी भेदभाव के शामिल होते। चंद्रमा को अर्घ्य देने और जीवत्पुतिका व्रत की कथा के साथ रात भर का उपवास होता।
फिर होता बेसब्री से सुबह होने का इंतजार। अहले सुबह मां की नींद खुल जाती। शाम को पांच तरह की सब्जी, पांच तरह के दाल और धनिया पत्ती की भरपूर व्यवस्था कर ली जाती। सुबह सवेरे चुल्हा लीपकर आग जला दिया जाता और बारी-बारी से पांच तरह की सब्जी और पांच मिक्स दाल बनाकर जीरा और लहसुन के साथ भर कलछुल शुद्ध घी की छौंक लग जाती। सोए हुए में यह सोंधी खुश्बू नाक तक पहुंचती तो हड़बड़ा कर उठ जाते हमसब। #पारण की शुभ घड़ी सामने जो होती।गरमा-गरम #सोनाचूर के चावल का मांड़ पसाया जाता, उधर धनिया पत्ती की चटनी भी सिलउट पर पीसकर तैयार होती। तबतक ऐलान होता कि #पतई में कर के पहले चील कउआ को खाना दिया जाएगा तब कोई भोजन में हांथ लगाएगा। सच पूछिए तो उसदिन 'चील-कउआ' की किस्मत पर जलन होती थी।यह परंपरा निभाने के बाद भी थोड़ा और इंतजार करना पड़ता कि पहले मां(व्रती) खाएंगी तब बच्चे खाएंगे।तबतक तो सब्र का बांध जाने कईबार टूट जाता! कई दफा तो ऊंगलियां चुपके से चटनी में चली जातीं और परंपरा टूट सी जाती। पर ये सब बच बचाकर करना पड़ता। काफी खतरा भी था। पारण का भोजन जब मिलता तो उसका स्वाद आज के खूब सजे-धजे पांच सितारा होटलों से कई गुणा अधिक होता। अब न तो उस भोजन की खुश्बू मयस्सर है न शुद्ध घी और न पहले जैसी बिना खाद और मिलावट की ताजी सब्जियां। फिर भी जितीया तो हम मनाते ही हैं उसी श्रद्धा और विश्वास के साथ।
©️ Sharmila Shumee
2 Oct 2018, 06:00

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