Sunday, February 21, 2021

कजरौटा




उस मुल्क की सरहद को कोई छू नहीं सकता,
जिस मुल्क के सरहद की निगेहबान हैं आँखें .....

ये तो गाने की पंक्तियांँ हैं। जिसमें सरहद की रक्षा के लिए जवानों के सतर्क निगाहों की बात है। अच्छी निगाह के लिए स्वस्थ आँखें भी चाहिए, इसलिए बचपन में हम सभी की माताएँ हमारी स्वस्थ आँखों के लिए आँखों में और हमें बुरी नजर से बचाने के लिए हमारे माथे पर 'काला टीका' लगाकर बेफिक्र हो जाया करती थीं कि उनके बच्चों को बुरी नजर नहीं लगे। उस जमाने में माताएँ और घर के बड़े बुजुर्गों को इस काले टीके पर इतना भरोसा रहता था कि आज के समय में रोग प्रतिरोधी टीकों पर भी लोग इतना भरोसा नहीं कर पाते। सिर्फ छोटे बच्चे के माथे पर ही नहीं बल्कि #कजरौटे में बनी काजल का पुरुष और महिलाओं की आँखों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए भी प्रयोग किया जाता था।

इस नजर के टीके को यानी काले टीके को बनाया जाता एक विशेष प्रकार की चीज में........ जिसे हम ठेठ बोली में #कजरौटा कहा करते थे। इस #कजरौटे को साफ मुलायम कपड़े में बड़े ही जतन से रखा जाता था। इसमें काजल बनाने के लिए तरह-तरह की सामग्री इस्तेमाल की जाती थी। कभी अजवाइन, लौंग तो कभी कच्ची लहसुन की कलियांँ। इन चीजों को मरकीन या किसी भी साफ सूती कपड़े में लपेटकर दीए की तरह बनाया जाता था और उसे जलाने के लिए शुद्ध सरसों तेल या गाय के शुद्ध घी का इस्तेमाल किया जाता था। तब तैयार होता था काजल...जिसे #कजरौटा में सुरक्षित कर लिया जाता था। सिर्फ बुरी नजर से बचाने के लिए ही नहीं बल्कि इस काजल को सुबह-सुबह हमारी आँखों में भी #चपोड़ दिया जाता था ताकि हमारी आँखें सुरक्षित रहे। उन्हें देखकर ऐसा लगता था कि मानो ये माताएंँ बड़े से बड़े नेत्र रोग विशेषज्ञ की भी छुट्टी कर देंगी। आँखों की किसी भी समस्या के लिए इनका भरोसा इस होममेड '#काजल' या '#सुरमें' पर था।

दरअसल #काजल_उतारना या हमारी भाषा में जिसे #काजल_पारना' भी कहते हैं एक जिम्मेदारी का काम था, जो हर किसी के बस की बात नहीं थी। बचपन में मैं इस काम में पारंगत थी। यह काम काफी धैर्य और समय का था। जिसमें काफी धैर्य के साथ बिना हाथ हिलाए-डुलाए #कजरौटे को उस बाती की लौ पर लगातार नजर रखना होता था ताकि कजरौटे में काजल जम जाए। मुझमें मेरी मांँ ने गजब का धैर्य देखा और गृह कार्यों में रूचि भी.....इसलिए कई बार यह जिम्मेदारी मुझे ही दी जाती थी। लेकिन मुश्किल तब होती थी जब कभी यात्रा पर जाना होता था। उस समय पूरे कजरौटे को लेकर जाना रिस्की था क्योंकि कपड़ों पर कालिख लगने का डर होता। इसके लिए बहुत सारे लोग '#चुनौटी' का इस्तेमाल करते थे।

पहले के समय में छोटे बच्चे के जन्म के अवसर पर पीतल या लोहे के कजरौटे देने की भी परंपरा थी। आज भी कुछ लोग छठी या सतईसा के अवसर चांँदी के कजरौटे उपहार स्वरूप भेंट करते हैं। अभी भी छठी(जन्म के छठे दिन) के दिन जहाँ बच्चे को पहली बार विधि-विधान से नहाया जाता है, वहीं रात को बच्चे को उसकी फुआ द्वारा काजल करने का नियम है। चूँकि पहली बार काजल उसी रात को लगाए जाने का नियम है, इसलिए इसके बदले उन्हें काजल कराई #नेग (रुपया, कपड़ा, गहना जैसे उपहार)भी मिलता है। शादी में दूल्हा को परीछते समय गीत गा-गा कर किया गया काजल को कैसे भूला जा सकता है। जहाँ एक तरफ लड़की ब्यूटीपार्लर से #ब्राइडल_पैक का स्पेशल श्रृंगार कर के आती हैं, वहीं लड़का अपनी माँ-चाची के हाथों से किया गया लंबा-लंबा काजल लगाए हुए। काजल की धार इतनी गहरी होती है कि दूल्हा तो क्या #सहबाला तक को भी किसी की नज़र न लगे।

वैसे आप सभी को मालूम ही होगा कि 'काजल से भरी आँखें' और 'आँखों में खींची काजल की धार' पर कई फिल्मों के गाने भी बने थें और कई अभिनेत्रियों पर भी इसे सुन्दर तरीके से फिल्माया गया था, लेकिन अब यह सब देखने के लिए नई पीढ़ी को पुरानी फिल्में देखनी होंगी। वैसे आज भी नयी पीढ़ी के लोग 'कजरारे-कजरारे तेरे कारे-कारे नैना ' और 'तेरी आँखों का ये काजल' जैसे लोकप्रिय गीतों को उतनी ही मस्ती से आज भी गुनगुनाया करते हैं। मतलब कहा जा सकता है कि आज भी #काजल की महिमा अपरंपार है।

फिर भी इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता है कि लंबे समय से बुरी नजर से बचाने के लिए ये 'काजल का टीका' एकमात्र '#रामबाण' औषधि थी, लेकिन अब न तो उतनी सतर्क माताएँ हैं और न काजल पर लोगों का भरोसा।आज कई नेत्र रोग विशेषज्ञ तो इसे कालिख की संज्ञा भी देते हैं और कई लोग इसे इस्तेमाल नहीं करने की सख्त हिदायत भी देते हैं। जबकि दूसरी तरफ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के द्वारा नए नए ब्रांड के काजल के विज्ञापन भी दिखलाई पड़ती है। फिर भी आज कई लोग अपने छोटे बच्चों के माथे पर और आँखों को खूबसूरत बनाने के लिए काजल का बे रोकटोक प्रयोग करते ही हैं।

मैं तो यही कह सकती हूँ कि ईश्वर की मेहरबानी से हम और हमारी आँखें लगातार काजल के इस्तेमाल के बाद भी अभी तक सही सलामत हैं और अब तक चश्मा भी नहीं लगा है तो निश्चित रुप से इसमें काजल का बहुत बड़ा योगदान है। इसीलिए आज हम यह कह सकते हैं कि धन्य थीं हमारी माताएंँ और धन्य है हमारा '#कजरौटा'।

©Sharmila Shumee

लेखिका आकशवाणी के डाल्टनगंज केंद्र में उद्घोषिका के रूप में कार्यरत हैं।
31 Oct 2018, 00:20

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