हमारी गौरवशाली लोक संस्कृति में ढ़ेर सारे ऐसे पर्व/त्यौहार हैं जिस पर अभी तक पश्चिमी सभ्यता और बाजार का असर नहीं पड़ा है। उसी में एक है - खर जिउतिया जिसे जीवित्पुत्रिका के नाम से भी जाना जाता है। यह कठोर व्रत अपनी संता न के सुखद,मंगलमय और दीर्घ जीवन के लिए किया जाता है।
आज भी जब कोई घोर दुर्घटना होने के बावजूद कुशल-मंगल लौटकर वापस अपने घर आता है तो गांव-घर-परिवार के लोग बोलते हैं कि - बाबू! इ तोहार माई के खर जिउतिया के फल बा।
अगर हम अपने यहाँ के संस्कृति और पर्व की बात करें तो लगभग सभी पर्व तीन भाग में मनाये जाते हैं। नहाय-खाय, उपवास और पारण। अब चाहे छठ , तीज, जितिया, करमाइत्यादि कोई भी पर्व हो उसमे ये तीन विधान होते ही हैं।
मुझे तीज और जिउतिया दोनों बहुत कठिन व्रत लगते हैं।24 घंटे से अधिक समय तक निर्जला उपवास...यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन इस परम्परागत पर्व को सिर्फ पलामू के गांव/कस्बों में ही नहीं बल्कि उतने ही आस्था,समर्पण और विश्वास के साथ अब देश-विदेश के महानगरों में पढ़ी-लिखी/अच्छी बड़ी नौकरी करने वाली आधुनिक महिलाओं के द्वारा भी उतने ही समर्पण के साथ मनाया जाता है।
वास्तव में "खर जिउतिया" का पर्व अपने संतान के प्रति असीम प्रेम और त्याग का प्रतीक है जिसमें उनकी निष्ठा और विश्वास के आगे सभी तर्क नतमस्तक हो जाते हैं।
आज ही से शहर में खीरा और नेनुआ की पत्ती और दातुन( दतवन) की खोज होनी शुरु हो गयी है क्योंकि कल बाजार में इसका मूल्य दसगुना बढ़ जाएगा। नहाय खाय के दिन इन चीजों के अलावा झिंगी( कोमल खींचा झिंगी जिसे सत्पुतिया भी कहते हैं ), बराई का दाल, अरवा चावल का बहुत मान्य होता है। पौराणिक कथा का अनुसरण करते हुए प्रतीकात्मक चील्हो-सियारों के लिए कल स्वादिष्ट भोजन इसी में परोसा जाएगा। ये बात अलग है कि अब चील और सियार तो मिलते नहीं लेकिन चिड़िया-कौओं की मौज रहती है कि वह बिना डरे, बेफिक्र स्वादिष्ट भोजन को ग्रहण करेंगे।
फिर उसके अगले दिन पारण होगा।उस दिन दही-गुड़ परोसा जाएगा। बेजुबान पक्षी भी आशीर्वाद देंगे कि त्याग की मूर्ति माँ, खुद भूखी-प्यासी रहकर जो हमें भोजन समर्पित कर रही है उनकी औलाद पर कोई मुसीबत नहीं आए और वह हमेशा खुश रहें।
ठेठ पलामू परिवार की तरफ से खर जिउतिया व्रत करने वाली सभी माताओं को सादर प्रणाम और शुभकामनाएं।
©️Ajay Shukla
1 Oct 2018, 08:38

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