जिसको देखते ही मन ललच जाए, जिसकी खुशबू से मुँह में पानी आ जाए उसे ही पलामू में समोसा कहते हैं.
इस ठंड के मौसम में जायकेदार खट्-मीठी चटनी के साथ-साथ यारों दोस्तों की महफ़िल में गरमागरम खाए जाने वाले अद्भुत खाद्य पदार्थ को पलामू में '#सिंघाड़ा' तो देश के अन्य हिस्सों में '#समोसा' के नाम से जाना जाता है.
वैसे यह सिर्फ ठंड के मौसम में ही नहीं बल्कि किसी भी मौसम में, सभी का पसंदीदा व्यंजन है. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसकी खुशबू, इसके स्वाद और पेट भरने की तृप्ति वाले इसके अहसास के दीवाने रहते हैं. इसकी पहुँच शहरों के बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में ही नहीं है, बल्कि आपके गाँव-देहात के चौराहों के टपरीनुमा छोटे-छोटे होटलों की शोभा भी इसी से बढ़ती है.
डाल्टनगंज में भी सिंघाड़ा की ढ़ेर सारी दुकानें हैं. हर गली, चौराहे और मोहल्ले की सिंघाड़ों की अपनी अलग-अलग खासियत है. छः मुहान के पास कचहरी रोड में '#सिंघाड़ा_महाराज' की दुकान हो या #साहित्य_समाज चौक के पास बस स्टैंड की तरफ जाने वाली सड़क पर स्थित दुकान, या फिर सदर पुलिस थाना के सामने बाजार की एक छोटी गली का हॉटल हो, या हनुमान मंदिर के आस-पास के छोटे ठेले और टपरीनुमा हॉटल.. सभी जगह के सिंघाड़ों की अपनी अलग-अलग खासियत है।
सिंघाड़े को विशेष रूप से पसंद करने वाली प्रजाति के लोग सिंधाड़ा के साथ-साथ उसकी चटनी को भी विशेष महत्व देते है. कहीं टमाटर और मिर्ची वाली #तीखी चटनी, कहीं #मीठी चटनी, कहीं मटर के #छोले के साथ, कहीं बेसन की #चटपटी चटनी, तो कहीं दही की #खट्टी-मीठी वाली चटनी. महंगाई और आकार-प्रकार के अलावा गाँव और शहर के सिंघाड़ा दुकान में एक और खास फर्क है- गाँव के दुकान में तीखी-खट्टी चटनी मिलती है, वहीँ शहर वाले में मीठी. भाई मुझे तो खट्टी-तीखी वाली चटनी ही ज्यादा प्रिय है, टमाटर-पुदीना- इमली-मिर्च वाली. और अगर साथ में कटा हुआ प्याज मिल जाए तो छप्पन व्यंजन एक तरफ और सिंघाड़ा एक तरफ.
देश-दुनियां के इतिहास को झांकने के बाद पता चलता है कि यह लोकप्रिय व्यंजन #ईरान देश से लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में भारत में आया था. फिर सोलहवीं शताब्दी के लगभग #पुर्तगालियों की मेहरबानी से यहाँ पर आलू आया. फिर सिंघाड़ा में जो #आलू का रिश्ता बना, वह आज तक कायम है. गाना सुने हैं कि नहीं- जब तक रहेगा समोसे में आलू ...
संचार माध्यमों के कारण जब संस्कृतियों का मिश्रण होने लगा तो विभिन्न खाद्य पादर्थों के साथ साथ समोसे के साथ भी जी भरकर प्रयोग हुए. कहीं आलू के साथ पनीर, कीमा, गोभी या अन्य कई सामग्रियां भरी गयी तो कहीं कहीं मीठे समोसे मिष्ठान भंडारों कि शोभा बढ़ाते हुए पाए जाते हैं. हालाँकि इसी आकर-प्रकार में लॉन्गलता और गुझिया भी कई बार दृष्टिभ्रम का कारण बनता है, और भ्रम टूटता है चखने के बाद ही.
खैर, इस विषय पर तो मैं #शोध_पत्र ही लिख दूँ, मगर पता चला है कि ठेठ पलामू के पाठक पोस्ट पढने से पहले उसकी लम्बाई देखते हैं. यह संक्षिप्त पोस्ट आप तक पहुँचाने में अपना एक और स्वार्थ है कि इसी बहाने आपके आस-पास के दुर्लभ समोसे-चटनी का स्वादिष्ट वर्णन हम तक शब्द रूप में पहुँच जायेगा. अगर हो सके तो अपने गाँव-चौक-बाजार के होटलों कि तस्वीर भी कमेंट नोक्स में साझा करें. लोकल को वोकल करें ताकि हमारे जैसे सिंघाड़ों के शौकीनों को, जब भी मौका मिलें तो हम भी आपकी पसंद और आपके स्वाद को अपना बना सकें और साथ ही उन छोटी दुकानों (जो महंगे विज्ञापन देने में असमर्थ हैं) को भी भी #ठेठ_पलामू के माध्यम से हजारों पाठकों तक पहुँचा सकें.
अरे महाराज, ढेर बात ना बनाइये, लाइए दो पीस और, इधर हमारे दोना में भी...
@ अजय शुक्ल
इस ठंड के मौसम में जायकेदार खट्-मीठी चटनी के साथ-साथ यारों दोस्तों की महफ़िल में गरमागरम खाए जाने वाले अद्भुत खाद्य पदार्थ को पलामू में '#सिंघाड़ा' तो देश के अन्य हिस्सों में '#समोसा' के नाम से जाना जाता है.
वैसे यह सिर्फ ठंड के मौसम में ही नहीं बल्कि किसी भी मौसम में, सभी का पसंदीदा व्यंजन है. बच्चे, युवा और बुजुर्ग सभी इसकी खुशबू, इसके स्वाद और पेट भरने की तृप्ति वाले इसके अहसास के दीवाने रहते हैं. इसकी पहुँच शहरों के बड़े-बड़े रेस्टोरेंट में ही नहीं है, बल्कि आपके गाँव-देहात के चौराहों के टपरीनुमा छोटे-छोटे होटलों की शोभा भी इसी से बढ़ती है.
डाल्टनगंज में भी सिंघाड़ा की ढ़ेर सारी दुकानें हैं. हर गली, चौराहे और मोहल्ले की सिंघाड़ों की अपनी अलग-अलग खासियत है. छः मुहान के पास कचहरी रोड में '#सिंघाड़ा_महाराज' की दुकान हो या #साहित्य_समाज चौक के पास बस स्टैंड की तरफ जाने वाली सड़क पर स्थित दुकान, या फिर सदर पुलिस थाना के सामने बाजार की एक छोटी गली का हॉटल हो, या हनुमान मंदिर के आस-पास के छोटे ठेले और टपरीनुमा हॉटल.. सभी जगह के सिंघाड़ों की अपनी अलग-अलग खासियत है।
सिंघाड़े को विशेष रूप से पसंद करने वाली प्रजाति के लोग सिंधाड़ा के साथ-साथ उसकी चटनी को भी विशेष महत्व देते है. कहीं टमाटर और मिर्ची वाली #तीखी चटनी, कहीं #मीठी चटनी, कहीं मटर के #छोले के साथ, कहीं बेसन की #चटपटी चटनी, तो कहीं दही की #खट्टी-मीठी वाली चटनी. महंगाई और आकार-प्रकार के अलावा गाँव और शहर के सिंघाड़ा दुकान में एक और खास फर्क है- गाँव के दुकान में तीखी-खट्टी चटनी मिलती है, वहीँ शहर वाले में मीठी. भाई मुझे तो खट्टी-तीखी वाली चटनी ही ज्यादा प्रिय है, टमाटर-पुदीना- इमली-मिर्च वाली. और अगर साथ में कटा हुआ प्याज मिल जाए तो छप्पन व्यंजन एक तरफ और सिंघाड़ा एक तरफ.
देश-दुनियां के इतिहास को झांकने के बाद पता चलता है कि यह लोकप्रिय व्यंजन #ईरान देश से लगभग ग्यारहवीं शताब्दी में भारत में आया था. फिर सोलहवीं शताब्दी के लगभग #पुर्तगालियों की मेहरबानी से यहाँ पर आलू आया. फिर सिंघाड़ा में जो #आलू का रिश्ता बना, वह आज तक कायम है. गाना सुने हैं कि नहीं- जब तक रहेगा समोसे में आलू ...
संचार माध्यमों के कारण जब संस्कृतियों का मिश्रण होने लगा तो विभिन्न खाद्य पादर्थों के साथ साथ समोसे के साथ भी जी भरकर प्रयोग हुए. कहीं आलू के साथ पनीर, कीमा, गोभी या अन्य कई सामग्रियां भरी गयी तो कहीं कहीं मीठे समोसे मिष्ठान भंडारों कि शोभा बढ़ाते हुए पाए जाते हैं. हालाँकि इसी आकर-प्रकार में लॉन्गलता और गुझिया भी कई बार दृष्टिभ्रम का कारण बनता है, और भ्रम टूटता है चखने के बाद ही.
खैर, इस विषय पर तो मैं #शोध_पत्र ही लिख दूँ, मगर पता चला है कि ठेठ पलामू के पाठक पोस्ट पढने से पहले उसकी लम्बाई देखते हैं. यह संक्षिप्त पोस्ट आप तक पहुँचाने में अपना एक और स्वार्थ है कि इसी बहाने आपके आस-पास के दुर्लभ समोसे-चटनी का स्वादिष्ट वर्णन हम तक शब्द रूप में पहुँच जायेगा. अगर हो सके तो अपने गाँव-चौक-बाजार के होटलों कि तस्वीर भी कमेंट नोक्स में साझा करें. लोकल को वोकल करें ताकि हमारे जैसे सिंघाड़ों के शौकीनों को, जब भी मौका मिलें तो हम भी आपकी पसंद और आपके स्वाद को अपना बना सकें और साथ ही उन छोटी दुकानों (जो महंगे विज्ञापन देने में असमर्थ हैं) को भी भी #ठेठ_पलामू के माध्यम से हजारों पाठकों तक पहुँचा सकें.
अरे महाराज, ढेर बात ना बनाइये, लाइए दो पीस और, इधर हमारे दोना में भी...
@ अजय शुक्ल
22 Jan 2021, 22:45

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