Sunday, February 21, 2021

भुजा, झाल मुढ़ी



आजकल एकदम माहौल जो है न उ बस खाने-पीने वाला ही हो गया है। रोज-रोज नया नया आईटम के दर्शन भी हो रहा है और मन ललचा भी रहा है। हम भी सोचे अब का खिलाया जाए सबके, काहे कि रोज-रोज बस छानल-गारल ही चल रहा है। अब ऐसे में अगर सबके पेट ख़राब हो जाए, तो इसमें कोई संदेह नहीं है। तो चलिए अब आज कुछ सादा-सुदा पेट के लिए फायदेमंद आईटम से हम भी परिचय करवा देते हैं। परिचय का करवाना है? घरे घर चलिए रहा होगा साँझ के साँझ बस हमको नहीं नसीब हो रहा है।इसीलिए बस हम याद दिला रहे हैं।


वैसे तो तिल संक्रात , दही चूड़ा खत्म हो गया लेकिन अगर सही मायने में कहा जाए तो भुंजल चूड़ा के सीज़न तो भर जाड़ा रहता है। जाड़ा के दिन और बाजार में नयका चूड़ा मिलना स्टार्ट हो जाता है। अब साँझ के साँझ जब भी भूख लगे, लेकिन भात-रोटी छोड़ के कुछु और खाने के मन करे तो अब रोज-रोज सिंघाड़ा-प्याजी नहिये न खाइएगा। अईसन में भुंजल #चूड़ा_बेदाम से बढ़िया प्रबंध कुछ हो सकता है बताइये तो। अगर गरमा-गरम भुंजल चूड़ा आऊ बेदाम मिल जाये #हरियर_मिर्चाई साथे तो भले रात के एक रोटी कमे सही लेकिन दु-चार #फांक ज्यादे ही खिया जाएगा। लईका में तो लगभग रोज़े साँझ के इहे नास्ता रहता था। कभी-कभी एकरे में #मंगल_मिक्सचर भी मिला देते थे, तो टेस्ट आऊ बदल जाता था।

घरे एगो भैया हैं घनश्याम, भैया ऐसे तो बहुत कम खाने-पीने का सामान बनाते हैं, लेकिन कभी-कभी ही सही जे भी बनाते हैं एतना मन से बनाते हैं कि मने का कहें, मजा आ जाता है। अभी यही टाईम में बारी में #कोबी(फूलगोभी) लगल रहता , प्याज़ भी लगल रहता , #जईया_मिचाई , धनिया पतई,नयका आलू सब बारिये मे मिल जाता था। बस का था बजार से 10-12 रुपये किलो चूड़ा मिलता था एक किलो आ जाता। ओकर बाद आलू-गोभी के एकदम छोटे-छोटे काट लेते, प्याज़ के पतई भी रहता, बाकि लहसुन मिर्चाई बेदाम ई सब तो हइये था। फिर बढ़िया से सब के भुंजल जाता । जब सब खरे-खर भूंजा के निकलता । हमलोग भी लाईन लगा के खड़ा रहबे करते थे। सबके अखबार के ठोंगा बना-बना के मिलता था। अब एतना मस्त लगबे करता था कि #मिज़ाज से बैठ के खाते थे। सही कहे खाने के बाद दूर-दूर तक ईयाद भी नहीं रहता था कि रातों के कुछ खाना भी है। अब वैसा तेल मसाला वाला आईटम तो था नहीं इसलिए हर्जा भी नहीं करता था।

अभियो पापा चाचा के कहिएगा कि सिंघाड़ा पकौड़ी कि कुछ भुंजल आईटम तो तुरंत भुजंलके पर जोर देंगे। बस हरियर मिर्चाई-निमक माँग सकते हैं। इसी का असर है कि आज डाल्टेनगंज में भी आपको ढेरे भूँजा वाला ठेला मिल जाएगा। चूड़ा के साथे- साथ बेदाम, मकई, बूट सब मिला के भूँज के 10-20 में काम भर दे देते हैं। और तो और साथे- साथे हरियर तित्ता(तीखा) चटनी भी देते हैं। कभी ट्राई करिये हॉस्पिटल रोड, रेड़मा , छौ-मुहान और रोड किनारे कई जगह भूँजा वाला मिल जाएगा। आगर डाइटिंग में हैं, पेट में पचने-उचने का समस्या है , तो शाम के शाम लगने वाला भूख के एक नम्बर उपाय है। अब हमतो यहाँ ई सब आईटम के ईयाद कर के अफसोसे कर सकते हैं। पर आपलोग ट्राई करिये , खाईये पीजिये मस्त रहिये। अब आख़िर इंसान रूप में आदमी जन्म काहे लिया है खाने ही के लिए न । बाकि जे है से तो हइये है।

@आनंद केशव 'देहाती'
4 Feb 2021, 08:14

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