"राजा #मेदनीया घर-घर बाजे मथनिया"
मेदिनीनगर से महज दस किलोमीटर दूर दुबियाखाँड़ में दो दिवसीय आदिवासी महाकुंभ मेला का कल ही समापन हो चुका है।
दुबियाखाँड़ मेला की शुरुआत 1996 में प्रतापी तथा विद्वान राजा #मेदिनीराय की याद में की गई थी। उस समय से हर वर्ष यह मेला 11 फरवरी को आयोजित किया जाता है। मेला की शुरुआत चेरो राजा मेदिनीराय की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ होती है। इसके बाद स्वागत गान तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं।
इस मेला से मेरी भी कुछ यादें जुड़ी हुई हैं। बात 2004 की है, जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ती थी। बहुत सारे कार्यक्रम में हमारे स्कूल से स्वागत गान गाने के लिए हमलोगों को ले जाया जाता था। उस समय दुबियाखाँड़ मेला में स्वागत गान के लिए ही हमारे स्कूल से ग्रुप गया था। तब पहली बार मैंने इस मेले का नाम सुना था । मन में बड़ी उत्सुकता थी, वहाँ जाने की। इसका एक कारण था कि घूमने का मौका मिलेगा और इसी बहाने उस दिन क्लास भी नहीं करनी पड़ेगी।
उत्सुकता की दूसरी वजह थी कि उस समय के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा जी मेला का उद्घाटन करने आने वाले थे, तो उन्हें भी देखने का मौका मिलेगा।
मेले वाले दिन जब स्कूल से हमारी बस निकली तभी से हमारे गाने का कार्यक्रम शुरू हो गया और ऐसा हर बार होता था हम पूरे रास्ते बस में गाते हुए ही जाते थे। मेले में पहुँचने पर मुख्य अतिथि का बहुत देर तक इंतजार करना पड़ा। कार्यक्रम की शुरुआत हमारे स्वागत गीत से हुई और इसके बाद और सांस्कृतिक कार्यक्रम हुए। मेले में और क्या क्या था ये तो ठीक से याद नहीं पर खाने को बहुत कुछ था, जिस पर बच्चे थोड़ा ज्यादा ध्यान भी रखते हैं। खैर उस दिन सबसे ज्यादा खुशी इस बात की हुई थी कि मेले से आते समय घर रास्ते में ही पड़ता है तो जल्दी घर पहुँच गयी थी।
इस मेले की शुरुआत #आदिवासियों के विकास के लिए की गई थी। इस मेले का उद्देश्य आदिवासियों के विकास के लिए कार्य करना था, पर आज 23 वर्षों के बाद भी मेला का स्वरूप नहीं बदला है। राजा मेदिनीराय की याद में लगने वाला यह मेला आदिवासियों और चेरो की पहचान के साथ एक संस्कृति भी है। हमलोगों को इसे सहेजकर रखना होगा तथा राजा मेदिनीराय के सपनों को साकार करना होगा।
©Divya Rani
13 Feb 2019, 12:24
No comments:
Post a Comment