Sunday, February 21, 2021

खुशी के रंग होली के संग




#बसन्त_पंचमी (सरस्वती पूजा) के ख़त्म होइते यानी मूर्ति भसान(विसर्जन) के समय से ही बसन्ती बयार आऊ रंग के खुमार सब लईका जवान सयान बूढ़-ढूढ़ सब पर चढ़ जाला। बसन्त मौसम तो मौसम के राजा होखबे करेला जेकर स्वागत सरस्वती माँ के प्रतीमा विसर्जन के समय उड़े आऊ लागे वाला अबीर गुलाल से करल जाला आऊ एहि समय से होली के भी आगाज हो जाला।

#होली मतलब हुड़दंग, त्योहार कम और त्योहार के श्रृंखला जादे लागत रहे होली काहे कि एहमें एगो सिर्फ रंग खेले वाला ही काम न रहे बल्कि अनेक काम क्रमानुसार होवत रहे। ओइसे तो हमर गांव में शिवजी के मन्दिर में हर मंगलवार आऊ शनिवार के संध्या आरती आउ भजन के परम्परा बा पर जब से फ़ागुन चढ़ जईतक तो उ भजन में आखरी में होली गवाये के शुरुवात हो जात रहे। ठेठ ग्रामीण आऊ गरीब परिवेश के कारण गाँव के ज्यादतर लोग खेतिहर आउ मजदूर हत जे दिनभर के काम के बाद शाम में संध्या भजन में जरूर जुट हलन आउ होली चढ़ते होली के गीत के भरपूर मजा आव हलक।

होली आवत-आवत खेत से ज्यादातर रहर मसूर #खरिहान में पहुंच जात रहे आउ गेहूँ बूट जौ भी तैयारी में रह हलन , पानी पटौउनी के ज्यादा साधन रहे नई तो #टाँड-टाँड़ीहन में ज्यादातर रहर #तीसी बुनात रहे जे कटे के बाद चारो ओर खुला खुला नजर आवत रहे । होली से हफ्ता भर पहिले से ही गाँव के लईकन छोट टीना के डब्बा काट के ओहमें तार बांध के डिब्बा में चारो ओर छेद करके ओहमें #चिड़चिड़ी (केंदू पत्ता) के लकड़ी के बोकला डाल के आग डाल के साँझ होइते खूब होलरी धुनाये के कम्पटीशन करतन जे में ओह में से निकलेवाले चिंगारी से जरे-खोरे के भी डर बनल रहत रहे।अब जइसे जइसे होली नजदीक आवे लगतक तो गाँव मे दू दिन मंगर आउ शनिचर के बजार लगेला जे में से बम-पटाखा (मुर्गा बम) फेमस रहे ओकर पूरा पॉकिट खरीदे के तैयारी रहतक काहे कि एक पॉकिट में पूरा 100 बम रहत रहे जे ओह समय ला बहुत होख हलक, #छुरछुरी(फूलझड़ी) ,#टिकुलिया बम(चिट्चीटिया) अउ ओकर पिस्टल, सुतरी बम, रंग,अबीर(गुलाल) बाजार में चढ़े तो अईसन मन करे कि सब किन(खरीद) लेऊँ पर पईसा रहत ना रहे कि मन के इच्छा पूरा होखे बस दादा एक पॉकिट बम लइतन तो सब भाई-बहिन में 5-7 के हिसाब से बाँट देतन उहे हाल रंग के पॉकिट के भी रहत रहे, पिचकारी तो किनाय के बाते न रहल तब गाँव मे कच्चा बांस काट के देसी पिचकारी आउ परास के फूल के पानी मे भिंगा के लाल रंग बनाव हली आउ ओकरे से रंग खेले के कम्पटीशन होवत रहे।

अब एक एक दिन बीतते-बीतते होलिका दहन के दिन आ गईल ,हमनी के गांव में ओकरा #सम्मत बोल हत ई दिन गांव के पूरा आबादी चार ग्रुप में बंट जा हलक सबसे पहिले बच्चा ग्रुप, फिर नवहा(पढ़े-लिखे वाले लइकन)ग्रुप, फिर चाचा ग्रुप आउ लास्ट बाबा (दादा) ग्रुप, होली में सब ग्रुप के अपन अपन ढंग आउ काम होखत रहे। शाम होइते (सम्मत) होलिका दहन ला पहिले सब कोई अपन-अपन घर से लकड़ी चिपड़ी-गोइठा सम्मत वाला जगह पर जमा करके आव हलन ,लेकिन नवहा लईकन में एगो ई कम्पटीशन रहत रहे कि सम्मत के आग के लपट दूर दुसरो गाँव तक देखाय के चाही आउ ओकरा खातिर हमनी घर-ढाबा(ओसरा) खरिहान में रखल खाटी-माची, कुर्सी-टेबुल,हर-जुवाठ जे भी देखाइत चोरा के सम्मत में लुका देव हली। रात होइते सम्मत के समय सब घी गुड़,धूप,बत्ती ले के सब पहुँचतन आउ एगो सेमर (सेमल) के 10-12 फिट के डाल काटल जईतक जे होलिका के प्रतीक होखत रहन आउ ओकरा बीच मे रख के चारो ओर से लकड़ी गोइठा से ढंकल जा हलक फिर पूजा करके सम्मत में आग लगावल जा हलक आउ सब लोग पूजा हवन के पाँच पाँच लकड़ी हाथ मे ले के ओकर परिक्रमा करतन और हर फेरा में एक लकड़ी आग में डलते जईतन एह तरी पाँच फेरा लगउला के बाद सब सम्मत के घेर के खड़ा रहती आउ सब इहइं अपन-अपन बम पड़ाका खूब फोड़ती जब लपट कम हो जाईत तब बूट के झँगरी आउ गेहूँ के बाली के उहे आग में पकावल जा हलक जेकरा होरहा या अगजा कहल जा हलक मेन प्रसाद होइतक अब सबसे अंत में सम्मत वाला लकड़ी जेकरा हमर गाँव में राजा जी कह हलन फरसा से काटल जईतक आउ सब सम्मत के राख के टिका लगा के होरहा प्रसाद लेके घरे आ जईती साथ ही सम्मत के धुँवा से बुजुर्ग लोग अगले साल के बारिश आउ फसल कइसन होई ओकर अनुमान लगाव हलन की भंडार कोने धुँवा गईल मतलब अगला साल सब बढियाँ रही।

Rakesh Bharti Goswami
16 Mar 2019, 07:08

No comments:

Post a Comment