कहा जाता हैं एक बार एक जंगल में चील और लोमड़ी (सियार) घूम रहे थे, तभी उन्होंने मनुष्य जाति को इस व्रत को विधि पूर्वक करते देखा एवम कथा सुनी। उस समय चील ने इस व्रत को बहुत ही श्रद्धा के साथ ध्यानपूर्वक देखा, वही लोमड़ी का ध्यान इस ओर बहुत कम था। चील ने कथा में बताये नियमानुसार निर्जला उपवास किया जबकि सियार ने मांस खा लिया। चील के संतानों को कभी कोई हानि नहीं पहुँची लेकिन लोमड़ी की संतान जीवित नहीं बच पाये। इसलिए पर्व में चील और सियार का बार-बार ज़िक्र आता है और पहले और तीसरे दिन खाना पहले इन्हें ही खिलाया जाता है। हमारे यहाँ इन्ही चील और सियार को चिल्हो-सियारो कहा जाता है।
यह पर्व महाभारत काल से जुड़ी हुई हैं और इसके सम्बंध में दो कहानियाँ है जो इस प्रकार है।
महा भारत युद्ध के बाद अपने पिता की मृत्यु के बाद अश्व्थामा बहुत ही नाराज था और उसके अन्दर बदले की आग तीव्र थी। जिस कारण उसने पांडवो के शिविर में घुस कर सोते हुए पांच लोगो को पांडव समझकर मार डाला था, लेकिन वे सभी द्रोपदी की पांच संताने थी। उसके इस अपराध के कारण उसे अर्जुन ने बंदी बना लिया और उसकी दिव्य मणि छीन ली, जिसके फलस्वरूप अश्व्थामा ने उत्तरा की अजन्मी संतान को गर्भ में मारने के लिए ब्रह्मास्त्र का उपयोग किया। जिसे निष्फल करना नामुमकिन था। उत्तरा की संतान का जन्म लेना आवश्यक थी, जिस कारण भगवान श्री कृष्ण ने अपने सभी पुण्यों का फल उत्तरा की अजन्मी संतान को देकर उसको गर्भ में ही पुनः जीवित किया। गर्भ में मरकर जीवित होने के कारण उसका नाम #जीवित्पुत्रिका पड़ा और आगे जाकर यही राजा परीक्षित बना। तब ही से इस व्रत को किया जाता हैं।
दूसरी कथा कुछ ऐसी है कि गन्धर्व राजकुमार #जीमूतवाहन को पिता द्वारा राजगद्दी पर बैठाकर वन की ओर चले गए। राजकुमार का मन राजकाज में न लगा तो वो राजपाठ भाईयों के हवाले कर पिता की सेवा में वन चले गए। उसी वन में उनका विवाह #मलयवती नामक कन्या से हुआ। एक दिन वन में घूमते हुए राजकुमार काफी आगे निकल गए जहां उन्होंने बूढी़ औरत का रोना सुनाई दिया उस औरत से पूछने पर उसने बताया कि वह #नागवंश की स्त्री है उसका एक ही पुत्र है #शंखचूड़। नागराज ने गरूड के समक्ष प्रतिज्ञा की है प्रत्येक दिन एक नाग सौंपा जाएगा और आज उसके पुत्र की बारी है। इस बात को सुन #जीमूतवाहन ने उस स्त्री को कहा कि वह चिंतामुक्त रहे उसके पुत्र की जगह वह जाएगा। इतना कह वह लाल कपड़ा #शंखचूड़ से लेकर गरूड की चुनी हुई जगह पर लेट गए। गरूड़ अपने नियत समय पर आकर अपने भोजन को पंजे में दबाकर चोटी पर बैठ गए अपने चुंगल में आए प्राणी की आह व आंसू न देख गरुड़ ने उससे उसका परिचय पूछा तो राजकुमार ने सारी बात बता दी। गरुड राजकुमार की बहादुरी से प्रसन्न होकर उसे जीवनदान दिया और नाग जाति की बलि न लेने का वचन दिया। जीमूतवाहन की बहादुरी से संपूर्ण नाग जाति की रक्षा हुई। तभी से जीमूतवाहन की पूजा का विधान शुरु हुई।
इस प्रकार से #जितिया से सम्बंधित दोनों कथाएँ समाप्त हुई।
ठेठ पलामू की तरफ से सभी माताओं को प्रणाम और उनके सभी संतानों से निवेदन है कि जो माँ आपके लिये इतना कठिन व्रत करती हैं आप भी उनके लिए जिम्मेवार बने, पूरे जीवन भर उनका सहारा बने ।
©️Sony Pandey
3 Oct 2018, 07:36

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