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वो भी क्या दिन थे जब छठ परब खत्म होते ही हमनी के #गन्ना उर्फ #केतारी चिभे के लाइसेंस मिल जाता था। चिभते तो छठ से पहिले भी थे लेकिन लुका छिपा के। जब तक दिन भर में 2-3 डाँड़ नही चीभ लेते मने नहीं भरता था। इहे से पूरा मुँह छिला जाता था आउ रात में सब्जी बड़ी तीता लगता था ।
छठ से पूरा धन कटनी तक हमनी केतारी चीभ-चीभ के पूरा खेत खहर कर देते थे, इहे में कभी कभी माई बाबूजी से कुटाई भी हो जाता था। आउ फिर धन कटनी के बाद शुरू होता #कोलसार ।।
आजकल के लइकन कोलसार के नाम सुनते बन्ड़ेड़ी ताके लगता है कि ई #कोलसार होता का है ?
गांव के सब लोग मिलके प्लान बनाते कि ई साल कोलसार कहाँ बनावल जाए? फिर सबसे पहिले गुड़ बनावे खातिर 2-3 गो चूल्हा बनाया जाता और फिर #केतारी पेरे खातिर #कल गाड़ा जाता।
अब न क्रेशर आ गया है, पहिले त #कल में बैल को नाध के कल के गोल गोल घूमते रहता था सब, और एक ठो आदमी बैठ के कल में केतरी लगाते रहता। 4-5 घण्टा के बाद 1 #खोर गुड़ खातिर केतारी पेराता, आउ रस कराह में डलाता।
आउ फिर शुरू होता चूल्हा आँचने का काम। चूल्हा आँचना भी बड़ी बहादुरी का काम होता था, काहे कि ढेरे देर बइठल बइठल डाँड़-गोड़ दुखाये लगता था। 4 से 5 घण्टा कराह आँचने के बाद गुड़ चूल्हा से उतारने लायक हो जाता। और बीच बीच मे कराह से #मइल भी काटे पड़ता था जो कि #डांगर_गोरु के पियावे के काम आता था। जब गुड़ चूल्हा से उतरता तब हमनी सब लइकन लोग 2-3 गुल्ला के केतारी ले के तैयार रहते #कफाई लपेटे खातिर, वही #कनकट्टा गुड़ लपेटे खातिर। जब कभी हमनी के गुड़ रात में तैयार होता तो बाबूजी हमनी खातिर लपटन लपेट के रख देते। लेकिन जब ढेलिया गुड़ बनता था तो कनकटा गुड़ लपटाता था, लेकिन जब कोई रावा गुड़ बनाता तब हमनी सब लइकन के मुंह देखे लायक होता, काहे कि कनकट्टा गुड़ लपेटे ला नही मिलता था।
फिर कफाई को #घोरठन से मैसने के बाद कुछ देर ठंढाने के बाद गुड़ का ढेलिया बंधाता।
आउ गुड़ भी तरह तरह के तैयार होता था। कोई एकदम दानेदार होता तो कोई कम दानेदार। कभी गुड़ के रंग बढ़िया होता तो कभी एकदम करिया गुड़ । ठेठ पलामू के एडमिन से भी ज्यादा करिया!
आउ अंतिम में कोलसार में बाँटे खातिर छोट छोट ढेलिया बंधाता था।
और हाँ!
गुड़ अगर रावा भी बनता न, तबो कोलसार में बांटे खातिर अंतिम में थोड़ा सा रावा गुड़ को फिर से चूल्हा पर चढ़ा के ढेलिया गुड़ बनाया जाता। और जो भी कोलसार में उपस्थित होता उसे खाये खातिर दिया जाता।
गुड़ खाए से सुने हैं कि शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ती है, इसीलिए लरकोरी को गुड़ हल्दी खिलाने का रिवाज है हमारे पलामू में।
© Vikash Ranjan
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वो भी क्या दिन थे जब छठ परब खत्म होते ही हमनी के #गन्ना उर्फ #केतारी चिभे के लाइसेंस मिल जाता था। चिभते तो छठ से पहिले भी थे लेकिन लुका छिपा के। जब तक दिन भर में 2-3 डाँड़ नही चीभ लेते मने नहीं भरता था। इहे से पूरा मुँह छिला जाता था आउ रात में सब्जी बड़ी तीता लगता था ।
छठ से पूरा धन कटनी तक हमनी केतारी चीभ-चीभ के पूरा खेत खहर कर देते थे, इहे में कभी कभी माई बाबूजी से कुटाई भी हो जाता था। आउ फिर धन कटनी के बाद शुरू होता #कोलसार ।।
आजकल के लइकन कोलसार के नाम सुनते बन्ड़ेड़ी ताके लगता है कि ई #कोलसार होता का है ?
गांव के सब लोग मिलके प्लान बनाते कि ई साल कोलसार कहाँ बनावल जाए? फिर सबसे पहिले गुड़ बनावे खातिर 2-3 गो चूल्हा बनाया जाता और फिर #केतारी पेरे खातिर #कल गाड़ा जाता।
अब न क्रेशर आ गया है, पहिले त #कल में बैल को नाध के कल के गोल गोल घूमते रहता था सब, और एक ठो आदमी बैठ के कल में केतरी लगाते रहता। 4-5 घण्टा के बाद 1 #खोर गुड़ खातिर केतारी पेराता, आउ रस कराह में डलाता।
आउ फिर शुरू होता चूल्हा आँचने का काम। चूल्हा आँचना भी बड़ी बहादुरी का काम होता था, काहे कि ढेरे देर बइठल बइठल डाँड़-गोड़ दुखाये लगता था। 4 से 5 घण्टा कराह आँचने के बाद गुड़ चूल्हा से उतारने लायक हो जाता। और बीच बीच मे कराह से #मइल भी काटे पड़ता था जो कि #डांगर_गोरु के पियावे के काम आता था। जब गुड़ चूल्हा से उतरता तब हमनी सब लइकन लोग 2-3 गुल्ला के केतारी ले के तैयार रहते #कफाई लपेटे खातिर, वही #कनकट्टा गुड़ लपेटे खातिर। जब कभी हमनी के गुड़ रात में तैयार होता तो बाबूजी हमनी खातिर लपटन लपेट के रख देते। लेकिन जब ढेलिया गुड़ बनता था तो कनकटा गुड़ लपटाता था, लेकिन जब कोई रावा गुड़ बनाता तब हमनी सब लइकन के मुंह देखे लायक होता, काहे कि कनकट्टा गुड़ लपेटे ला नही मिलता था।
फिर कफाई को #घोरठन से मैसने के बाद कुछ देर ठंढाने के बाद गुड़ का ढेलिया बंधाता।
आउ गुड़ भी तरह तरह के तैयार होता था। कोई एकदम दानेदार होता तो कोई कम दानेदार। कभी गुड़ के रंग बढ़िया होता तो कभी एकदम करिया गुड़ । ठेठ पलामू के एडमिन से भी ज्यादा करिया!
आउ अंतिम में कोलसार में बाँटे खातिर छोट छोट ढेलिया बंधाता था।
और हाँ!
गुड़ अगर रावा भी बनता न, तबो कोलसार में बांटे खातिर अंतिम में थोड़ा सा रावा गुड़ को फिर से चूल्हा पर चढ़ा के ढेलिया गुड़ बनाया जाता। और जो भी कोलसार में उपस्थित होता उसे खाये खातिर दिया जाता।
गुड़ खाए से सुने हैं कि शरीर में आयरन की मात्रा बढ़ती है, इसीलिए लरकोरी को गुड़ हल्दी खिलाने का रिवाज है हमारे पलामू में।
© Vikash Ranjan
2 Dec 2018, 07:38

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