"ऊ जे केरवा जे फरेला खबद से, ओह पर सुगा मेड़राए
मारबो रे सुगवा धनुख से सुगा गिरे मुरझाए.."
ऐसे गीत कानों में पड़ते ही छठ की याद बरबस ही हमें अपनी ओर खींच लेती है। समय के साथ सबकुछ बदलता है, हमारे तौर-तरीके ही नहीं त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें जितना विस्तार दिया, भीतर से हम उतना ही सिमटते गए और इस 'संकुचन' को बड़ी बेशर्मी से '#आधुनिकता' का नाम दे दिया। पर 'आधुनिकता' के इस दौर में भी अगर कुछ नहीं बदला, तो वह है #छठ_पर्व की परंपरा। गीतों में बदलाव आया, नए जमाने के गायक/गायिकाओं ने नए अंदाज में पारंपरिक गीतों को परोसा पर न ही भाव बदला और न ही जज्बा।
गंगा माई के ऊंची रे अररिया, तिवईया एक बिनवेली हो
हे गंगा मईया अपनी लहर मोहे दिहतू, लहरे मर जईतीं हो
हे गंगा मईया
चुप होख चुह होख तिवई, लोर पोंछ
किअ रे नइहर दुख, किअ रे ससूरा दुख, कवन दुखे रोवेलू हो
नाही मोरा नइहर दुख, ना ही रे ससूरा दुख
पूत दुख रोवली हो
गंगा माई आपन पुत तुहू मरतू हमरो जीवतू हो....
'#गोधन' कुटाते ही छठ होने का ऐलान हो जाया करता था और इस महापर्व की तैयारियाँ शुरू हो जाती। लाल गेहूँ , देशी गुड़, शुद्ध गाय का घी, आम की लकड़ी, नया अरवा चावल, सूती साड़ी, #सूप, #दउरा, #ढकनी, #बेना, #बढ़नी आदि की खरीदारी और अगल-बगल से जुटाने की कवायद। फिर तो रात-दिन बस एक ही चर्चा सिर्फ छठ की। परिवार का हर सदस्य अपनी काबिलियत के हिसाब से इसकी तैयारी में जुट जाता। गोधन से ही गोबर से #दुहारी लिपने की शुरुआत होती चिकनी मिट्टी लाकर चूल्हे बनाए जाते (ये अलग बात है कि अब लोहे के रेडिमेड चूल्हे का प्रयोग होने लगा है।)
आधुनिकता के इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चौंधियाँ नहीं गई हैं, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ पूजा को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमां में उड़ना सीख गए बच्चे होली, दीवाली चाहे जहांँ मना लें, पर छठ के लिए अपने 'घोंसलों' को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे भी ये जान पाते हैं कि 'टू बेडरूम फ्लैट' के बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और संयुक्त परिवार की क्या खूबियांँ होती हैं, क्योंकि छठ में जितने ही काम करने वाले हाथ उतनी ही आसानी। नई पीढ़ी के बच्चे समझ पाते हैं कि डिस्कवरी पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूस करने का आनंद कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप? कैसा होता है दउरा? कौन बनाते है इन्हें और ये समाज के कितने अभिन्न अंग हैं? ये छठ ही इन्हें बताता है डाभ, पानी सिंघाड़ा, #सूथनी, शक्करकंद, शरीफा जैसे फलों का अस्तित्व।
#नहाय_खाय' के दूसरे दिन यानी कार्तिक शुक्ल पक्ष की पंचमी को व्रती दिनभर उपवास करके शाम को नदी, तालाब या कुँए पर जाती हैं और स्नान करके वहांँ अपने घाट की पूजा करती हैं, जिसे 'घाट जगाना' कहते हैं। घाट से आकर व्रती खुद आम की लकड़ी से चूल्हे पर गाय के दूध और अरवा चावल और गुड़ से खीर बनाती हैं। जिसे 'खरना' कहा जाता है। व्रती सबसे पहले '#खरना' करती हैं।
मुझे आज भी बचपन का वो दिन याद है जब मांँ 'खरना' करती थीं, तो हम बच्चों को कहीं दूर भेज दिया जाता था। ऐसी मान्यता है कि उस समय अगर किसी ने बोल दिया तो व्रती खरना करना छोड़कर उठ जाती हैं या फिर खाते समय कंकड़ का एक टुकड़ा भी पड़ गया तो वह नहीं खातीं। व्रती के बाद ये खीर सभी को प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। खीर को सबसे पहले छठी मईया के नाम से ढकनी में निकालकर जमीन में सिंदूर टीककर और दीया जलाकर रखा जाता है। प्रसाद का खीर लोग माँग-माँगकर खाते हैं। हमारी चाची कहती हैं- "छठ के परसादी में कोई जात-पात और दुश्मनी ना देखल जाला, कोई ना देवे तो मांग के खाइल जायेला।" और ऐसा होता भी है लोग वर्षों की दुश्मनी भुला कर भी छठ का प्रसाद खाने जरूर जाते हैं। कहीं-कहीं 'खरना' के दिन खीर के साथ रोटी या पूड़ी खाने की भी परंपरा है। चाँद रहने तक व्रती पानी पी सकती हैं।
क्रमशः....
©Sharmila Shumee
12 Nov 2018, 09:06

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