ईसर पिसर दलिद्दर खेदो,
अहिरा घर खीर पुड़ी,
वहई तू जो।।
हो सकता है कि करोड़ों कंठ से निकलने वाले इस गीत को आपने भी सुना होगा। जी,हाँ।यह दलिद्दर खेदने की लोकपरंपरा पर गाया जाने वाला गीत है।दलिद्दर खेदने से आशय है कि घर की निर्धनता को दूर करने का आह्वान...। सदियों से जिस परंपरा का निर्वहन हमारे समाज में किया जा रहा है।आप और हम सभी के घर की आजी और माई इस परंपरा का निर्वाह करती आ रही हैं।
गोधन कुटने के पहले उसी दिन भोर में हम सभी के घर में दलिद्दर खेदने ठक ठक की आवाज सुनाई पड़ती है।घर की सबसे वरिष्ठ महिला और उनकी सहयोगी के द्वारा एक पुराने सूप को #हंसुआ से ठोका जाता है और इस गीत का उच्चारण किया जाता है।इस दौरान सहयोगी महिला हाथ में दिया जलाकर पीछे रहती हैं।वे दोनों पूरे घर में घुमती हैं।संभव है कि इसके पीछे यह भावना हो कि घर के कोने कोने में घुमकर दलिद्दर को खोजा जाता है और फिर उसे खदेड़ने का काम शुरु होता है।
#दलिद्दर को घर से बाहर खदेड़ने के बाद उस पुराने सूप को घर से बाहर फेक दिया जाता हैं फिर हाथ पैर धोकर हंसुआ को घर में ले आते हैं।उसके बाद उस हँसिया को धोकर दिए की लौ से उस पर काजल बनाया जाता है।उस काजल को सबसे पहले दलिद्दर खेदने वाली महिलाएं लगाती है फिर उस काजल को घर के बाकी सदस्यों को लगाया जाता है।ताकि किसी को बुरी नजर नहीं लगे।
गाँव में ऐसी भी मान्यता है कि उस फेके हुए सूप को जलाकर तापने से #सफेद_दाग(चर्म रोग)दूर होता है।इसलिए सफेद दाग से पीड़ित व्यक्ति उस दिन भोर में उस ठक ठक की आवाज का इंतज़ार करते हैं कि उन्हें वह इस्तेमाल की हुयी पुरानी सूप मिले जिसे जलाकर तापने से शायद उन्हे उनके चर्म रोग से हमेशा के लिए छूटकारा मिल सके।
यह सब सुनी हुयी स्मृतियों पर आधारित जानकारी है।आप भी अपने घर के वरिष्ठ महिलाओं से इस परंपरा से जुड़ी हुयी जानकारी को पूछें और हम सभी को भी बताएँ जिससे हम अपनी लोकसंस्कृति और लोकपरंपराओं से वाकिफ हो सकें।
©Ajay Shukla
9 Nov 2018, 09:18


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