शादी के बारे में हम बचपने से सुनते आ रहे थे. हमारे चाचा अक्सर कहते थे कि 'हमरा बियाह के कार्यक्रम छोटके से शुरू करेलाबा'. उस समय कुछ ज्यादा समझ में तो आता नहीं था, लेकिन सुनने में अच्छा बहुत लगता था. उसके बाद हम जैसे-तैसे थोड़ा बड़े हुए तो चाचा के बात एकदम यू टर्न मार गया, मने पूरा चेंज हो गया. अब बात बात में हम सारे भाई बहनों से ये कहा जाने लगा कि - 'पढ़ बढ़िया से मन लगा के, न तो बियाह ना होताऊ'. हमारे घर के कुछ बच्चों पर इसका घनघोर असर पड़ा और कुछ लोग दिन में भी लालटेन जला कर पढ़ते हुए पाए जाते. कुछ लोग ऐसे तो घूमते-फिरते-खेलते-माजा मारते रहते मगर चचा के आने के ठीक पहले किताब कॉपी बस्ता ले कर ऐसे गेंडूरी मारते जैसे अनंतकाल से समाधि में हों. हमको थोड़ा बहुत डहजरी भी होता जब माई चाची दूध चाहे पराठा ले कर आती ये कहते हुए कि-'लो खा पी लो, कितना पढ़नीहार बनोगे'. मगर मिला जुला के मेरे ऊपर इस 'पढ़ाई से बियाह वाले' आश्वासन का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा।
मगर उमर है कि जलकुम्भी नियर बढ़ल ही जाता है बिना देखे ताके कि अभी इतना उम्रदराज होने का जरूरत भी है कि नहीं. तो हम भी अवांछित तरीके से उस उम्र में पहुंच गए, माने बाछा से बैल बना दिए गए. बिना देखे बुझे कि गर्सन में जुआठ सँभालने का अकिल हुआ है कि नहीं, पढाई लिखाई के बारे में हवा-बयार देने भर नॉलेज हुआ है कि नहीं. मने सर्रिफिकेट के हिसाब से भले हम नाबालिग थे लेकिन वास्टविकता के धरातल पर उमर पहुँच गया एकदम शादी के लायक कैंडिडेट के बराबर. हम भी इस कटु अवश्यम्भावी सत्य को गुड की भेली समझ के चख ही लिए.
चलिए, उमर भी हो गया, घरे वाले भी रेडी हो गए कि लईका को अब पार-घाट लगा देना है. लेकिन मेन समस्या ये कि कोई देखने -ताखने आए तब न. इंतजार की घडी बड़ी स्मो मोशन में गुजरती है, आइन्ट्सीनवा ठीके बोला था रिलेटिविटी की थ्टोरी में. मने मानसिक स्थिति ऐसी हो गयी कि अनजान फेरीवाला भी गली में गुजरता तो हम नया शर्ट पैन निकलने लगते अटैची में से ये सोच के कि कहीं भगवन की तरह रूप बदल के कोई अगुआ ना आ गया हो.
शुरू शुरू में घर रह के इन्तजार किये. फिर सदियों से आजमाए हुए पारम्परिक तरीके को भी अपना लिए. दूर-दराज के हित-नाता में भी शादी बियाह का कार्यक्रम होता तो मेरी उपस्थिति हंड्रेड परसेंट. खास कर के बारात का स्वागत हो, मड़वा सजाना हो, लड़का के फूफा को गुटखा खिलाना हो, या लेडिज लोग को पेट दर्द का दवाई मंगाना हो. नेता लोग भी एतना चुनावी दौरा नहीं करता होगा जेतना कि हम किये. हर जयमाला के कार्यक्रम में लड़का के बगल में खास दोस्त वाला जगह पर हम ही पाए जाते. यकीं नहीं तो पुरे प्रमंडल के जात-बिरादरी वाली कोई भी शादी का एल्बम निकल के देख लीजिये आप. जैसे ही जयमाला लड़के के गले में पड़ती, मेरे मन में सांत्वना के बोल गूंजते कि- 'अबकी बार , मोदी सरकार'. अब ई मोदी भी तो ...छोडिये ये चर्चा फिर कभी.
धीरे धीरे उम्र के साथ-साथ बाल का भी साथ छूट रहा था. आशा दिन प्रतिदिन निराशा मे बदल रही थी. कभी कभी तो लगता कि कहीं ऐसा तो नहीं कि दहेज के चक्कर मे हमर वाली कन्या भ्रूण हत्या के शिकार हो गयी हो. ख़ैर हमारी कर्मठता रंग लायी और ई सब प्रकार के नकारात्मक सोच पर ब्रेक लगा. दू चार गो अगुआ हमको देखने के लिए आये और अंततः एक जगह ठीक-ठेकान भी हो गया. पर अभी दिन-तिथि रखाना बाकि ही था.
अरेंज मैरेज मान लीजिये कि टेस्ट मैच जैसा है, आपके सब्र का इम्तहान. जबकि उधर लव मैरेज में सब कुछ फ़ास्ट फ़ास्ट होता है टवंटी टवंटी जैसा. अब दिन जैसे-जैसे बीत रहा था, मिलने के लिए मन भी उत्सुक हो रहा था. उस समय हमारा ‘निवास’ डाल्टेनगंज में ही हुआ करता था. एक कमरे की जिंदगी जीने वाले विद्यार्थी लोग यहाँ ‘निवास’ शब्द देख के मने-मन मुस्कुरा रहे होंगे. तो आते हैं मेन मुद्दे पर. उसका घर…सॉरी…उनका घर जी एल ए कॉलेज तरफ ही था, गुप्त सूत्रों ने हमें बताया था. अब हम इतने ज्यादा दर्शनाभिलाषी हो गए थे कि मॉर्निंग-वॉक, इवनिंग-वॉक या कोई भी जायज-नाजायज बहाना लेकर उधर का चक्कर काट लेते थे दिन में कई बार. कभी-कभी लहकत दुपहरियों में अपन टीवीएस स्पोर्ट्स से देविधाम की परिक्रमा काट लेते थे इस उम्मीद में कि शायद बाजार आते जाते या आइसक्रीम खाते हुए उनकी एक झलक मिल जाए. पर इतना बढ़िया किस्मत हमर कहाँ? दर्शन उतना ही दुर्लभ. हमें लगता है कि इस से जयादा आसानी से बेतला में बाघ खोजा जा सकता है. ख़ैर फ़ोटो देख के दिन रात काट रहे थे तो शायद हमारी तपस्या से भगवन खुश हो गए और एक दिन हमें फल मिल गया, वो तल्लीन हो कर देख रही थी फुचका-गुपचुप के ठेला वाले के हाथ की सफाई को और हम भी बगुले की तरह आँख गडाए हुए थे उनपर. वो पानीपुरी के दुकान पर और हम इधर पान के दुकान पर. जिस स्पीड से वो फुचका खाये हम उसी स्पीड से पान खा के थूके. हम दोनों का ये सिलसिला रफ़्तार पकड़ने लगा. पान दुकान वाला भी अब हमको देखते ही जरदा-तुलसी- चेरी निकालने लगता, और अपनी कहानी भी सुनाता बीच-बीच में.
दूर से ही दीदार का दस्तूर चल रहा था. दर्द दिल में मचल रहा था. मिलन की आस में मन पिघल रहा था. तभी एक दिन चाचा के बेटा हमसे बोलता है कि- ‘जानईत हे भईया! हम तोहार साली के देखले हलियौ’. अब मुझमें मिलन की उम्मीद जग उठी थी ठीक उसी प्रकार से जिस प्रकार हाथ में खैनी मलते एक आदमी को देखते ही दुसरे खैनिबाज का चेहरा चमकने लगता है. तहकीकात से पता चला कि उ जहाँ फिजिक्स का ट्यूशन जॉइन किया था, हमारी साली जी भी वहीं पढ़ती थी. तब जा के हमको भी ये गुरुत्वाकर्षण का फार्मूला समझ में आया कि काहे ई लईका मॉर्निंग वॉक के चक्कर मे जी एल ए कॉलेज ग्राउंड के चक्कर लगा रहा था वो भी सिंपल हार्मोनिक मोशन में. चुम्बकत्व के सिद्धांत को इ लड़का थ्योरी के साथ साथ प्रैक्टिकल में भी आजमा रहा था. अब हमको समझ में आया कि ऐसे तो आठ बजे सो के उठने वाला लड़का भोरे भोरे पांचे बजे कैसे फील्ड में पहुँच जा रहा था.
खैर अब हम उसको ट्यूशन छोड़ने के बहाने जाने लगे कि कमसे कम कुछ जान-पहचान तो बढ़े. भाई भी खुश! बार बार हमसे मांग-मांग के ले जाये कि आज कुछ गिफ्ट देना है भाभी को. काम मेरा तो कम बने पर उसका काम ज्यादा बनने लगा. अब उसके साथ हम भी कॉलेज ग्राउंड जाने लगे भोरे भोरे उठ के. अब उ तो कहता था कि भाभी से भेंट होता है कभी कभी. तो हम भी सोचे कि शायद मेरा भी फूटल किस्मत साथ दे देता एकात बार, दूरदर्शन शायद लाइव शो में बदल जाए. हमारे घर-परिवार को तो छोड़ ही दीजिए, पुरे खानदान में कोई लव-मैरिज नहीं कर पाया है आज तक. तो हमारी क्रन्तिकारी सोच ये थी कि कमसे कम इस अरेंज मैरिज में दो-चार प्रतिशत ही सही लव मैरिज का तड़का लगा देते. पर ‘हाय रे विधाता, चलवा दिया हमर इरादा पर जांता’. हराम जे अपना मंसूबा पूरा हो. लाख चक्कर लगाए पर अपनी आँखों को दूरबीन से सूक्ष्मदर्शी में नहीं बदल पाए.
उ क्या एक ठो शायरी है न-
“आंधियों को जिद है जहाँ बिजलियाँ गिराने की,
मुझे भी ज़िद है वहाँ आशियाँ बसाने की”
बस इसी लाईन से प्रेरणा लेते रहे हम और कार्यक्रम अनवरत चलता रहा. मगर ये लाईन भी शायद असल जिंदगी के प्रेमी प्रेमिकाओं के लिए बना हुआ था, हमारे जैसे नकाबपोश प्रेमियों पर फिट नहीं बैठता था.
अंततः एक दिन अचानक से पता चला कि समय निर्धारण हो गया है, दिन-तिथि रखा गया है. अब तो टेंट-दोना-पत्तल-गहना ये सब हज़ार तरह की तैयारी करनी थी, हम डाल्टनगंज के अपने प्रवास से मूलनिवास स्थान यानि अपने गाँव में पधार लिए. अब आज मोबाइल फ़ोन और इंगेजमेंटप-रिंग सेरेमनी के जमाने वाले लोग क्या समझेंगे उस समय के मेरे दर्द को. लेकिन लव मैरिज नहीं होने का मलाल हमें आज भी है. और यही कारण है कि जब दूर दराज मे कहीं भी किसी का भी लव मैरिज की सम्भावना भी बनती है तो सबसे पहले विरोध में हम ही रहते हैं. काहे कि जब हम ही नहीं किये तो कोई और कैसे करे. इसी का नतीजा है कि अभिये हम अपनी साली के लिए लड़का फाईनल कर के आये हैं और हमारे घर में चचेरा भाई मुँह फुआलाइले बैठल है. मगर अब विद्रोही को कहाँ फर्क पड़ने वाला था…
बिधु शेखर " विद्रोही"
10 Jan 2021, 10:18

No comments:
Post a Comment