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#छठ लोकपर्व को अब पर्व नहीं महापर्व की उपमा दी गयी है। हमारी भाषा में इसे #महापरब बोलते हैं।
इस आस्था के महापर्व की लोकप्रियता को इसी तरह से समझ सकते हैं कि छठ के समय चाहे दिल्ली हो या कलकत्ता...या भारत देश का कोई भी शहर...बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश जाने वाली सभी बस और ट्रेन में पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती। ट्रेन या बस में टिकट लेने के लिए लोग महीनों पहले बुकिंग करा लेते हैं, लेकिन जिन्हें टिकट नहीं मिल पाती वो आस्थावान लोग भी तमाम कठिनाइयों के बाद भी अपने-अपने घर पहुँच ही जाते हैं।
काम-धंधे की तलाश में विस्थापित हुए लोग चाहे जिस शहर में भी रहते हों। वह अपने गाँव या शहर नहीं जा पाते हैं तो अपने गाँव या शहर में ही छठ की तैयारियों में जुट जाते हैं। इसीलिए छठ के समय भारत के लगभग सभी शहर छठमय हो जाते हैं। प्रत्येक गाँव और शहर के नदी तालाब में श्रद्धालु छठपर्व के शानदार आयोजन के लिए व्यवस्था में जुट जाते हैं।
छठ पर्व की तैयारी #नहाय_खाय से पहले ही शुरु हो जाती है। भारत के लगभग लगभग सभी शहरों में मगही, भोजपुरी, मैथिली, अवधी संस्कृति के लोगों की अच्छी-खासी पहुँच है। आज वह जहाँ भी निवासरत हैं अपनी संस्कृति को गौरवान्वित किए हुए हैं। आज उसी का परिणाम है कि संपूर्ण भारतवासी अब छठ के महत्व को समझने भी लगे हैं। बड़े-बड़े राजनेता भी अपना जनाधार बढ़ाने के लिए इस पर्व की तैयारी की व्यवस्थाओं और शुभकामनाएँ देने में जुट जाते हैं।
अमीर-गरीब सब अपने सामर्थ्य के मुताबिक #परबइतिन (व्रत करने वाली महिलाओं) की मदद के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते हैं। कोई अपने घर में वर्षों से उपेक्षित पड़े हुए जाता को धोकर तैयार रखता है कि परबइतिन अनाज को पीस सकें। जहाँ जाता उपलब्ध नहीं हो पाता, तो वहाँ आटा चक्की वाले निःशुल्क अनाज पीसते हैं। छठ घाट तक जाने वाली सड़क में झाड़ू से धूल कंकड़ साफ किया जाता है और पानी छिड़ककर साफ किया जाता है।
पूरा बाजार गन्ने, मिट्टी के बड़े दीए, मौसमी फल और पूजा सामग्री से भर जाता है। हर गली, हर चौराहे पर आपको छठ के पारंपरिक गीत गूँज सुनाई पड़ेगी। छठ गीतों की लोकप्रियता को भुनाने के लिए कल्लु, खेसारी, छैला, पवन आदि जैसे बेहुदे और अश्लील गायक भी आस्थावान होकर पारंपरिक गीत गाने लगते हैं ।
वैसे छठगीतों के लिए हम सभी की पहली पसंद #शारदा_सिन्हा, #मालिनी_अवस्थी, #भरत_शर्मा'व्यास', आदि ही होते हैं, तो नए लोकप्रिय गायकों में चंदन तिवारी, शैलेन्द्र मिश्र, संजोली पाण्डेय, अंकिता पण्डित आदि का भी कोई जोड़ नहीं है जबकि आजकल सोशल मीडिया में तेजी से लोकप्रिय हो रहे मैथिली ठाकुर, श्रद्धा सिसोदिया आदि बच्चों की शानदार आवाज में छठ गीतों को सुनना भी.. एक गजब के पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण से रुबरू होना होता है।
आज शाम तक सभी घरों में परिवार और रिश्तेदार पहुँच जाते हैं, क्योंकि आज नहाय-खाय से छठ महापर्व शुरु होने वाला है। सभी कोई आज से पूजा सामग्री को एकत्रित करने में लग गए हैं, क्योंकि वह छठ पर्व की महत्ता से परिचित हैं। वह पूरी आस्था के साथ इस महापर्व को मनाकर अपनी गौरवशाली संस्कृति को नयी गति देनें में लगे हुए हैं।
उम्मीद है ठेठ पलामू के पाठक भी छठ महापर्व को मनाने की तैयारी और फिर घाट पर जाकर मनमोहक और पवित्र वातावरण की कल्पना में खोए होंगे। कल से ठेठ पलामू भी आपको छठ पर्व की मौलिक जानकारी देने के लिए प्रयासरत रहेगी। अगर छठ महापर्व पर आप अपने घर के अनुभव भेजेंगे तो हम सभी को बहुत खुशी होगी।
©Sunny Shukla
#छठ लोकपर्व को अब पर्व नहीं महापर्व की उपमा दी गयी है। हमारी भाषा में इसे #महापरब बोलते हैं।
इस आस्था के महापर्व की लोकप्रियता को इसी तरह से समझ सकते हैं कि छठ के समय चाहे दिल्ली हो या कलकत्ता...या भारत देश का कोई भी शहर...बिहार, झारखण्ड और उत्तर प्रदेश जाने वाली सभी बस और ट्रेन में पैर रखने की भी जगह नहीं मिलती। ट्रेन या बस में टिकट लेने के लिए लोग महीनों पहले बुकिंग करा लेते हैं, लेकिन जिन्हें टिकट नहीं मिल पाती वो आस्थावान लोग भी तमाम कठिनाइयों के बाद भी अपने-अपने घर पहुँच ही जाते हैं।
काम-धंधे की तलाश में विस्थापित हुए लोग चाहे जिस शहर में भी रहते हों। वह अपने गाँव या शहर नहीं जा पाते हैं तो अपने गाँव या शहर में ही छठ की तैयारियों में जुट जाते हैं। इसीलिए छठ के समय भारत के लगभग सभी शहर छठमय हो जाते हैं। प्रत्येक गाँव और शहर के नदी तालाब में श्रद्धालु छठपर्व के शानदार आयोजन के लिए व्यवस्था में जुट जाते हैं।
छठ पर्व की तैयारी #नहाय_खाय से पहले ही शुरु हो जाती है। भारत के लगभग लगभग सभी शहरों में मगही, भोजपुरी, मैथिली, अवधी संस्कृति के लोगों की अच्छी-खासी पहुँच है। आज वह जहाँ भी निवासरत हैं अपनी संस्कृति को गौरवान्वित किए हुए हैं। आज उसी का परिणाम है कि संपूर्ण भारतवासी अब छठ के महत्व को समझने भी लगे हैं। बड़े-बड़े राजनेता भी अपना जनाधार बढ़ाने के लिए इस पर्व की तैयारी की व्यवस्थाओं और शुभकामनाएँ देने में जुट जाते हैं।
अमीर-गरीब सब अपने सामर्थ्य के मुताबिक #परबइतिन (व्रत करने वाली महिलाओं) की मदद के लिए हमेशा तैयार खड़े रहते हैं। कोई अपने घर में वर्षों से उपेक्षित पड़े हुए जाता को धोकर तैयार रखता है कि परबइतिन अनाज को पीस सकें। जहाँ जाता उपलब्ध नहीं हो पाता, तो वहाँ आटा चक्की वाले निःशुल्क अनाज पीसते हैं। छठ घाट तक जाने वाली सड़क में झाड़ू से धूल कंकड़ साफ किया जाता है और पानी छिड़ककर साफ किया जाता है।
पूरा बाजार गन्ने, मिट्टी के बड़े दीए, मौसमी फल और पूजा सामग्री से भर जाता है। हर गली, हर चौराहे पर आपको छठ के पारंपरिक गीत गूँज सुनाई पड़ेगी। छठ गीतों की लोकप्रियता को भुनाने के लिए कल्लु, खेसारी, छैला, पवन आदि जैसे बेहुदे और अश्लील गायक भी आस्थावान होकर पारंपरिक गीत गाने लगते हैं ।
वैसे छठगीतों के लिए हम सभी की पहली पसंद #शारदा_सिन्हा, #मालिनी_अवस्थी, #भरत_शर्मा'व्यास', आदि ही होते हैं, तो नए लोकप्रिय गायकों में चंदन तिवारी, शैलेन्द्र मिश्र, संजोली पाण्डेय, अंकिता पण्डित आदि का भी कोई जोड़ नहीं है जबकि आजकल सोशल मीडिया में तेजी से लोकप्रिय हो रहे मैथिली ठाकुर, श्रद्धा सिसोदिया आदि बच्चों की शानदार आवाज में छठ गीतों को सुनना भी.. एक गजब के पवित्र और आध्यात्मिक वातावरण से रुबरू होना होता है।
आज शाम तक सभी घरों में परिवार और रिश्तेदार पहुँच जाते हैं, क्योंकि आज नहाय-खाय से छठ महापर्व शुरु होने वाला है। सभी कोई आज से पूजा सामग्री को एकत्रित करने में लग गए हैं, क्योंकि वह छठ पर्व की महत्ता से परिचित हैं। वह पूरी आस्था के साथ इस महापर्व को मनाकर अपनी गौरवशाली संस्कृति को नयी गति देनें में लगे हुए हैं।
उम्मीद है ठेठ पलामू के पाठक भी छठ महापर्व को मनाने की तैयारी और फिर घाट पर जाकर मनमोहक और पवित्र वातावरण की कल्पना में खोए होंगे। कल से ठेठ पलामू भी आपको छठ पर्व की मौलिक जानकारी देने के लिए प्रयासरत रहेगी। अगर छठ महापर्व पर आप अपने घर के अनुभव भेजेंगे तो हम सभी को बहुत खुशी होगी।
©Sunny Shukla
11 Nov 2018, 16:56

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