Sunday, February 21, 2021

गजना धाम







#गजना_धाम बिहार और झारखंड के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। नवरात्र में यहाँ हजारों श्रद्धालु दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी करते हैं। गजना धाम मंदिर की मान्यता है कि यहाँ पर भक्तों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। हर वर्ष लाखों श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूर्ण करने यहाँ आते हैं। मेदिनीनगर औरंगाबाद मार्ग से लगभग 30 -35 किमी की दूरी पर टंडवा थाना के #कररबार नदी तट पर स्थित यह मंदिर लाखों श्रद्धालुओं के आस्था का प्रतीक है तथा शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है।

गजना धाम मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। कहा जाता है कि इस मंदिर का उद्धार वर्ष 1965 में #जगन्नाथ_सिंह उर्फ त्यागी जी ने किया था। वैसे तो यह एक #शक्तिपीठ है, पर धार्मिक स्थल होने के नाते इसका अपना वजूद है। कहा जाता है कि वर्षों पहले यहाँ एक ऋषि हुआ करते थे,नाम था ऋषि #पुलस्त। पुलस्त ऋषि के कहने पर देवी शक्ति असुरों के संहार हेतु खुद महर्षि के आश्रम में पधारे थे। हालाँकि यहाँ पर पहले से ही जल का अभाव था, तो इस संकट को हरने हेतु माँ देवी ने #गजानन का रूप धारण किया और अपने सूड़ से भूमि को खोद कर जल प्रवाहित किया, जो कि बाद में नदी में रूपांतरित हो गया और इसका नाम पड़ा 'करिवरवारी'। बदलते समयानुसार इसका नाम भी बदल गया। आज इसे लोग 'कररबार नदी' के नाम से जानते हैं। फिलहाल ये नदी बरसाती नदी बन कर रह गई है। कुछेक वर्ष पहले इस नदी में सालों भर पानी हुआ करता था। श्रद्धालु जन जो माँ के दर्शन हेतु यहाँ आते थे इसी नदी में स्नान कर दर्शन पाते थे। ऐसा यहाँ के महंत #अवध_बिहारी_दास जी का कहना है। फिलहाल ये नदी अपना वजूद खो चुकी है। आस-पास के दर्जनों गाँव की सिंचाई इस नदी पर निर्भर है। ये नदी झारखंड और बिहार की सीमा को भी विभाजित करती है।

इस मंदिर में माँ की कोई प्रतिमा स्थापित नही है, यहाँ शक्ति की पूजा की जाती है। पुलस्त ऋषि से पहले की बात है, जब माँ भगवती महिषासुर के वध के लिए निकली उसी वक़्त माँ की #चुनरी यहाँ गिरी थी, उस समय से यहाँ माँ को चुनरी चढ़ाया जाता है। पुलस्त ऋषि के नाम पर ही गाँव का नाम पड़ा 'पुलस्तडीह' जो आज '#पोलडीह' के नाम से जाना जाता है। पुलस्तडीह का अपभ्रंश है पोलडीह। मंदिर की देखरेख और मेला का आयोजन 'गजना धाम समिति' के द्वारा किया जाता है। माँ के दर्शन के अलावा लोग यहाँ कड़ाही चढ़ाने, कथा सुनने, मुंडन कराने एवं शादी विवाह हेतु आते हैं।

प्राचीन इतिहास

कहा जाता है कि प्राचीन काल में यह क्षेत्र आदि मानवों का निवास स्थान था। पोलडीह गांव में कई पुराना अवशेष आज भी है। इस अवशेष को गढ़ कहा जाता है। अवशेष के आसपास प्राचीनकालीन देवी देवताओं की कई प्रतिमाएं है। यहां #खरवारों की कुलदेवी #चेड़ीमाई की पूजा होती है। चेरो के आगमन के पूर्व लगभग 800 साल पहले #जपला खरवार राजाओं की राजधानी थी। आशुतोष भट्टाचार्य ने अपनी कृति बंगाला, लोक साहित्य और संस्कृति में गजना मां की चर्चा की है। गाजन से गजना के रुप में नाम परिवर्तित हुआ। कहा जाता है कि गाजन प्राचीन काल से चला आ रहा एक पर्व है जो बंगाल में लोकप्रिय #शैव संप्रदाय से जुड़ा है। गाजन पर्व बंगाल में चैत्र महीने में मनाया जाता है। यह वैशाख माह में भी मनाया जाता है। इतिहास बताता है कि बारहवीं शताब्दी के मध्य तक यह क्षेत्र बंगाल के शासक #राम_पाल_सेन के अधीनस्थ था। इसी के बाद इस क्षेत्र का शासन #गहड़वाल राजा के हाथ में चला गया। वर्तमान में यहां के मुख्य पुजारी जगन्नाथ मिश्र बताते हैं कि गजना माता को वन देवी भी कहा जाता है। सत्यनारायण ¨सह उर्फ साधु जी ने बताया कि करीब 55 वर्ष पहले मंदिर खपड़ैलनुमा था। मिट्टी के हाथी घोड़े चढ़ाए जाते थे। पहले यहां बकरे की बलि दी जाती थी। बाद में स्थानीय ग्रामीणों के कहने पर पं मुखदेव दास ने बलि प्रथा को बंद कराया। यहां घी में बनी पूड़ी और गुड़ का प्रसाद मां पर चढ़ाया जाता है।

मैं इस आलेख के माध्यम से दोनों प्रखंडों(हुसैनाबाद और नबीनगर) के पदाधिकारी और प्रशासन का ध्यान इस ओर आकृष्ट करना चाहता हूँ। आपको ये लेख कैसा लगा अपना सुझाव जरूर दें।

जय माँ गजनेश्वरी।

©Kripanath Pathak

साभार:- गूगल
15 Dec 2018, 01:53

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