वैसे तो बचपन से लड़ाई-झगड़ा, मार पीट और तास-जुआ से कोई नाता रहा नहीं है। झूठ नहीं बोल रहे हैं हम, पता करवा सकते हैं हमारे गाँव घर में केकरो भेज के। इसलिए कभी पैसा वैसा का फालतू खर्चा रहता नहीं था। लेकिन ई बात तब का है जब पैसा का मतलब बस इतना ही पता था कि पैसा से चकलेट बिस्कुट मिल जाता था। तो हम पैसा चुराने का काम जिंदगी में दु बार ही किये हैं।
हम तब 4-5 साल के रहे होंगे खूब से खूब। पापा के फुलपैन्ट #टँगना में टाँगल था। शुरू से उनका आदत था कि पैसा कौड़ी बहुत ज्यादा लुका छीपा के रखते नहीं थे। तो बस मन किया #पँचकिरीरिया चकलेट खाने का। अब पैसा माँगने कौन जाता? ज्यादा ईयाद तो नहीं है कि कितना लिए थे? बस ये याद है कि हम चुपचाप चौंकी पर चढ़े, टांगे हुए फुलपैन्ट के पॉकिट में हाथ डाले, और एगो सौ के नोट निकाल के चल दिये आराम से। कहां? मोघा_बूढ़ी (सागर मिस्त्री के माई) के दुकान था, वहीं #चकलेट लेने।
अब बचपन मे मस्त गाल उल फूलल रहता था तो आसपास के दीदी फुआ लोग के #दुरलुआ थे ही। अब रस्ता में मिल गयी गाँव के ही कुकू दीदी। एकदम पुचकार के पूछी- " एने कहाँ जाईत हे अनु? " हम हूँ उतना ही प्यार से कह दिए- " जाईत ही चकलेट लेवे #मोघा_बूढ़ी के दोकान में।" फिर पूछी- "पैसा हऊ? हमरो ला ले देबे? " अब पैसा तो था ही, तो हम भी देखा दिए कि-" ई का बा! चल तोरो ले देबाऊ… " अब जब हम दीदी देखी कि 100 के नोट है बच्चे के हाथ में, तो चुपचाप चकलेट खरीदवा दी अपन तरफ से। आऊ गोदी में उठा के ले आयी घरे पापा के पास।
एतवार का दिन था, से पापा कपड़ा में #आयरन कर रहे थे। दीदी ले जा के बताई कि ई 100 रुपया लेके जाईत हलक चकलेट लेवे। पापा पूछे - "कहाँ से लेले पैसा?" हम चुपचाप बता दिए कि पॉकिट में से। बस इतना कहना था तब तक उनका दाहिना पंजा उठा से आ के कनजबड़ी में झनाक से लगा!! और फिर का? #कंनजबड़ी लाल! हम #भेंमहा पारने लगे! कब एक नम्बर पैंट में ही हो गया पता ही नहीं चला। उसके बाद हमार दादी जे #गइया_गति करी कुकू दीदी के कि पूछिये मत। तनी मनी पापा के भी क्लास लिया गया दादी के द्वारा - "का बुझाईत हलई लईका के? जान बूझ के थोड़े लेले हलई ई उ पैसा!" पर अब जे लिया था पैसा उसको तो सजा मिल ही गया था। 1-2 महीना बाद फिर से लगभग इहे घटना दूबारा घटीत हुआ। बस अबकी बार दीदी के जगह गुलगुल चाचा थे। बाकि कनपटी झनझनाने वाला तत्पश्चात पैंट में करने वाला हूबहू उहे था।
बस पूरा लाईफ में अभी तक पापा से दुये बार तो पिटाई हुआ है हमारा पंजा छाप वाला। उसके बाद चोरी करने से पहले तो हजार बार झनझनी खुद ब खुद हो जाये।
जैसे जैसे बड़ा हुए, मगर पापा पैसा का आदत कभी न लगाए। जे होटल से कुछ लेना देना रहता दुकान में, तो पापा दुकानदार को कह देते कि जे मांगें दे देने, पर पैसा कम ही दिए। बाद में जब समझदार थोड़ा हो गए हम, तब पापा हमको पैसा देने में कभी कमी न किये। जानते थे कि हम उड़ाते हैं नहीं। इसलिए अक्सर बीना मांगें ही मिल जाता था। उस समय वही 100 रुपया के लिए पापा पिट दिए! पिटे इसलिए नहीं थे कि 100 रुपया लिये थे, बल्कि इसलिए कि चोरी किये थे, जो कि गलत था। और यही हाल सब गार्जियन लोग का होता है।
गलती करने पर भले लईका में डांट मार देते हैं गार्डियन लोग। लेकिन सोचिए ध्यान से, कि उ पैसा-कौड़ी, धन सम्पत्ति, घर-दुरा सब किसके लिए बनाते हैं। हमही लोग के लिए न! अपना बाल बच्चा के लिए ही न।लेकिन कभी-कभी बाल बच्चा ही अपना माँ बाप के गलत समझने लगते हैं कि वो लोग हमलोग के बारे में नहीं सोचते हैं। और न जाने क्या क्या..
ख़ैर ज्यादा भावनाओं में नहीं बहवाएंगे… आपलोग सब भी अपना अपना कहानी बताइये कॉमेंट में। काहे कि चोरी उ काम है जेकरा भगवान जी करने से तो बाज ही नहीं आये, तो हमीन कवन गली के घाँस है। लईकन सब तो लगभग लगभग सबे किये होंगे और कुटाये भी होंगे।लड़की लोग का न पता, अगर आपन माई साथे मिल के साझेदारी में चलता होगा तो पता नहीं। हम तो बता दिए अपन कहानी आपलोग बताइये अपना अपना।
© आनंद केशव"देहाती"
18 Jan 2021, 08:05

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