Sunday, February 21, 2021

#ठेठ_पलामू: बहुरूपिया





समाचार देखने के दौरान माननीय राजनेता जी के मुँह से किन्हीं अन्य मंत्री जी को #बहुरूपिया शब्द से संबोधन करते हुए सुनकर मेरे सात साल के बच्चे ने पूछ लिया कि- "माँ! यह बहरूपिया होता क्या है?" मैंने जवाब दिया कि - "बेटा! यह हमारी लोक कला है, जो आज इन महान नेता जी की उपेक्षा का शिकार बन विलुप्त हो चुकी है। बहुरूपिया का अर्थ होता है- 'अनेक रूप धारण करने वाला'।"

खैर अब तो इस शब्द के मायने ही बदल दिये गये हैं। प्रतिष्ठित लोक कला एक आरोप, एक गाली बनकर रह गई है। इंसान रूप बदलने में माहिर हो गए और समाज ने बहुरूपिया कलाकार की कद्र ही समाप्त कर दी। 80 के दशक में पलामू में मैंने अंतिम बार बहुरूपिया कलाकारों को देखा था।

बहरूपिया...बहरूपिया...बच्चों के इस शोर से सभी गलियाँ गूंज उठती थी। बच्चे-बूढ़े, महिला-पुरुष सभी उत्साहित होकर घर से बाहर निकलते थे। मेरे साथ कुछ अलग ही परेशानी थी, तब मैं बहुत छोटी थी, जब एक बहुरूपिए ने काली के वेश में पास आकर ऐसा डराया कि मैं बहरूपिया और #मुड़कटवा में भेद ही भूल गई। दोनों को एक ही समझती थी। फिर क्या था, सभी बाहर निकलते थे और मैं नाम सुनते ही घर की ओर भागती थी। सभी घरवाले मुझे समझा बुझा कर ले जाते कि वह एक आम इंसान है, पर डर तो डर था, माँ के पीछे से छिप कर देखा करती थी। वैसे, इनका कार्यक्रम एक दिन छोड़कर होता था। दूसरे दिन वो अन्य एरिया में जाते थे, तो सभी को अनुमान रहता था कि आज बहरूपिये आएँगे। घर की महिलाओं में यह खासी चर्चा का विषय होता था, वह जल्दी से अपना काम खत्म कर उस समय तक खुद को फ्री रखना चाहती थी। सभ्य समाज में महिलाओं का घर से बाहर निकलकर किसी मनोरंजन का लाभ लेना पहले असभ्यता या संस्कार के विरुद्ध कहलाता था। ऐसे में उनके #देहरी पर मनोरंजन का साधन मिल जाए, तो फिर क्या कहना।

बहुरूपिया कलाकार इतने सभ्य, ईमानदार और कला में निपुण होते थे कि तरह-तरह का #स्वांग रच कर लोगों के दरवाजे तक आकर उनका मनोरंजन किया करते थे। यह अक्सर जोड़े में ही रहते थे और दोनों ही पुरुष होते थे, जोड़े में ही अपना स्वांग बनाते थे; काली-शंकर, चोर-सिपाही, देवर-भाभी, बंदर-मदारी, लैला-मजनूँ आदि। लगभग 12 से 15 किस्म के रूप साज-सज्जा व वेश-भूषा के माध्यम से बनाते थे तथा उस पात्र में खुद को पूरी तरह ढाल लेते थे।

बहुरूपिया कला मनोरंजन का सबसे प्राचीन माध्यम हुआ करता था। आधुनिकता के इस दौर में इस प्रतिष्ठित लोक कला से जनमानस और सरकार सभी ने मुँह मोड़ लिया है। नतीजतन यह कला आज विलुप्ति के कगार पर है। हम सबको मिलकर इस बहुमूल्य संस्कृति को संजो कर रखने, इन्हें प्रोत्साहित और संरक्षित करने की आवश्यकता है।🙏

©संध्या शेखर
5 Jan 2021, 07:50

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