Sunday, February 21, 2021

ढेंकी








पिताजी हाईस्कूल के प्राचार्य थे। बहुत ईमानदारी से अपनी डयूटी निभाते थे। इसलिए बिना गर्मी की छुट्टी के हमें कभी गांव जाने का अवसर नही मिल पाता था। हम बच्चों को वर्ष भर गर्मी की छुट्टी का इंतजार रहता था कि कब गर्मी की छुट्टियां शुरु हो और हम मस्ती करने जल्दी से अपने दादाजी के घर पहुंच जाएं ।

इन छुट्टियों का सबसे बड़ा आकर्षण था - #ढेंकी कूटना और उसपर चढकर गीत गाना। हमने अक्सर अपने गांव की काकी और भऊजी को गीत गाते हुए धान या चूड़ा को ढ़ेकी पर कूटते देखा था।कुछ टूटे फूटे शब्द जेहन में होते उन्हें ही हम बच्चों की टोली ढेंकी पर चढकर गुनगुनाया करती थी।अन्न तो कोई हमें बर्बाद करने को देता नहीं सो हम कई बार खाली ढेंकी ही चला दिया करते इसीलिए डांट भी सुनते थे। काकी उधर से लाल पीली होती आतीं और कहती कि-'कहीं खाली ढेंकी चलावल जा हे,तोहनी के तनको न बुझा हव मईंया?कह देबव तोहर माई से त ढेरे #कूटइब'। "खाली ढेंकी कूटने से पाप लगता है" यह भी हमें बताया जाता। इसके पीछे वजह चाहे जो भी रही हो पर हमे विभिन्न तरीकों से डराया जाता था लेकिन हम बच्चे भी कहाँ मानने वाले थें।

धान की फसल तैयार होने पर कभी गांव जाने का मौका मिलता तो देखा कि अगल बगल की महिलाएं हमारे घर की ढेंकी खाली होने का इंतजार किया करती थी। मचर-मचर की आवाज से पूरा घर गूंजता रहता था। यहाँ पर काकी, आजी और फूआ की #बतकही के साथ-साथ ढ़ेर सारे किस्से कहानियां मुफ्त में सुनने को मिल जाया करता था पर अन्न कूटाने या चूड़ा तैयार होने जैसी बातों से हम बच्चों का कुछ लेना देना नहीं होता।हमारा ध्यान तो इस बात पर होता कि कब ढेंकी खाली हो और कब हम झूलें।

सबसे मजा छठ के समय आता था जब दूध में भीगा '#कचवनिया'(दूध,अरवा चावल और गुड़ से बना देहाती लड्डू) का चावल भी ढेंकी में ही दरदरा कूटा जाता था। उस समय पूरा घर छठ गीत से गुंजायमान हो जाता था।हर घर में एक से बढ़कर एक गीतकर और गवईया होती थीं महिलाएं। वो तो राह चलते ही गीत तैयार कर लेती थी।
ऐसा ही होता '#जांता' पीसने समय।'जांता' में गेंहू पीसकर पूरे परिवार को रोटी बनाकर खिलाने के किस्से अक्सर अम्मा सुनाया करतीं।हम तो आंखें फाड़कर उस जांते को देखते रह जाते,जो कि हमारी लाख मशक्कत के बाद भी हमसे हिलता तक नहीं था।मकर संक्रांति या टुसू पर्व के समय भोर से ही ढेंकी की आवाज गांव की गलियों में गूंजने लगती और अहसास हो जाता कि मकर संक्रांति आनेवाली है ।घर के धान से बने ढेंकी के कूटे मिठास भरे #चूड़े का स्वाद चखने को मिलेगा यह सोछकर मन खुश हो जाता था क्योंकि मिल में तैयार चूड़े में तो वो स्वाद ही नहीं मिलता। धीरे-धीरे आम के टिकोरे चुनने, #लुकाछिपी खेलने और अहरा में तैराकी सीखने की होड़ में कब छुट्टियां खत्म हो जाती पता नहीं चलता।घर जाने के बाद हम फिर अगले बरस गर्मी की छुट्टियों का इंतज़ार करते कि कब अपने दादा के पास गाँव जाएं।
©Sharmila Shumee
18 Dec 2018, 08:54

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