हमारे लोकगीतों में '#चइता" का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।जैसे फागुन के महीने में #फगुआ और सावन के महीने में #कजरी का नाम जुड़ा हुआ है। वैसे ही चैत के महीने मे गाया जाने वाला यह प्रमुख लोकगीत है। भारतीय संस्कृति में चैत महीने का बहुत धार्मिक महत्व भी है।भगवान राम और जैन धर्म के प्रवर्तक भगवान महावीर स्वामी का जन्म इसी महीने में हुआ और इसी महीने से हिन्दू नववर्ष की शुरुआत होती है।
#मगही,#भोजपुरी और #मैथिली क्षेत्र में गाए जाने वाले इस प्रमुख लोकगीत की बात ही निराली है। इसमें छंद की अनिवार्यता की बजाए में लय महत्वपूर्ण है। सामूहिक गायन इसकी बड़ी विशेषता है। यह उल्लास,आनंद और प्रेम का गीत है।लोकगीत की अपनी मौखिक परंपरा होती है।वह शास्त्रीय परंपराओं से मुक्त होती है।किंतु चइता ऐसा लोकगीत है जिसे लोक के साथ शास्त्रीय तरीके से भी गाया जाता है। इसे ठुमरी की विभिन्न शैली में बड़े-बड़े लोकगायकों ने गाया है। वैसे सामान्यतः यह 'दीपचंदी' या 'रागताल' में या फिर कहीं-कहीं '#सितारवानी' या '#जलद त्रिताल' में भी गाया जाता हैं।
चइता की संगीतात्मकता के विषय में मशहूर गीतकार रामायण सिंह का मानना हैं कि ".....चइता में छन्द के नाही,लय के कमाल रहला। ई पढ़े के नाही, सुने के चीज बा। गुनगुनाये के नाही, करेजा फाड़ के अलावे के चीज बा। चैता झोरे के चीज बा, झूमे के चीज बा। ढोलक के ताल अउर झाल के झनझंकार पर हुंकार होत रहला। एकरा गाए-सुने से मन के अंदर के सब दरद सब घूटन निकल जाला।"
एक जमाना था कि लगभग प्रत्येक गाँव में चइता-चइता गाने वालों की मंडली रहती थी और एक से बढ़कर एक गायक..।लेकिन वर्तमान परिदृश्य में इसकी धमक कम होती चली जा रही है।हमारी लोकसंस्कृति में लोकगीत का विशेष महत्व है।जिसकी सरलता,सहजता और माटी की सुगंध को महसूस कर लोक ही नहीं बल्कि सभ्य समाज भी भावविभोर हो उठता है।इसीलिए हमें अपनी नयी पीढ़ी तक इस अमूल्य विरासत को पहुँचाते रहना है।
कुछ जानकारों के अनुसार "चइता" और "#चइती" दो विधाएँ हैं।चैत्र रामनवमी में भगवान राम के जन्म दिवस के अवसर पर 'चइता' गाया जाता है।इन गीतों की प्रत्येक पंक्ति के अंत में ‘रामा’,'हे रामा,अरे रामा' लगाकर गाया जाता है। जैसे:- 'चैत मास बोले रे कोयलिया, ओ #रामा...मोरे रे अंगनवा.."।या फिर- "चैत की निंदिया रे, अरे जियरा अलसाने हो रामा.. ' जबकि 'चैती' श्रृंगारप्रधान गीत होते हैं।जिसमें पतझड़ की समाप्ति के बाद मौसम परिवर्तन का जिक्र होता है।जहाँ पेड़-पौधों और लताओं में नए फूल-पत्ती और कोपलों के आने के बाद खुशनुमा मौसम में नायक और नायिका के संयोग-वियोग के मनमोहक चित्र दिखलाई पड़ते हैं।"एही ठैंयां मोतिया हेरानी हो रामा । ये ही #ठैंयां ….।"
मुझे मालूम है कि ठेठ पलामू के सम्माननीय पाठकगण के पास चइता गीत की बहुमूल्य स्मृति होगी। निश्चित रुप से आप सभी बहुत सारे चइता गीतों को सुनते होंगे।लिखते,गाते और गुनगुनाते होंगे।आपके गाँव-शहर की चइता मंडली के बारे में अपनी स्मृतियां हमें जरुर बताएं।और जो पाठकगण अभी तक नहीं सुने हैं तो सबसे पहले हम सभी की बहुत प्रिय और मशहूर भोजपुरी लोकगायिका Chandan tiwari की आवाज में इस कर्णप्रिय गीत को सुनिए और चैत महीने में 'चइता' सुनने का आनंद उठाइए।
Ajay Shukla
31 Mar 2019, 10:31
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