Sunday, February 21, 2021

समर्पण



हजारों फ़ीट गहरी घाटियां और उतनी ही ऊंची चोटियां, न पशु न पक्षी, हड्डियां गल जाए ऐसी ठंड, जी हां मै बात कर रहा हूं #सियाचिन की। यहाँ पलामू में पारा 5-6 डिग्री पहुँचते ही आदमी से लेकर गाय-बैल तक का हालत खराब हो जाता है, तो सोचिये वहाँ क्या हाल होता होगी। दुश्मन के गोले बारूद से ज्यादा जवान मौसम की मार से जूझते है। -70° तक तापमान, हर महीने कम से कम दो सैनिक अपनी जंग हार जाते है। चार - चार महीने तक नहा नहीं सकते, भूख नहीं लगती, नींद नहीं आती, याद्दासत साथ देना छोड़ देती है, बर्फ को पिघलाकर प्यास बुझाते है, अरे साहब हलक से आवाज़ तक नहीं निकलती,कहीं अगर चोट लग गई तो ठीक भी नहीं होती,वह अंग ही गवाना पड़ता है। उतनी ही भारी पोशाक , हर रोज़ सोते वक़्त बीच-बीच मै एक सिपाही, अपने सोते दोस्तो को आवाज़ लगाता रहता है, की कहीं आक्सीजन की कमी सेकोई मर न जाए।

इतना बलिदान हमारी सेनाएं करती है, और हम जैसे कुछ लोग कहते कि हमारे जीवन में बहुत #परेशानी है, शायद परेशानी शब्द से पाला ही नहीं पड़ा है । खैर, फिर भी कुछ लोग भारत में हमारे राष्ट्रीय सेनाओं पर सवाल उठाते है, संदेह करते है, अरे पूछे कोई इन सियासतदारों से की खोया है कोई कभी अपना या यु ही जुबां चलाते हो। ये नौकरी नहीं करते साहब ये तो सेवा करते है, समर्पण से, इनका सम्मान सच्चे दिल से करना चाहिए। और कमसे कम जिंदगी में कुछ भी काम करने में परेशानी हो दिक्कत हो तो उनसे सीखना चाहिए कि जब वो कर सकते हैं तो हम क्यों नहीं।

कैप्टन साहब ,बिक्रम बत्रा की कही बात याद आती है,अपने अंतिम समय में पर्वतों पर एक फतह करने के बाद अपने सेनापति को बुलाकर कहते है,"ये दिल मांगे मोर" और फिर चल देते है, अगली फतह की और इसी बीच अपने घायल साथी की मदद की और जाते अपने दूसरे साथी से कहते है रुको "तुम्हरे बीवी बच्चे है" खुद गए, निहत्थे कप्तान पर दुश्मनों ने वही किया जो उनसे उम्मीद रहती है।।
मेरी सांसे तो तब थम सी गई,जब एक वीरांगना ने अपने शहीद हुए पति को देखकर, गहरी सांस लेकर मध्यम सी आवाज़ में कहा "क्या हो गया, गुस्सा हो,कुछ तो बोलो, ठीक है जाओ मै सबका ख्याल रखूंगी"। धन्य है ऐसी नारियां, ऐसी ही हिम्मती नारियों के कारण तो आज वीर अपनी वीरता का स्वाद दुश्मनों को चखाते है।

किसी दीवाने ने कहा है,,,,
"किसी गजरे की खुस्बू को, महकता छोड़ आया हूं,
मेरी नन्ही सी चिड़िया को, चहकता छोड़ आया हूं,
मुझे सीने से अपने लगा लेना ऐ, भारत मा ,,
मै अपने मा के बांहों को, तरसता छोड़ आया हूं"।

और इस देशभक्ति के मामले में हमारा पलामू कभी पीछे नहीं रहा है।
हमारे देश के साथ-साथ पूरे पलामू में अगर सबसे ज्यादा लोग किसी क्षेत्र में है तो वो सेना में हैं और अभी भी यहां के गाँव के 70% लड़कों का सपना भी होता है कि अगर नौकरी करना है तो फौज में। और ये आपको कहने के लिए नहीं, अगर देखना चाहते हैं तो किसी गाँव के फील्ड या रोड पर 4 बजे सुबह चले जाइये फ़ौज की भर्ती की तैयारी में दौड़ते युवा मिल जायेंगे।

"जय हिन्द" "जय भारत" "जय पलामू"

Govind Tiwari

(आेरनार पलामू)
2 Mar 2019, 10:54

No comments:

Post a Comment