'#खरना' के दूसरे दिन यानी षष्ठी को व्रती छठ का निर्जला व्रत रखती हैं। सुबह नहा-धोकर आम की लकड़ी पर लाल गेहूँ, शुद्ध घी और गुड़ से '#ठेकुआ' प्रसाद बनता है। जिसमें परिवार के सभी लोग मदद करते हैं, पर सूप का प्रसाद व्रती खुद बनाती हैं। इसका आटा 'जांते' में पीसा जाता है। पर आधुनिकता के इस दौर में अब यह संभव नही हो पा रहा। इसलिए लोग आटा चक्की को धुलवाकर वहीं गेहूँ पीसवाते हैं। कई आटा चक्की वाले तो पैसा भी नहीं लेते कि इसी बहाने वो भी तो पूजा में सहयोग कर सके। शुद्धता और साफ-सफाई का इस पर्व में काफी महत्व है। कहा जाता है कि "छठ में धोवलो के धोवेला आऊर पोछलो के पोछेला पड़ हइ।"
प्रकृति से जुड़ी चीजों और शुद्धता का इस पर्व में बड़ा ही खास महत्व है। प्रसाद बनाते समय सूप, दउरा सजाते न जाने कब घाट जाने का समय हो जाता है, पता ही नहीं चलता। लाल-पीली चुनरी और पीली धोती पहन व्रती अपने करीबी लोगों के साथ घाट की ओर गीत गाते चल पड़ते हैं-
"आठ हीं काठ के कोठरिया ऐ हो दीनानाथ,
रूपे सोने लागल #केवाड़
ताही ऊपर चढ़ी सुतले ऐ हो दीनानाथ,
#बांझीन केवड़वा धईले ठाड़
चादर उघारि जब देखले ऐ हो दीनानाथ,
कवने संकट पड़ल तोहार
पुत संकट पड़ले मोरा ऐ हो दीनानाथ,
ऐहीला केवड़वा धईले ठाड़
चदर उघारि जब देखल ऐ हो दीनानाथ,
अंधरा केवड़िया धईले ठाड़
अंधरा के आँख दीहले, कोढिया के कयवा
बांझिन के पुत दीहले ऐ हो दीनानाथ,
हंसत खेलत घर जाए.."
कई व्रतियों के आगे उनके पुत्र या अन्य परिजन #गमछा हिलाते हैं और व्रती 'दंडवत' करती जाती हैं। कुछ व्रती बिना '#दंडवत' के भी घाट जाती हैं। घर के पुरुष सिर पर #दउरा लिए आगे-आगे चलते हैं। एक घर में छठ हो तो पास-पड़ोस के सभी घरों में रौनक हो जाती है। जौ छींटते व्रती नदी में प्रवेश करती हैं। दतवन और स्नान कर जल में खड़ी रहती हैं और डूबते सूर्य को अर्घ्य देती हैं। सूप फलों, नारियल और ठेकुएँ से भरे होते हैं और सामने दीप झिलमिलाते रहते हैं।
छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर ही देखने मिलेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दउरा ढोते मिलेंगे। सबके सूप का मोल महत्व एक समान। कोई आडंबर नहीं, किसी पंडित, पुरोहित की जरूरत नहीं, बस आस्था होनी चाहिए। आपकी प्रार्थना सीधे छठी मईया और सूर्य भगवान तक पहुँच जाती है।
साक्षात भगवान हैं सूर्य, जिन्हें हम अपनी आँखों से देख पाते हैं और जिनके बिना जीवन की कल्पना तक नहीं कर सकते। सभी धर्मों के बीच खड़ी दीवार भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाजार नहीं, जिसमें छठ पूजन की सामग्री बेचने वालों में सभी समाज के लोग न हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रती भर भी कमी नहीं होती और तो और शिद्दत से ढूंढने पर कुछ घाट भी ऐसे मिलेंगे जहाँ अर्घ्य देती अलग-अलग धर्म की महिलाएँ भी दिख जाएँगी, तभी तो इसे कहते हैं 'लोक आस्था का महापर्व।'
©Sharmila Shumee
13 Nov 2018, 09:15

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