Sunday, February 21, 2021

घरकुंडा




बचपन की यादें बरबस ही त्योहारों के मौसम में अपनी ओर खींच लेती हैं। कितने सुनहरे थे वो बचपन के दिन। खासकर दीवाली की आहट मिलते ही हम कई तरह की तैयारियों में जुट जाते थे। पटाखे, फूलझड़ी, घिरनी, बम, राॅकेट और बंदूक की कागजी पिटपिट गोली अधिक-से-अधिक खरीदने की योजना। मन में कई ख्वाब तैर जाते थे।

इन्हीं तैयारियों के बीच मैदान से चिकनी मिट्टी लाना और '#घरकुंडा' (भुरकुंडा/ घरौंदा) बनाने का काम भी किया जाता। बाल्टी लेकर चिकनी मिट्टी लेने मैं ही जाया करती थी, फिर उसे फुलाना, सानना और फिर बड़े जतन से 'घरकुंडा' बनाने की तैयारी करना। इस मौसम में सुबह जल्दी ही नींद खुल जाती और फिर हम सारे काम निपटा कर 'घरकुंडा' बनाने में लग जाते।

जैसे-जैसे उम्र बढ़ने लगी वैसे-वैसे 'घरकुंडे' को लेकर हमारे सपने भी बड़े होने लगे। पहले 'एकतल्ले घरकुंडे' से भी काम चल जाता था, पर थोड़ी उम्र बढ़ने पर #दुतल्ला' बनाने लगे। उसके लिए पलाश की लकड़ी को एक साइज में काटना फिर उसको करीने से लगाने की हम जी-तोड़ कोशिश करते। न खाने की चिंता होती, न आराम करने की फिक्र। दिन कैसे बीत जाता पता ही नहीं चलता था। ताजमहल बनाकर भी उतनी खुशी नहीं मिली होगी, जितनी खुशी हमें हमारे तैयार घरकुंडे को देखकर मिलती थी।

मिट्टी से इसे तैयार कर इसके सूखने का इंतजार होता। फिर हम इस पर पोचारा करने की तैयारी में लग जाते। घर के रंग-रोगन से जो चूना वगैरह बच जाता, उसी का इस्तेमाल हम 'घरकुंडे' की पुताई करने में करते थे। घर के बाहर जब 'झालर लाइट' लगती तो हमारी भी फरमाइश होती अपने 'घरकुंडे' पर #झालर लगवाने की। अगर इस कोशिश में हम सफल हो जाते, तो हमारी खुशी का ठिकाना न होता। मिट्टी सानकर कुम्हार बनने का शौक पूरा होता, तो #पोचारा करते हुए हम किसी मजदूर/रेजा से कम नहीं लगते थे। अगर कोई झालर लगाने को तैयार न होता तो, हमारी #इलेक्ट्रिशियन बन जाने की मंशा भी पूरी हो जाती थी।

इतना सब कुछ करके दीवाली के दिन लाई, खील, बताशे और मिठाई की खरीदारी होती और साथ में मिट्टी के चुक्के भी खरीदे जाते थे और उन्हीं चुक्कों में खील, बताशे और लड्डू भरे जाते और '#गोधन' के दिन प्रसाद के रूप मे ये अपने भाई को दिए जाते। दीए की लड़ियों से सजा हमारा 'घरकुंडा' किसी राजमहल से कम नहीं लगता था। नई नवेली दुल्हन की तरह सजे अपने 'घरकुंडे' को देखकर जो खुशी हमें मिलती थी, वो खुशी अब आलीशान मकान (बंगले) को देखकर भी नहीं मिलती।

©Sharmila Shumee
6 Nov 2018, 09:02

No comments:

Post a Comment