शाम में #खोरी में दत्ती पर बैठे-बैठे दादी बड़की दादी से कहती -"पूस 15 दिन बीत गेलक बढको एको दिन बनबो न करलक , आज बनाइब का"? आऊ उसी में #बड़की_दादी का हामी भी आ जाता- "हाँ कालहे #नन्हका पूछतो हलक कि अबकी ना बनाइबे का माई।"
इतना कह के दोनों घरे आके तैयारी करने लगते , दाल निकाल के अलगे रखना, चाउर के आटा नाप के निकाल के अलगे #कठऊत में रखना , आउ जे भी हींग ई सब जरूरी सामान रहता, निकाल के एक जगह रख देते। सबसे मजा तो तब आता जब इहे समान बड़की दादी भी #ढाबा पर निकाल के रख देती थीं। हमीन लईकन जैसे ही देखते की दुनो दादी के सामान रेडी हो रहा है मने जरूर कुछ विशेष आईटम बनने वाला है। अब माई चाची के काम के बंटवारा भी हो जाता कि के चाउर के आटा #चाँडेंगी ( गरम पानी से गूंथना), किसको दाल पीसना है तो किसको #गढ़ना है। पर अभी तक का सबसे मेन बात यही रहता था कि किसी के मुँह से इसका नाम नहीं लिया गया था । सब के अइसा मान्यता रहता था कि नाम ले लेने से खराब हो जाता है, बनने टाइम फुट जाता है या कच्चा रह जाता है। पर ई सब से हमलोग के का मतलब एने ओने घूम के आवे आउ लाके पूछे " का बनावईत हे दादी"? अब नाम लेने से तो मामला गड़बड़ा जाता तो दादी कुछ बोलबे ना करे ,कभी 'उहे' तो कभी ' उ वाला' कह देती ।
अब जब गढ़ा जाता मने तो फ़ाइनल राउंड जो सबसे मेन था उ होता था इसको भाफने का काम होता था । आज जैसा #इडली बनाने वाला सिस्टम तो पहिले रहता नहीं था इसलिए स्वदेशी उपाय लगाया जाता था । सबसे पहिले एगो बड़का #डेकची/#तसला में पानी गर्म होते रहता उसमे आधा ही पानी रहता उसके मुंह पर बढ़िया सूती कपड़ा भींगा के अईसन बांधा जाता था कि डेकची के अंदर कपड़ा से #कटोरी जैसा बन जाये और उ पानी से उपरे ही रहे। जब पानी पूरा गरम होके खउलने(उबलने) लगे तब उसमें गढ़ा हुआ #पुसहा जो रहता था उसको कपड़ा वाला कटोरी में रख दिया जाता था। आउ फिर उसके बाद ढकने के लिए ऊपर से छोटा #गंज या डेकची रख दिया जाता था। अब इतना लंबा परकिरिया के हमनी इतना ध्यान लगा के देखते जैसे कौनो जादू चल रहा हो। पता चल गया था तबो बदमाशी करते बीच-बीच मे पूछते रहते ही दादी का बनावइत थे? आउ हर बार की तरह वही जवाब उहे।, उ वाला,उहे आदि जवाब मिलते रहता था।
जब कुछ देर में बन के उतर जाता तब उसका ठंडा होने का इंतज़ार , फिर बारी आता टेस्ट करने का। अब यहाँ हरबार यही होता कि बड़की दादी वाला हमलोग टेस्ट करते आउ हमीन वाल बड़का चाचा। आउ टेस्टी भी दुनो को, एक दूसरे घर वाला लगता था।वैसे स्वाद तो दुनो के एकही होता था पर घर मे ऐसा प्रेम शुरू से था ही कि अपना वाला के कोई बढ़िया कहता ही नही की एहि बहाने बगल से मिलेगा तो सही। हमार इआद से आज तक कोई भी ऐसा आइटम नही बना होगा जो बड़की दादी बनाये और बड़का चाचा उसको अच्छा कह दे हमेशा खा के कहते कि- "चाची वाला बढ़िया बनल, तुहिन से बढ़िया बनिये न सकेला।" दादी लोग इतना कारीगर थे कि खराब होने का सवाल ही नहीं था पर एकाध बार थोड़ा सा भी गड़बड़ा जाता तो के के टोका था उसपे इल्ज़ाम लगाना स्टार्ट हो जाता कि' #फलनवा के माई टोकले हलक इहे से खराब हो गईल"। वैसे तो इसके साथ कोई आलू का सब्जी, कोई टमाटर का चटनी तो कोई गुड़ का पाग बना के खाये, पर जे मजा इसको छूछे खाने में है उ कहीं नहीं है। भले दुनो दादी अब न रहे पर खाने में एक दूसरे घर के आइटम के बड़ाई आज भी वैसा ही होता है।
केतना साल के बाद तो अबकी 2 साल से दुनो पूस में पुसहा खा लिए ।शायद ही कौनो घर ऐसा होगा जहाँ ई महीना में पुसहा(पीठा) नहीं बनता होगा। अरे कोई केतनो चाउमिन चिली खा ले पर घरे के बनल ई सब पारंपरिक आईटम वाला बात उसमे कहाँ है। तो पूस तो खत्म हो गया ।आपलोग खाये की नहीं जरूर बताइयेगा।
©Anand Keshaw
22 Jan 2019, 09:03

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