नाम के ही अनुकूल चेहरे पर तेज़, बिलकुल ‘उदीयमान भानु’ की तरह। तिलक लेने का अंदाज़ सबसे निराला, कि जैसे कोई सूर्य-किरण आँखों के दोनों भौहों के बीच से उर्ध्वगमन करते हुए, काले घूंगरैले बालों में विलुप्त हो जाते हों। जहाँ एक तरफ दूसरे गुरुजनो का परिधान पश्चिमी सभ्यता से प्रेरित दिखाई पड़ता था, वहीं दो बून्द उजाला नील से भिगोये हुए सफ़ेद धोती और कुर्ते में संस्कृत के आचार्य जी की छवि उतना ही मनभावन। किसी की क्या मजाल जो चरित्र तो क्या, पोशाक में भी दाग़ का प्रतिबिम्ब मात्र तक देख ले। कुर्ते की पाकिट से झांकते कम से कम दो कलम, जेटर और पायलट, जिसकी कुल कीमत उस वक़्त लगभग मेरे 15 दिन के विद्यालय शुल्क के बराबर थी। यदा-कदा हम बच्चे, आचार्य जी से ये महंगी लेखनी नोट कॉपी के मुख्य पृष्ठ पर अपना नाम लिखने के लिए मांग लिया करते थे। विद्यालय में प्रवेश करते ही मुख्य द्वार पर वो अक्सर दिख जाया करते। चरणस्पर्श करते ही उनकी हथेलियाँ दो बार पीठ को स्पर्श करती, मानो भर-भर के दो झोली आशीर्वाद मिल गया हो।
जी हाँ! संस्कृत का ही अध्यापन कराया करते थे वो।
दुनिया की सबसे प्राचीन उल्लिखित भाषाओं में एक 'संस्कृत' उन दिनों माध्यमिक कक्षा में अनिवार्य विषय के रूप में स्थान बनाने के लिए जद्दोजहद कर रही थी। झारखण्ड माध्यमिक परीक्षा परिषद्, रांची (वर्तमान- जैक) जिसके परिषद् गीत में तक़रीबन 70% शब्द संस्कृत से लिए गए है; आखिरकार संस्कृत को ऐक्षिक (ऑप्शनल) विषय के रूप में ही दर्जा दे पाया।
बोर्ड परीक्षा में अव्वल नंबर लाने की रेस में अन्य बच्चो की तरह मैं भी संस्कृत को महज़ पास होने मात्र के लिए पढ़ने लगा था।
वैसे तो आचार्य जी अंग्रेजी को छोड़कर लगभग सभी विषय का अध्यापन कराया करते थे, पर हिंदी में उनकी ख़ासा अभिरुचि थी। अन्य विषयों के गुरुजनो की ग़ैर मौजूदगी में संस्कृत के आचार्य जी को ही कमान सम्हालनी पड़ती थी। जब कभी आचार्य जी गणित के लीज़र पीरियड में आते तो बोलते कि बच्चों आपलोग गणित के किसी भाग से संशय मिटा (Doubt clear) सकते है, बस बीजगणित को छोड़कर। उ का है कि - ‘एस्क्वायर टीसक़्वायर कबो जा के टाउन हॉल का स्क्वायर भी हो जाता है ये हमें ही बहुत कन्फूज़ कर देता है. ’
नृत्य-संगीत या साँस्कृतिक कार्यक्रमों के क्षेत्र में तो आचार्य जी ने विद्यालय की प्रतिष्ठा में ख़ासा इज़ाफ़ा किया था। और इस कारण विद्यालय पलामू के गिने-चुने प्रतिष्ठित विद्यालयों में शुमार हो चूका था। हालांकि मैं संगीत में भाग नहीं लेता था, पर हाँ उनके द्वारा तैयार भाषण राष्ट्रीय त्योहारों के अवसर पर अवश्य देता था। और इसी कारण मैं विद्यालय के उन चुनिंदे विद्यार्थीओं में शामिल था, जिसे प्रश्नोतरी/निबंध प्रतियोगिता में कई बार विद्यालय की तरफ से बेतला जाने का अवसर प्राप्त था।
हरमुनियाँ बजाने में तो माहिर थे वो। उनके एक रचना लोगों के जुबान पर चढ़ गई थी -
“गुरूजी तनी एक बेरिया हो अक्षरीय ज्ञान देइ द
अक्षरीय ज्ञान देइ द गुरूजी, अक्षरीय ज्ञान देइ इ द
सत्य अहिन्सा और शांति के, ओढ़ के चदरिया हो
घूम घूम के भाषण देबइ, कोट अउ कचहरिया हो
अक्षरीय ज्ञान देइ इ द"
अक्सर मैं अपने पड़ोसी मित्र राजू के साथ विद्यालय जाया करता। राजू हमेशा कोई न कोई फ़िल्मी गाना गुनगुनाता रहता. इसीतरह एक बार उसे गुनगुनाते आचार्य जी ने सुन लिया और अपने समीप बुलाया..
आचार्य जी: का गा रहा था अभी?
राजू: जी कुछ नहीं आचार्य जी! गलती हो गयी
आचार्य जी: अरे नहीं! अभी-अभी तू कुछ बहुत अच्छा गुनगुना रहा था।
राजू (जोश में): वो उ गाना... अकेली न बाजार जाया करो नज़र लग जाएगी..
आचार्य जी: हाँ! मुखड़ा मिल गया नए देशभक्ति गीत का ..मेरी सीमा में न आया करो गोली चल जाएगी..
राजू: धन्य हैं गुरूजी!🙏
स्वंत्रता दिवस हो या गणतंत्र दिवस या फिर हो विद्यालय स्थापना दिवस, आचार्य जी की अगुवाई में दो सप्ताह पूर्व से ही विद्यालय में नृत्य-संगीत का पूर्वाभ्यास तूल पकड़ लेता था। शायद आजकल भी ऐसा होता हो।
उम्मीद हैं कमेंट में संस्कृत के आचार्य जी से जुड़ा कोई न कोई किस्सा जरूर साझा करेंगे, क्योकि ठेठ पलामू के पाठकगण में आचार्य जी से शिक्षा ग्रहण करने वाले ढ़ेर सारे भैया-बहन हैं।
अंत में ठेठ पलामू के पेज से मैं ऐसे सभी गुरूजनों का चरणवन्दन करता हूँ, जो सदैव हमें आसक्ति और मोह के अंधकार, काम, क्रोध, लोभ और अहंकार के अंधकार, ईष्र्या-द्वेष, परछिद्रान्वेषण, आत्म प्रवंचना, धन, पद, प्रतिष्ठा के बल पर अहित की भावना के अंधकार से मुक्त होकर प्रकाश का स्वागत करते हुए चलने को प्रेरित करते हैं।
©अवनीश प्रकाश
24 Jan 2021, 08:36
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